महिलाओं का अशौच :- आचार्य अर्जुन तिवारी

19 फरवरी 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (45 बार पढ़ा जा चुका है)

महिलाओं का अशौच :- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सनातन धर्म की समस्त मान्यतायें वैज्ञानिकता से ओतप्रोत रही हैं , देर से ही सही परन्तु विज्ञान भी इन मान्यताओं को मानने पर विवश ही हुआ है | अशौच प्रकरण में रजस्वला स्त्री को भी अशुद्ध माना गया है | प्राचीनकाल में रजस्वला स्थिति में स्त्रियों को पाँच दिन तक एकवस्त्रा एवं एकान्तवासा होती थीं , धार्मिक कृत्यों से दूर रहते हुए रसोई से भी दूर रहा करती थीं , ऐसी स्थिति में इनके हाथ का जल भी पीना वर्जित माना जाता था | श्रीमद्भागवत के अनुसार जब इन्द्र को ब्रह्महत्या का पाप लगा तो उन्होंने अपने पाप को चार लोगों से लेने की विनती की | सबसे पहले वृक्षों को एक भाग दिया जिसके फलस्वरूप वृक्षों में रिसाव (गोंद) होता रहता है | दूसरा भाग जल को दिया जिसके फलस्वरूप पानी में बुलबुले उठते हैं | तीसरा भाग पृथ्वी को मिला तो पृथ्वी कहीं - कहीं बंजर हो गयी एवं उनमें मिट्टी उबाल लेकर रेह तैयार करती है | शेष बचे एक भाग को स्त्रियों से स्वीकार करने की प्रार्थना इन्द्र ने किया | उसी का परिणामस्वरूप स्त्रियाँ प्रत्येक महीने में रजोनिवृत्ति करती हैं | इस स्थिति में यह माना जाता है कि ब्रह्महत्या का पाप सात दिन तक स्त्रियों के पास रहता है इसीलिए इनको स्पर्श करने , धार्मिक कृत्य वर्जित करके एकान्तवासी किया गया है | सनातन की मान्यतायें अपने आप में अद्भुत हैं परन्तु इन्हें जानने - समझने के लिए सनातन की मान्यताओं का सूक्ष्मावलोकन करना पड़ेगा |* *आज हम जिस आधुनिक युग में जीवन यापन कर रहे हैं वहाँ स्वयं को आधुनिक मानने वाले कुछ लोग इन मान्यताओं को ढकोंसला ही मानते हैं परंतु जब कोई समस्या आती है तब उनको सनातन की मान्यताओं को मानना ही पड़ता है | आज की कुछ महिलायें आधुनिकता की रंग में ऐसी रंगती चली जा रही हैं कि वे इन वर्जनाओं को न मानकर महीने के तीसों दिन सारे कार्य सामान्य ढंग से ही करना चाहती हैं वहीं पुरुष वर्ग भी स्त्री को एकान्तवासी न करके नित्य ही उनका सानिध्य चाहता है | जिसके परिणामस्वरूप आने वाली पीढ़ी नकारात्मक होकर ही जन्म ले रही है | इन तथ्यों को न मानने वाले सभी लोगों को मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" इनके वैज्ञानिक तथ्यों की ओर ध्यानाकर्षण कराना चाहूँगा जहाँ वैज्ञानिक भी रजोदर्शन के समय स्त्रियों को इन कार्यों से दूर रहने को बताते हुए कहते हैं कि ऋतुकाल में महिलाओं को होने वाले दूषित रक्तस्राव से संक्रमण का अधिक खतरा रहता है | यही कारण है कि अन्य लोगों को इसके बुरे प्रभाव एवं महिलाओं को संक्रमण से बचाने के लिए उन्हें घर के कामकाज से अलग रखकर आराम करने की बात कही गयी है | आज विज्ञान भी सनातन की मान्यताओं को उचित मान रहा है परंतु हम नहीं मान पा रहे हैं , क्योंकि हम आधुनिक हो गये हैं |* *इतनी आधुनिकता होने के बाद भी आज भी महिलाओं के द्वारा इन दिनों में वृक्षों को जल देने अंचार आदि का स्पर्श करने से बचने का प्रयास किया जाता है |*

अगला लेख: राष्ट्रधर्म :--- आचार्य अर्जुन तिवारी



शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x