माँगें भगवान को :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

19 फरवरी 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (23 बार पढ़ा जा चुका है)

माँगें भगवान को :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*आदिकाल से इस धराधाम पर भगवान की तपस्या करके भगवान से वरदान मांगने की परंपरा रही है | लोग कठिन से कठिन तपस्या करके अपने शरीर को तपा करके ईश्वर को प्रकट करके उनसे मनचाहा वरदान मांगते थे | वरदान पाकर के जहां आसुरी प्रवृति के लोग विध्वंसक हो जाते हैं वहीं दिव्य आत्मायें लोक कल्याणक कार्य करती हैं | भगवान से वरदान मांगने के लिए कठिन साधना करने के बाद भी मनुष्य भगवान से मांगता है | जबकि यदि मनुष्य स्वयं भगवान को मांग ले तो उसका कल्याण हो जाता है | महाराज मनु एवं महारानी सतरूपा ने कठिन तपस्या की | ब्रह्मा , विष्णु , रुद्र बारंबार उनके पास आए वरदान मांगने के लिए कहा परंतु उन्होंने भगवान से नहीं मांगा बल्कि भगवान को मांग लिया | वहीं महाभारत युद्ध के समय जहां दुर्योधन ने भगवान से मांगा वहीं गांडीवधारी अर्जुन ने भगवान को मांग लिया | परिणाम क्या हुआ यह सभी जानते हैं | मनुष्य यदि भगवान से मांगता है तो भगवान वही कुछ दे सकते हैं जो कि मनुष्य का लक्ष्य होगा , परंतु यदि भगवान को मांग लिया जाता है भगवान के साथ समस्त ऐश्वर्य सारी सिद्धियां उसको स्वमेव प्राप्त हो जाती है | हमारे इतिहास में अनेकों कथायें मिलती है जहां लोगों ने भगवान से वरदान प्राप्त करके भी निराश ही रहे वहीं भगवान को माँगने वालों को सबकुछ प्राप्त हो गया है | अत: मनुष्य को भगवान से नहीं बल्कि भगवान को मांगना चाहिए |* *आज मनुष्य चारों तरफ अनेक प्रकार की आधि - व्याधियों से दुखी ही दिखाई पड़ता है | अनेक प्रकार के साधनों से सम्पन्न होने के बाद भी मनुष्य को शांति नहीं है और वह यहाँ वहाँ मठों - मन्दिरों एवं संतों की शरण में शान्ति खोजने के लिए जाता है | आज मव्दिरों में ऐसे भक्तों की लम्बी लाईनें देखी जा सकती हैं जो भगवान से कुछ न कुछ मांगने के लिए ही जाते हैं | इन भक्तों में मांगने वालों की तरह "दैन्यभाव" भी नहीं दिखाई पड़ता है | आज लोग भगवान से माँगते तो हैं परंतु व्यापारी बनकर | अपनी मनौती पूरी होने के बदले कुछ न कुछ अर्पण करने का वादा करके मनुष्य भगवान से भी व्यापार करना चाह रहा है | मेरा "आचार्य अर्जुन तिवारी" का यही विचार है कि मनुष्य यदि भगवान से न मांग करके "भगवान को" मांग ले तो उसका कल्याण हो जाय परंतु आज का मनुष्य भगवान को न मांगकर भगवान से मांगता है इसीलिए दुखी है | भगवान से मांगने के लिए सर्वप्रथम पात्र बनना पड़ता है आज हमारे भीतर पात्रता का अभाव है | जब तक पात्र स्वच्छ एवं चमकदार नहीं होता है तब तक भिक्षा भी अच्छी नहीं मिलती है | पात्र है हमारा शरीर इसे चमकाने का दायित्व भी हमारा ही है | शरीर की चमक का अर्थ है कि मनुष्य की वृत्तियाँ एवं उसके कर्म दिव्य हों , और यह दिव्यता मनुष्य को उसके सत्कर्मों से प्राप्त हो सकती है | रही बात माँगने की तो गीता में भगवान ने स्वयं कहा है :- कर्म करते रहो मांगने की आवश्यकता नहीं है , जैसा कर्म होगा वैसा फल प्राप्त होता रहेगा | मांगना भी है तो भगवान से न मांगकर भगवान को मांगा जाय |* *मनु - सतरूपा , ध्रुव , प्रहलाद , शवरी एवं अर्जुन की तरह भगवान को मांगकर ही कल्याण हो सकता है |*

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