गिलोय के बुखार में चमत्कारी प्रभाव व उपयोग

19 फरवरी 2019   |  सतीश कालरा   (171 बार पढ़ा जा चुका है)

सामान्यता गिलोय का क्वाथ बुखार एवं अनेक रोगों मे किया जाता है। गिलोय को अमृता, अर्थात कभी ना सूखने वाली बेल कहते है । अंग्रेजी मे इसे tinospora कहते है। गिलोय को अलग अलग भाषा मे गडूची, अमृवल्ली, गूलवेल, मधुपर्णी, कुन्डलिनी आदि नमो से जाना जाता है। गिलोय की बेल जिस पेड़ पर चढ़ती है उस पेड़ के गुण अपने अंदर समा लेती है। नीम पर चढ़ी गिलोय( Neem giloy) की बेल सबसे उत्तम मानी जाती है।इसका वैज्ञानिक नाम tinospora cordifolia (Willd.) है ।

Giloy ki bale

गिलोय त्रिदोष शामक है ,ये कफ और पित्त का शमन करता है। अमाशय की अम्लता इससे कम होती है। ये हृदेय को बल देने वाली है, कमजोरी, मधुमेह, त्वचा तथा कई प्रकार के ज्वर मे उत्तम कार्य करती है शरीर के जिस भाग मे भी जीवाणु शांत अवस्था मे पड़े हो वहाँ पहुँच कर उसका नाश करती है। गिलोय का उपयोग शरीर मे इंसुलिन की उत्पत्ति व रक्त मे इसकी घुलनशीलता को बढ़ाती है । इससे सुगर कम होती है।

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गिलोय की पत्ती व तना


एक हफ्ते से अधिक चलने वाले ज्वर मे 40-45 ग्राम नीम गिलोय को कुचल कर 250 ग्राम पानी मे मिला कर किसी मिट्टी के बर्तन मे रात भर ढक कर रखते है । सुबह इसे मसल कर व छान कर इसकी 20-25ग्राम मात्रा दिन मे तीन बार पीने से ज्वर का नाश होता है।

गिलोय के सवरस की 20 ग्राम मात्रा मे 1 ग्राम पिपली व 1 चम्मच शहद मिला कर प्रातः एवं शाम को सेवन करने से ज्वर,कफ,अरुचि आदि रोग नष्ट होते है।

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गिलोय व अण्डुसा छाल की बराबर मात्रा, आधा ली. पानी मे पकाय जब चौथा हिस्सा बाकी रह जाए तो ठंडा करके शहद मिला कर पीने से सर्दी,बुखार खांसी शांत होती है।

गिलोय की 10-20 ग्राम मात्रा मिश्री के साथ सेवन करने से पित्त की परेशानी नही होती। शहद के साथ सेवन करने से कफ का नाश होता है। सौंठ के साथ सेवन करने से आमवात मिटता है । इसका उपयोग रोग के अनुसार उचित अनुपात मे सात दिनों तक करना चाहिए। गिलोय का उपयोग बुखार एवं अनेक रोगों मे बहुता किया जाता है।


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