नंदिनी...

21 फरवरी 2019   |  श्रीमती अर्चना श्रीवास्तव   (34 बार पढ़ा जा चुका है)

नंदिनी... - शब्द (shabd.in)

'तुमको तो कोई चिंता ही नहीं है बस अपने चार पंचों को लेके बैठ जाते हो गपशप करने, थोड़ा घर की तरफ भी देख लिया करो, घर में जवान बेटी बैठी हुई है, लोग बातें करने लगे हैं तरह-तरह की। मगर..तुम... तुमको क्या....' नंदिनी की मां ने मुंशी जी के घर आते ही उन पर लगभग रोज की तरह बरसना शुरू कर दिया। करती भी क्या बेटी का भरा पूरा शरीर देखकर उसे भी चिंता खायी जा रही थी। मगर ऐसा नहीं था कि मुंशी जी को उसकी चिंता नहीं है वो भी जगह-जगह जाकर एक अच्छा सा वर अपनी लाड़ली बेटी के लिए तलाश करते फिरते हैं गांव भर में। मुंशी की काफी इज्जत थी गांव भर में, सब सम्मान से उन्हें देखते थे मगर मुंशी ईमानदार होने के कारण जिंदगी भर कुछ पैसा-धेला जोड़ न पाये।


नंदिनी...एक पड़ी-लिखी और गृहकार्य में दक्ष परिपूर्ण थी। नंदिनी की शादी की चिंता मुंशी जी को उसके बचपन के दिनों से ही सताती रही है। वो जानते थे कि लड़की के जन्म के साथ-साथ उसकी शादी की चिंता व दहेज प्रथा चलन की प्रथा के वजह से उन्हें उसके विवाह के लिए काफी दिक्कत आ सकती है और कितना भी अमीर आदमी हो लड़की की शादी के लिए हर माता-पिता चिन्ता में रहते है। उस पर बेटी का कद से छोटा होना ये एक पिता के लिए बहुत बड़ी समस्या होती है। एक पिता के लिए यदि बेटी की कद-काठी न बड़े तो ये चिन्ता कई गुना बढ़ जाती है।


नंदिनी की उम्र भी अब शादी लायक हो चुकी थी पर उसकी कदकाठी से वह बच्ची ही दिखाई देती थी। उसकी मां को भी ये चिंता खाये जा रही थी पर वह तो अपने पति से कह कर अपना दिल को हल्का कर लेती पर मुन्शी जी जो कि एक सीधे-साथे और ईमानदार व्यक्ति थे वो कहां से लाते इतना पैसा कि उनकी नाटी बेटी को कोई अपना वर दे देता। कुछ लोगों ने तो कहा कि भाई अगर बेटी की कद काठी कम है तो सोने की कुछ सिक्कों को अपनी बेटी के सर पर रख दो वह अपने आप विदा हो जायेगी.... पर न तो मुंशी के पास इतना दहेज देने को पैसे थे और न ही वह अपनी बेटी को किसी ऐसे व्यक्ति के साथ बांधना चाहते थे जो कि लालची या नाकारा हो।

बेटी नंदिनी भी अपने माता-पिता के इस दु:ख से दुखी रहती की कि न जाने मेरे कर्मो की सजा मेरे माता-पिता को क्यों मिल रही है नंदिनी में नाटे कद के अलावा कोई और खामी नहीं थी।

कुछ दिन बाद...


'जल्दी से खाना लगाओ मुझे बहुत भूख लगी है आज पूरा दिन हो गया कुछ खाया ही नहीं...' मुंशी जी घर पर आते ही नंदिनी की मां से कहा।


'क्यों, क्या हुआ सुबह ही तो बोल रही थी खाना खा लो मगर तुमको तो पता कहां जाना था जल्दी'...नंदिनी की मां खाना परसते हुए बोली।


मुंशी जी - 'अरे, जल्दी आओ तुम्हें एक खुशखबरी सुनाता हूं'...


नंदिनी की मां -' क्या हुआ, खाना तो परोसने दो'...


मुंशी जी - 'अरे रहने दो तुम तो, आज तो भूख भी परेशान नहीं कर सकती मुझे'...


'अरे बस आई...हां अब बोलो क्या बोल रहे थे'... नंदिनी की मां खाना मुंशी जी को खाना देते हुए


'नंदनी की शादी पक्की कर के आ रहा हूँ, बहुत अच्छे लोग हैं,'


'अच्छा सच, क्या करता है लड़का, घर वाले कैसे हैं, कितने भी बहन है, अच्छा खासा कमाता होगा, नौकरी करता है या खुद का कुछ करता है....'


'अरे.... अरे, भागवान रुको तो, मुझे भी तो बोलने दो। तुम तो बस बोलती ही जा रही हो' मुंशी ने नंदनी की माँ को बीच मे रोकते हुए बोला।

'अरे क्या बताऊँ तुम्हे लड़के का बाप जौहरी है अच्छी बड़ी दुकान है बीच बाजार में, लड़का भी वाहन बैठता है आज नही तो कल वो दुकान उसकी ही होगी। मैने जब बिटिया का फोटो दिखाया तो लड़के बाप एक दम राजी हो गया। लड़का भी मान जाएगा। लड़का तो सीधा साधा है पूरा बाप का आज्ञाकारी है। और होना भी चाइये, आखिर इतनी बड़ी दुकान जो चलता है बाप उसका।


'मगर तुमने नंदनी के बारे में सब बोल दिया। क्या वो मान गए।'


'हाँ हाँ बोल दिया, उनको कोई समस्या नही है उन्हें तो बस सुशील और आज्ञाकारी और घर के काम काज में निपुण बधू चाइये। अरे उन्होंने तो विवाह की तारीख भी निकलवा दी। इश्लिये तो मुझे आने में देर हो गई।'

'ये तो बड़ी अच्छी बात है ईश्वर की कृपा है हम पर लड़कीं के तो भाग्य खुल गए।'


नंदनी ये सब अंदर अपने कमरे से सुन रही थी, उसे लग रहा था कि इतने अच्छे लोग कैसे मिल गए, पैसे वाले होने के बाबजूद मुझसे शादी क्यों करना चाहते है। और मेरे प्यार का क्या होगा।


क्या थी नंदनी की चिंता, उसका प्यार या उसका बिता हुआ कल जानेगे अगले भाग में....


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