शादी की पीड़ा

23 फरवरी 2019   |  विजय कुमार तिवारी   (16 बार पढ़ा जा चुका है)

कहानी

शादी की पीड़ा

विजय कुमार तिवारी

विभा,जीवन के इस उहापोह में,सागर के इस महागर्त में आज भी मैं अकेला ही हूँ। अकेला होना ही शायद मेरी नियति है।जुड़ने का क्रम जाने कितनी बार शुरु हुआ,अंततः वहीं गया ,जहाँ से चला था।इन सम्पूर्ण चेतन-अचेतन हालातों में तुम्हारा और तुम्हारे घर वालों का ज्यादा प्रयास रहा है।तुम लोगो ने भी कम खेल नही खेला है।सच तो यही है कि सबकुछ सुनकर,वायदों को सही मानकर ही इस निष्कर्ष पर पहुँचा था कि तुमसे जुड़ लूँगा।

लोग कहते हैं-नियति को कोई टाल नहीं सकता।मैं था कि नियति को ही चुनौती मान बैठा था।कहाँ तक अच्छा किया और कहाँ तक सफल रहा,इसका निष्कर्ष मेरे सामने है।

प्रारम्भ में तुम्हारे चाचा जी मुझसे मिले थे।वे बड़े भोले,निष्कपट तथा हँसमुख लगे थे। उम्र में अन्तराल होते हुए भी हमलोग मित्रवत रहे।उन्होंने मुझे एक तस्वीर दी थी। वह तुम्हारी तस्वीर थी। देखा-तुम सुन्दर हो,भोली-भाली हो,तुम्हारी आँखें बड़ी प्रिय लग रही हैं।उन चमकती पुतलियों में झाँकने का प्रयास किया था।कैमरे के द्वारा समेटे हुए,पल भर की तुम्हारी भावनाओं को पढ़ने की कोशिश की।मैं उत्तेजित नहीं था,शान्त भी नहीं था।तस्वीर के पीछे एक नाम था, तुम्हारा नाम-विभा।

तुमने ही अपनी अंगुलियों को कष्ट देकर लिखा था।शायद वहीं कहीं मैंने स्वयं को खो दिया था।

तत्पश्चात् हमारे संरक्षकों को औपचारिकता का निर्वाहन कर लेना चाहिए था ताकि हम दोनो सदा सदा के लिए एक-दूसरे के हो जाते।लेकिन यहीं से समाज की दखलंदाजी शुरु हो जाती है।व्यक्तिगत निर्णयों को,ऐसे सन्दर्भो में समाज चुनौती मान लेता है।लम्बी राजनीति शुरु हो जाती है जिसकी भयावहता में भावनायें,प्यार,सहानुभूति सबकुछ मिटकर रह जाते हैं।उन दिनो यह सब नहीं जानता था या जानता भी था (दूसरों के सन्दर्भ में)तो यही होगा, ऐसी उम्मीद नहीं थी।

धीरे-धीरे तुम्हारे चाचा जी की बातें परस्पर विरोधी होने लगी।समझते हुए भी मैंने अन्यथा नहीं सोचा।सोचता था-अभी तुम्हारे पिताजी हैं,मेरे पिताजी हैं,अन्य लोग हैं,सारी बातें स्पष्ट हो जायेंगी। ऐसा नहीं हुआ।परिस्थितियाँ जटिल होती गयीं,गुत्थियाँ पड़ती गयीं।भले ही तुम्हे कुछ भी ज्ञात नहीं हो रहा हो पर मैं सचेष्ट था,जाग्रत था परन्तु लाचार था।

एक सत्य बताना चाहता हूँ विभा,उन दिनों मुझे कहीं और जोड़ा जा रहा था और मेरे सामने उसकी भी तस्वीर थी।पता नहीं क्यों हर किसी ने उसे ही पसन्द किया।जब कभी तस्वीरों में से चयन की बात होती थी तो हर कोई तुम्हारी तस्वीर को परे कर देता था। सच विभा,कोई नहीं था जो तुम्हारी तस्वीर को उठाता और कहता कि यह लड़की है वैभव,इसी से तुम--------जबकि मैं यही चाहता था।समझ नहीं पा रहा था--आखिर कारण क्या है तुम्हें नापसन्द करने का।कभी-कभी तुम्हारे चाचा जी को निराश होते हुए देखता था।

हमारी परिपाटी कितनी विचित्र है विभा,शादी लड़के-लड़की की होगी, उस पर बहस होगी बुजूर्गॊ के दरबार में और वह भी दान-दहेज पर।मुझे इसमें कोई रुचि नहीं है।मुझे पता था कि तुम्हारे घर वाले उतना नहीं दे पायेंगे जितना अन्यत्र से मिल रहा था।मैं इसके खिलाफ था और घर में सभी इस बात को जानते थे,फिर भी सभी की राय तुम्हारे विपरीत थी।

एक ओर विशाल नारी विकास आन्दोलन चल रहा है तो दूसरी ओर उससे भी तीव्रतर विरोध हो रहा है।नारियाँ प्रताड़ित की जा रही हैं,जलायी जा रही हैं।समाज में बहुत सी बातें हो रही हैं जिससे नारियों को दबाया जा रहा है।विभा, एक सच यह भी है कि तुम लोग भी स्वयं को उठाना नहीं चाहती।कम से कम अपने भविष्य का और अच्छे-बुरे का ध्यान तो रखना ही चाहिए।हर नारी को अपने और अपने समाज के प्रति जागरूक होना चाहिए।

उन दिनो मैं ऐसी ही बातें सोचता रहता था और चाहता था कि किसी भी नारी को दुखी,अपमानित नहीं होना पड़े।मुझे उम्मीद पिताजी से थी और उचित अवसर की प्रतीक्षा में था ताकि अपनी बातें उनके सामने रख सकूँ।

गाँव से पिताजी का पत्र आया।स्पष्ट आदेश था कि मेरी शादी उस लड़की से तय कर दी गयी है जिसकी तस्वीर सभी को पसन्द थी।उस समय तुम्हारे चाचा जी भी आये थे और परिस्थितियों से समझौता करने की सलाह देकर चले गये।पड़ोस की मीना ने भी उसे ही पसन्द किया।तुम्हारी तस्वीर छिटक कर किनारे हो गयी थी। दूर से विचित्र सी हसरत भरी निगाहों से तुम देख रही थी। भीतर-भीतर मैं टूटने लगा था परन्तु विरोध करने की हिम्मत नहीं थी मुझमें। मीना मेरी ओर देख रही थी। शायद उसने कुछ दरकता हुआ महसूस कर लिया था।वह इस बात का प्रयास कर रही थी कि मेरी नजरों से तय कर पाये।क्या यह सम्भव था?उसने कहा,"आज मैं बहुत खुश हूँ।"जबकि उसकी आँखें भर आयी थी।वह एक जीवट वाली लड़की है।उसके पास स्वयं निर्णय लेने की क्षमता है।उसने मुझसे अनेकों बार कहा है कि शादी के मामले में खुद देखेगी और तभी हाँ कहेगी जब स्थिति अनुकूल रहेगी।विभा,मैं तुमसे भी ऐसी ही उम्मीद रखता हूँ।समझौता करने के लिए पूरी जिन्दगी पड़ी है।चयन करने और पसन्द-नापसन्द करने का तुम्हारा अधिकार है।तुम्हारी ओर से कोई संकेत नहीं मिल रहा है जबकि मैं तुम्हारा अधिकार तुम्हें देना चाहता हूँ।

आज के लोकतान्त्रिक समय में बहुमत की जीत होती है।मुझे अनेक तर्क दिये गये हैं और समझाया गया है।लोगों ने तुम्हें अलग कर दिया।सच कहता हूँ-मुझे अच्छा नहीं लगा।मैं हार गया था और हारा हुआ सा चौराहे पर खड़ा था।एक दोस्त को तिलक ना लेने की सलाह दी थी।लड़की वाले भाग गये कि अवश्य ही कोई अन्दरूनी बात होगी। मुझे बहुत दुख हुआ।सत्य को लोग ऐसे झुठला रहे हैं।मुझे अपने समाज की विडम्बना पर आश्चर्य हो रहा था। मैं लज्जित था और दुखी भी।अभी भी तुम्हारी तस्वीर मुझे आकर्षित कर रही थी जबकि मेरे हाथ में किसी और की तस्वीर थी। इस तथ्य को हमारा समाज क्यों नहीं समझता?

अभी तक के निर्णय के अनुसार उसे ही मेरा होना था।हारे हुए की तरह वहाँ से चल पड़ा।अब मुझे उस नयी तस्वीर से तालमेल बिठाने के लिए स्वयं को तैयार करना था ताकि सही अर्थो में उसका हो सकूँ।

परन्तु ऐसा कुछ भी नहीं हुआ।एक दिन गाँव से पत्र आया कि वह तस्वीर भेज दो,वापस करनी है।ये शादी नहीं होगी।

सोचो विभा,क्या गुजरी होगी मुझपर,मेरी मानसिक स्थिति पर,मेरी भावनाओं और जज्बातों पर?दिल के हालात पर और अपनी लाचारगी पर खूब रोना रहा था।किसी को कोई मतलब नहीं और हमारा समाज मूक बनकर देख रहा था। सच विभा,मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगा।वैसे भी,मैंने स्वयं को बड़ी मुश्किल से तुम्हारी मायूश और खामोश निगाहों से अलग किया था।तदन्तर उस तस्वीर की रुपसि से,यह निश्चित मानकर कि रिश्ता हो ही रहा है,एक तरह की आत्मीयता बनने लगी थी।विभा,यह सच है कि मैंने उस तस्वीर की मूर्ति बनाकर,अपने मन-मन्दिर में भावी पत्नी की प्राण-प्रतिष्ठा की थी।उसमें से रह-रहकर शान्तिमयी देवी की छवि की झलक मिलती थी।

इसी बीच किसी दिन तुम्हारे चाचा जी आये और तुम्हारी तस्वीर उठा ले गये।बेमन से मैंने तुम्हें जाने दिया।लगा-तुम्हारी तस्वीर नहीं जा रही,तुम जा रही हो।अच्छा लगा कि तुमने मेरी तस्वीर नहीं लौटाई।शायद लौटा नहीं सकी या लौटाना नहीं चाहती थी।ऐसा भी हो सकता है कि तुम्हें स्वयं पर विश्वास हो।तस्वीर ले जाते समय तुम्हारे चाचा जी ने बताया था कि तुम इस पक्ष में नहीं हो कि तस्वीरें वापस ली या दी जाय।कितना मेल था-मेरे-तुम्हारे विचारों में?

अब मैं खाली था-भीतर और बाहर।किसी भी काम में मन नहीं लगता था।कुछ भी कहने-सुनने लायक नहीं था।प्रतीक्षारत था-फिर शुरु होगा कोई नाटक। कोई और तस्वीर आयेगी,कुछ दिनों बातें होंगी।पुनः उस तस्वीर को वापस करना होगा।एक बात बताना विभा,क्या इस तरह बार-बार तस्वीर देने और लौट आने से तुम लोग टूटती नहीं हो?क्या तुम्हारे अस्तित्व और सामाजिक स्थिति पर चोट नहीं लगती?मैं टूट सा गया था।समाज अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए व्यक्ति की भावनाओं को कुचल देता है।

यह सही है विभा,हम दोनो ने अभी तक एक-दूसरे को देखा नहीं है,कभी मिले नहीं हैं।हमारी तस्वीरे एक-दूसरे के पास रही हैं।पर क्या एक रिश्ता,भले ही मानसिक तौर पर ही हो,हम दोनो के बीच जुड़ नहीं गया है?

फिर किसी दिन तुम्हारे चाचा जी आये।शायद उन्हें पता चल गया था।उन्होंने पुनः प्रस्ताव रखा और शादी की बातें होने लगी।क्या तुम आशावान नहीं थी?मुझे पूरी उम्मीद थी और सोचा था कि घर वालों को समझा लूँगा।हालांकि,ऐसी कोई जरुरत ही नहीं पड़ी।तुम्हारी और मेरी शादी तय हो गयी।विभा और वैभव एक होने वाले थे।मुझे खुशी हुई कि तुम्हारी तस्वीर को दिया मेरा वचन पूर्ण होने जा रहा था।अब जबकि मेरे पास तुम्हारी कोई तस्वीर नहीं है,मुझे तुम्हारी स्मृति हो आयी।गौरवान्वित महसूस कर रहा हूँ और भीतर प्रेम की अनुभूति हो रही है।उम्मीद है-तुम भी प्यार की ऐसी ही भावनाओं में डूब-उतरा रही होगी?

शंका भी उभरी।शंकालु मैं स्वयं हुआ।उस दिन जब शादी तय हो रही थी,तुम्हारे पिता जी नहीं आये।उनके नहीं आने का जो भी कारण हो,यहाँ लोगों ने बातें बनायी और नाना तर्क-कुतर्क हुआ।

अब तुम उन प्रश्नों,प्रसंगों पर ध्यान देना जो बाद में शादी हो पाने का कारण बने।हम दोनो के बीच दीवार खड़ी हो गयी।यह बहुत ही मजबूत दीवार थी जिसे मेरे सारे तर्क डिगा नहीं सके।दीवार के उस पार दुल्हन सी सजी-सँवरी,सौन्दर्य की मूर्ति सा तुम्हारा अस्तित्व धूमिल सा लगने लगा।सच कहता हूँ--अब तुम्हारी प्रतीक्षा भी बेमानी लगने लगी।

जानती हो विभा,उस दीवार के निर्मण में तुम्हारे अपनो का ज्यादा हाथ है।देखते-देखते घना अंधकार छा गया है।मेरे प्रश्न मुझे चैन नहीं लेने दे रहे और शंकाये निरूत्तर बना रही हैं।इसलिए बता रहा हूँ कि तुम स्वयं को मेरी जगह पर रखकर निर्णय कर सको और मेरी मजबूरी,मेरी शंकाओं और मेरे आकर्षण को समझ सको।

मैंने यहाँ इस शहर में अपने विचार-व्यवहार से बहुत कुछ सहेजा है और अच्छे लोगों ने आदर-सम्मान दिया है।तुम्हारे चाचा जी को मेरे भावी रिश्तेदार के रुप में लोग पहचानने लगे हैं।

शादी में भी एक तरह की राजनीति होती है।उस दौड़ मे मेरी क्या बिसात?लोग चालें चलते हैं,पासा फेकते हैं।शायद इस तरह वे अपनी पहचान बनाते हैं और प्रभूत्व भी।उस दौड़ में मेरी-तुम्हारी छवि लुप्तप्राय है जैसे हम कोई गुड्डा-गुड़िया है।क्या तुम्हारा चेतन मन स्वीकार करता है?

तुम्हारे इन अपनो ने मेरी स्वतन्त्रता छिन ली है।तुम्हें अच्छा लगेगा यदि मेरे चाचा जी या कोई रिश्तेदार तुम्हारे साथ दिन भर में अनेकों बार मिले-जुलें और तुमसे बातें करें?तुम्हारे चाचा जी यही कर रहे हैं।अपने मित्रो के साथ धमकते हैं और ऐसी-ऐसी बातें करते हैं कि मेरा मन खिन्न हो उठता है।वे लोग मेरे हम उम्र नहीं हैं और दोस्त भी नहीं है।उन्होंने यह भी समझने की कोशिश नहीं की है कि मुझे क्या पसन्द है।उनसे मैं इस स्तर तक नहीं उतर सकता।

तुम्हारे बारे में,तुम्हारी शिक्षा के बारे में असत्य बताया गया है।तुम्हारी बुआ आयीं मुझसे मिलने और शादी ना करने का कारण पूछने।तुम्हारे पिता या उनके भाईयों में से कोई क्यों नहीं आया?सुना है-तुम्हारे पिता जी जहाँ जाते हैं,शादी तय नहीं हो पाती।ऐसा क्या है?यह तो बहुत जरुरी है कि पिता सन्तुष्ट हों।तुम्हारी बुआ शिक्षिका हैं और उन्होंने जो तुम्हारे स्नातक होने का प्रमाण दिखाया उसमें तुम्हारे नाम में "देवी" लिखा था।या तो तुम पहले से ही शादी-शुदा हो या यह किसी दूसरे का प्रमाण-पत्र है।तुम गाँव क्यों भेज दी गयी हो,अपने माँ-पिता से दूर,दादी के पास?तुम्हारी बुआ से मैने सीधे पूछा था।कोई तुम्हें चाहता था,यह समस्या नहीं है।समस्या यह है कि तुम क्या चाहती हो?

मैने वह पत्र पढ़ा है जो तुमने अपने चाचा जी को तस्वीर के साथ भेजा है।तुमने हमें"विचित्र" कहा है।क्या मैं जान सकता हूँ कि कौन सी विचित्रता है हम लोगों में?

मुझे पता है कि तुम्हें क्रोध रहा होगा,तुम्हारा सुन्दर गौरवर्णीय चेहरा तमतमा रहा होगा।तुमने गुस्से में मेरी तस्वीर फाड़ दिया होगा।मुझे दुख है कि तुम भी सम्मिलित रही हो इन सभी छल-प्रपंचो में।विभा,तुम्हारे लिए मेरे भीतर का स्नेह स्रोत सुख गया है।

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