लोकतन्त्र

27 फरवरी 2019   |  रवि रंजन गोस्वामी   (19 बार पढ़ा जा चुका है)

लोकतन्त्र

लोकतन्त्र, आज़ादी, अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता,संप्रदायवाद, सेकुलर ये बड़े बड़े शब्द राजनेता और राजनीतिक पार्टियों द्वारा हर दिन अनेकों बार प्रयोग किये जाते हैं। संसद में आये दिन होने वाला हँगामा और पूरे पूरे सत्र संसद न चलने देना भी लोकतन्त्र है। इसमें बदलाव आना चाहिये। यूं तो सड़क पर भी आप को सभ्यता से पेश आना चाहिये लेकिन फिर भी कह सकते है सड़क छाप व्यवहार संसद में नहीं होना चाहिये। देखने में आता है अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता की बात उन्हीं के द्वारा उठायी जाती है जो अपनी बातों से किसी का अपमान करते है, किसी की भावना को चोट पहुंचाते है या राष्ट्र विरोधी बातें करते हैं।उदाहरण के लिए जे एन यू में एक अंतराल पूर्व लगाये गये भारत विरोधी नारे कौन भूल सकता है।

संप्रदाय वाद और सेक्युलर शब्दों का इतना दुरुपयोग किया गया की इनके मायने ही बदल गये लगते हैं।

लोकतन्त्र का एक विकृत रूप ये भी कि लोग एक दूसरे का विरोध के लिए विरोध करते हैं। राजीतिक पार्टियों का उद्देश्य मात्र सत्ता प्राप्त करना है। जो पार्टी सत्ता में होती है उसका बहुत सा श्रम सरकार बचाये रखने में लगता है और विरोधी पक्ष पूरी शक्ति से 24x7 सरकार की हर अच्छी बुरी बात का विरोध करता है।

आजकल यह विरोध इतनी मर्यादा हीनता और कड़वाहट से भरा होता है कि देश और जनता का हित अहित सोचा जाता हो इसमें शक है।

कभी तो ऐसा लगता है देश का कोई नुकसान भी हो तो विपक्ष खुश होता है क्योंकि उसे सत्ता पक्ष की बुराई करने के लिये मुद्दा मिलता है।

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