बदलते हुए लोग

01 मार्च 2019   |  विजय कुमार तिवारी   (25 बार पढ़ा जा चुका है)

श्री रमेश नीलकमल द्वारा सम्पादित"एक और आसमान" में संकलित कहानी

बदलते हुए लोग

विजय कुमार तिवारी

स्थितियाँ धीरे-धीरे बदलती हैं तो रिश्ते-नाते भी नयी-नयी शक्ल लेने लगते हैं।दीना पांडे के घर का माहौल भी कुछ इसी दिशा में जा रहा है परन्तु वे मानने को तैयार नहीं हैं।उनकी एक ही रट है कि बाप,बाप होता है और बेटा,बेटा।

रतन ने अपने तई सामंजस्य कर लिया है।अब वह नहीं बोलता,बाप से जिरह-बहस नहीं करता,बस चुपचाप अपना काम करता रहता है।काम का अपना सुख है।जीवन का आनन्द इसी में है।गाँव की हवा-पानी में रहकर भी वह ऐसा नहीं है।बीड़ी,गांजा,भांग से मीलों दूर रहकर अपने काम से मतलब रखने वाला शायद ही आज के गाँवों में टिक सके।पर,रतन टिका हुआ है और टिका रहेगा।

श्रम की जो परम्परा उसके परिवार में चली रही है उसे आज उसने अपने कंधों पर उठा लिया है। पूरी तरह लगा हुआ है रतन।

दीना पांडे का बड़ा लड़का सपरिवार गाँव आने वाला है।पूरा परिवार बेसब्री से प्रतीक्षा कर रहा है।तीन साल पहले बहू भी चली गयी थी।जबसे बहू गयी है,रुपये-पैसे तो दूर,चिठ्ठियाँ भी आनी बंद है।पहले हर माह पाँचवी,सातवीं तारीख तक डाकखाना से दीना पांडे एक रकम ले आते थे।बहू के जाने से खर्च बढ़ गया होगा,यही सोचकर अब संतोष कर लेते हैं।कभी-कभार छ्ठे-छमासे चिठ्ठी गयी तो नाती-पोतों का समाचार मिल जाता है।इस पर रतन की माँ कभी-कभी चिढ़ती है।दीना पांडे समझा देते हैं,"बाल-बच्चों का भविष्य देखना ही है।अब यहाँ दादी की गोदी में पढ़ाई-लिखाई तो होगी नहीं।पढ़ाने के लिए वहाँ रहना जरुरी है।मैने उसे पढ़ाया।अब वह अपने बच्चों पर ध्यान दे तो अच्छा ही है।"

रतन की माँ प्रतिवाद करना चाहती है।दीना पांडे चुप करा देते हैं,कहते हैं,"यही क्या कम महत्व की बात है कि मेरा लड़का बाहर कमाता है।"

चिठ्ठी पाकर दीना पांडे उतावले हो उठे।उन्होंने जोर से कहा,"अरे रतन की माँ,देखो बड़का घर रहा है,बाल-बच्चे भी रहे हैं।"

इस खुशी,उत्साह और प्रतीक्षा में रतन भी है।उसने खांची उठायी और सरेह की ओर चल पड़ा।ठिगना कद,छोटी-छोटी मुंछें,पिचके हुए गाल,हल्की सी बेतरतीब उगी दाढ़ी,बिल्कुल बाप पर गया है।

लहलहाती हुई खेती देखकर उसका मन खिल उठा।खेतों में बालियाँ निकल आयीं हैं।हवा के संस्पर्श से पौधे हिल-डुल रहे हैं।दूर तक फैली हुई फसल कभी इधर झुकती है,कभी उधर तो एक तरह का संगीत फुटता है।रतन अनुभव करता है-धरती,आकाश,हवा,पानी और उसके श्रम से निर्मित संसार का संगीत है यह। दूर-दूर तक फैले हुए,खुले-खुले से खेतों का सौन्दर्य उसके अथक श्रम का उपहार है।

सरेह जाने के पहले उसने बैलों को नाद पर चढ़ाकर सानी-पानी डाल दिया था।यह रोज का नियम है।जल्दी-जल्दी उसने चारा समेटा और घर की ओर चल पड़ा।अब दिन गर्म होने लगे हैं अन्यथा माघ की ठंड में हाथ-पाँव ठिठुर जाते थे।शरीर पर पर्याप्त कपड़े भी नहीं रहते कि भीषण ठंड की मार से बचा सके।इस तरह ठिठुर-ठिठुर कर उसने पूरी शीत झेली है।

रतन ने दूर से ही देखा कि बैल मुँह उठाये इधर-उधर देख रहे हैं।उसे खीझ सी हुई-दुआर पर बैठे-बैठे गप्पबाजी होती रहेगी,चिलम का धुँआ निकलता रहेगा परन्तु किसी से यह नहीं होगा कि एक खांची लेहन नाद में गोत दे।उसे खेतों की तरह अपने जानवरों से भी प्यार है।उनके वशीभूत रहता है।खा-पीकर जब वे टन्न हो जाते हैं तो रतन उनकी पीठ पर हाथ फेरता है,उनकी पुष्ट मांसपेशियाँ देखता है और गद्गद होता है।हमेशा वह इस कोशिश में रहता है कि कभी भी उनकी रोहानी में कमी नहीं आये।

माथे का बोझ उसने पलानी में पटका और जल्दी-जल्दी लेहन गोतने लगा।जब फिर से बैलों ने नाद में मुँह डाल लिया तो वह गाय दुहने में लग गया।जब सारा काम हो गया तब उसने दतुअन उठायी।

उधर घर के भीतर शोर मचा हुआ था।माँ गालियाँ दे रही थी।उसने जल्दी-जल्दी कुल्ला किया और भीतर पहुँच गया।स्थिति उसकी समझ में नहीं आयी।तब उसने माँ से ही पूछा,"काहें हल्ला हो रहा है?"

"जो,मेहरी से पूछ,हमसे काहें पूछता है?"

उसने माँ की ओर देखा।माँ का रौद्र रुप देखकर वह डर गया।यही तो होता रहा है हमेशा से।डरता और सहमता रहा है वह।कभी माँ से तो कभी बाप से।वह दुखी हो उठा।

"अच्छा चुप रहो,"बाप ने समझाना चाहा।

"का चुप रहीं?घर नहीं रह गया है अब।महामाया का नाज-नखरा बरदाश्त नहीं होता।अब ले जाये रतना,जहाँ मन आवे।बिला जाये दोनो,"माँ रोने लगी।उस रुदन में आलाप-प्रलाप अधिक था,रोना कम।

आखिर कहाँ जाये वह?पढ़ाई-लिखाई तो हुई नहीं।अब तो पढ़े-लिखे लोगों को भी दर-दर भटकना पड़ता है।भला मुझ बेपढ़ा को कौन पूछेगा?जब पढ़ने की उम्र थी तो बाप ने ही बँटवारा कर दिया था,बड़ा बेटा बाहर कमायेगा,छोटका खेती-बारी देखेगा। तब से वह लगातार देख ही रहा है।खेतों का उत्पादन बढ़ा ही है।घर का सारा खर्च इसी खेती पर है।कमाकर कितना भेजता है भैया,क्या मालूम नहीं है?नहीं होता रतन तब मालूम पड़ता।

"तुम तो बीमार हो,"रतन ने कमली के माथे पर हाथ रखा और सिहर उठा,"शरीर में ताप है और मुझे बताया नहीं।"

"आते ही कहाँ हैं आप?"कराहते हुए कमली ने धीरे से कहा।

तड़प कर रह गया वह।कैसे आये?दिन भर खेतों में काम,सुबह-शाम दुआर पर गोरु-बैलों के साथ,बाजार-हाट जाना,पल भर को भी आराम कहाँ?यहाँ तो दम लेने तक की फुर्सत नहीं।रतन मन ही मन डर उठा,कहीं कोई भयंकर बीमारी तो नहीं।

धीरे-धीरे उस पर एक तरह का क्रोध हावी होने लगा।ऐसी हालत हो चली और किसी ने ध्यान तक नहीं दिया।मुझे बताया तक नहीं।दिन-रात जांगर खटा रही है बेचारी।उस पर विपत्ति आयी है तो कोई आगे-पीछे तक नहीं।सबसे अधिक गुस्सा उसे अपनी माँ पर रहा था।बाहर बैठे-बैठे गालियाँ दे रही है।यह नहीं होता कि हालात मालूम करे।आवेश में उसने माँ को पुकारा,"देख रही हो,क्या हुआ है इसे?"

बिना कुछ बोले माँ वापस चली गयी।उसे अच्छा नहीं लगा।उसने बाप से पूछा।कोई जवाब नहीं मिला।गाँव में कोई डाक्टर नहीं,कोई बैद्य नहीं।बाहर जाने के लिए पैसा नहीं।

पुरवा हवा चलने लगी।उसका पोर-पोर दुखने लगा।मन पहले से ही दुखी था।शरीर की हालत ठीक नहीं थी।रतन बाहर निकल आया।

माँ किसी औरत से अपना दुखड़ा रो रही थी।बहू कुलच्छनी है।उसका पउरा ठीक नहीं है।जब से आयी है,परिवार में अशान्ति फैल गयी है।रतना उसी की सुनता है।कई सालों के बाद पाँव भारी हुआ है तो नखरा पसार रही है।अरे यह क्या वही जनेगी बच्चा?हमने भी जना है।

रतन ने जैसे अनसुना कर दिया।चुपचाप दुआर पर चला गया।लेहन को भरकने के लिए खोलकर पसार दिया।हवा लगने से ताजगी बनी रहती है,नहीं तो,औंसाकर महकने लगता है।गोरु-बैल नाद में मुँह तक नहीं लगाते।

लोहार के यहाँ से कल ही सान धराकर गड़ाँसी लाया था।धार तेज थी।सोचा,कुट्टी ही काट ले।सरेह जाने का मन नहीं किया।रतन कुट्टी काटने लगा।उसे बाप पर गुस्सा रहा था कि बार-बार आग्रह के बावजूद अभी तक चारा-मशीन नहीं खरीदी गयी।गाँव में अदना से अदना आदमी के घर चम्पाकल लग गया है पानी के लिए और कुट्टी काटने के लिए चारा-मशीन।यहाँ तो सब काम के लिए रतना है ही,क्या जरुरत?

रतन कुट्टी काट रहा था और ध्यान कहीं और था।मन की पीड़ा उसे बार-बार कुरेद रही थी।ऐसे में अचानक गड़ाँसी का एक भरपूर वार उसके हाथ पर लगा।अँगूठा के बगल से मांस का लोथड़ा बाहर निकल आया।खून की धारा बह चली।उसने बहुतेरा कोशिश की कि खून का बहना बन्द हो जाय। गमछे से बाँध लिया,फिर भी रिसाव बन्द नहीं हुआ तो यों ही छोड़कर खाट पर पड़ गया।

छोटन ने देख लिया।हल्ला मचाया कि भैया का हाथ कट गया।खून बह रहा है।उसने पड़ोसन चाची से मलहम माँगा।दीना पांडे हल्ला सुनकर बाहर निकले।उड़ती निगाहों से उन्होंने रतन को देखा।मन ही मन गुस्सा हुए,"ससुरा अन्धा हो गया है।काट लिया हाथ,दो-चार दिनों तक काम करने से जान जो बचेगी।"

रतन हाथ कटने से जितना दुखी नहीं था,इन स्थितियों से कहीं अधिक दुखी हुआ।घर में दूसरों की पीड़ा के प्रति लोगों के दिलों में जगह नहीं।ओह ऐसी शुष्कता,ऐसी हृदय-शून्यता?

कमली की दशा निरन्तर खराब होती जा रही है।शादी के कई सालों बाद भगवान की दया हुई है।रतन खुश है,कमली खुश है कि घर में बच्चा होगा,दोनो का अपना बच्चा।दोनो माँ-बाप बनेंगे।

हाथ कटने की बात सुनकर कमली के चेहरे पर पीड़ा उभर आयी।परन्तु लाचार थी,दुआर तक जा नहीं सकती थी।उसने छोटन से कहा कि भैया को भीतर बुला लाये।

धीरे-धीरे जब खून का रिसना बन्द हुआ तो रतन ने घर जाने के लिए उठना चाहा।चक्कर सा गया।आँखों के सामने अंधेरा छा गया।दीवार का सहारा लिया।खड़ा हो गया।वहीं बछड़ा बँधा था।उसने रतन के दूसरे हाथ को चाटना शुरु कर दिया।रतन का मन भर आया।बछड़े को थपथपाकर,विह्वल होता हुआ वह घर की ओर चल पड़ा।

"कहा था कि मत जाईये,"व्यथित हुई कमली उठ बैठी,"कुछ खाकर भी नहीं गये थे।"

"कहाँ कटा है?"भीतर आते हुए माँ ने पूछा।

कमली झट से खड़ी हो गयी।रतन ने अपना कटा हाथ बढ़ा दिया।इधर-उधर देखकर जैसे वह आश्वस्त हो गयी,चिन्ता की कोई बात नहीं।देर तक खड़ी रहने लायक स्थिति कमली की नहीं थी।शरीर से लाचार थी।कमर और पाँव में बहुत दर्द था।आखिर बैठ गयी।

"लाज और शरम भी नहीं है इस घर में,"माँ बुदबुदाती हुई बाहर चली गयी।

कमली दहशत से भर गयी।अब घण्टों माँ का रामायण जारी रहेगा।दुनिया भर की गालियाँ उसके हिस्से आयेंगी।अचानक जाने क्या हुआ,उसके पेट में मरोड़ होने लगी।खून का एक रेला निकला और बिस्तर पर पसर गया।कमली बेहोश हो गयी।घर में कुहराम मच गया।चमईन बुलायी गयी।गाँव की समझदार और अनुभवी औरतों को भी बुलाया गया।किसी की अक्ल काम नहीं कर रही थी।कमली पीड़ा से छटपटा रही थी।रतन असहाय खड़ा था।अंततः चार माह का गर्भ नष्ट हो गया।फफक कर रो पड़ी कमली।रतन उदास देखता रह गया।उसे हाथ की पीड़ा नहीं थी।दुख था तो बस यही कि कमली को डाक्टर से नहीं दिखा पाया।ईलाज होता तो शायद ऐसा नहीं होता। वे दोनो माँ-बाप बनते ही।यह सब इसीलिए हुआ कि उसके पास पैसा नहीं है।इतना श्रम करके भी वह मुँहताज है।बात आयी-गयी हो गयी परन्तु उसके मन में नासूर की तरह बैठ गयी।

दीना पांडे गाँव वालों से फसल की चर्चा कर रहे थे।लोगों ने कहा कि रतना के परिश्रम से इस साल फसल काफी अच्छी हुई है।खा-पीकर पाँच हजार से उपर का अनाज बिकेगा।घर में माँ से औरतें कह रही थीं कि बहू के चलते आराम ही आराम है।बेचारी दिन भर काम में लगी रहती है।उपर से तुम्हारा तेल-फुलेल भी कर देती है।

बड़का महीना भर की छुट्टी पर गाँव गया।गाँव की आबोहवा बदली बदली सी लगी। बच्चे गाँव आकर बहुत खुश हुए।अक्सर अपने छोटन चाचा के साथ सरेह में निकल जाते।बेटे ने माँ और कमली के लिए साड़ी,बाप के लिए धोती-कुर्ता और रतन,छोटन के लिए कपड़े-लत्ते खरीदे थे।बहू ने एक मुठ्ठी पाँच सौ रुपया माँ की हथेली में रख दिया।

कमली की हालत देखकर बड़ी बहू ने कहा,"डाक्टर से दिखाना चाहिए,जल्दी ठीक हो जायेगी।"

माँ ने कहा,"नहीं बहू,यह क्या ठीक होगी?जब से आयी है,ऐसी ही है।उसकी चिन्ता छोड़ो।थकान होगी।जा,थोड़ा आराम कर ले।"

बड़ी बहू ने मुस्कराकर पति की ओर देखा।रास्ते की थकान के चलते हल्का सा बुखार हो गया।माँ चिन्तित हो उठी।यह दवा,वह ईलाज,दौड़-धूप तेज हो गयी।दीना पांडे ने कहा,"देखना,बहू को कोई कष्ट हो।दो-चार दिनों के लिए आयी है बेचारी।"

कमली और रतन चुपचाप माँ-बाप को देख रहे थे।जीवन-समीकरण के कुछ सूत्र उनकी समझ में आने लगे।

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