रिश्ते

04 मार्च 2019   |  मंजू गीत   (40 बार पढ़ा जा चुका है)

बस कोई लूट ले जाता है, कोई लुट जाता है। दोनों के बीच रिश्ता निभा और समर्पित का है या नहीं इस पर सबकी अपनी-अपनी राय होगी। लौट आना और लौटाने में जितना फर्क है । उतना ही फर्क जीवन और जिंदगी में है। एक दूसरे के पूरक होते हुए भी बहुत से फर्क और समानताएं बीच में होते हैं। उन्हें साथ लेकर चलने और समझने को ही समझदारी कहते हैं। एक बांह खोलकर आने की इजाजत देता है तो दूजा उसमें अपनी जगह पा लेता है। वह अपनी बांह को खोल उसकी दी पनाह पर भरोसा जताता है। रिश्तों की रस्में, खून से ज्यादा कसमों में झलकती है। ये वादे कसमें ही होते हैं जो खून के रिश्तों से दूर एक नया जहां बसाने का दम रखती है। खून तो साक्षी बनता है, किसी अपने को किसी और को अपनाने में उसका साक्षी बनने के लिए। रिश्ते तो कसमों की कसमसाहट पर ही आगे बढ़ते हैं। फलते, फूलते, झूलते हुए बढ़ते जाते हैं, लदते जाते हैं, चलते जाते हैं। अगर इनमें जिम्मेदारी न हो, समझ न हो तो उलझते जातें हैं। सात वचन, सात जन्म वाली गठबंधन की गिरह भी फिकी पड़ जायेंगी, मन में लगी गिरह सब रिश्तों को फर्ज अदायगी बना देती है। निबाह, सुलह, समझ ही कच्चे धागे में विश्वास भर रिश्तों की आत्मिकता को मजबूत करती है। जीने की हसरत को पंख देती है। चाह को राह और चाहत को जगह देती है। किमत और रस्में रिवाज तो जिस्मों को धर्म में बांध कर्म की परिभाषा से मिलवाते हैं। एहसास की तस्वीर और आत्मा की आवाज सिर्फ खुद में ही महसूस की जा सकती है। इनकी अभिव्यक्ति किसी परिभाषा में नहीं सिमट सकती।

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