बेटियां अच्छी, लेकिन चाह फिर भी एक बेटे की ही

08 मार्च 2019   |  मिताली जैन   (51 बार पढ़ा जा चुका है)

बेटियां अच्छी, लेकिन चाह फिर भी एक बेटे की ही

आज अंतरराष्टीय महिला दिवस के दिन जब पूरे विश्व में महिलाओं की कामयाबी, उनके गुणों व क्षमताओं का बखान किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर फिर भी लोग मन ही मन एक बेटे की ही आस करते हैं। यह सच है कि आज के समय में स्त्रियों ने अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन हर मोर्चे पर किया है। मैरी काॅम से लेकर मानुषी छिल्लर, हिमा दास, आंचल ठाकुर, अवनि चतुर्वेदी, फोगाट सिस्टर्स, साक्षी मलिक, पीवी सिंधु, साइना नेहवाल और न जाने कितनी ही लड़कियों ने यह साबित करके दिखाया है कि अगर उन्हें मौका मिले तो वह भी आसमान छूने की ताकत रखती हैं। लेकिन इसे पित्तृसत्तात्मक समाज की सोच की उपज ही कहा जाएगा कि आज भी लड़की पैदा होने के बाद हर घर में लोग एक बेटा होने की उम्मीद लगाए रहते हैं और इसके लिए किसी भी तरह की अमानवीय हरकत करने से नहीं चूकते। ऐसी कितनी ही घटनाएं भारत में देखने सुनने और पढ़ने को मिलती हैं, जब एक स्त्री पर लड़की पैदा करने के बाद लड़का जन्म देने के लिए अत्यधिक दबाव डाला जाता है। पिछले दिनों महाराष्ट में भी एक ऐसी ही घटना देखने को मिली, जब एक परिवार की बेटे की चाह ने एक महिला की जान ही ले ली।

महाराष्ट के बीड जिले में एक स्त्री को उसके परिवारजनों ने दस बार इसलिए गर्भाधान के लिए मजबूर किया ताकि एक बेटे को जन्म दे सके और प्रसव के दौरान उस महिला की अधिक खून बहने से मौत हो गई। इतना ही नहीं, उसका शिशु भी मृत ही पैदा हुआ। उस स्त्री की पहले से ही सात बेटियां हैं, जिसमें से एक की मौत भी हो चुकी है और दो बार उसका गर्भपात भी करवाया जा चुका था। उस स्त्री के उपर बेटा पैदा करने का दबाव कुछ इस कदर था कि न चाहते हुए भी उसने फिर से गर्भधारण किया। पुलिस ने इसे दुर्घटनावश मौत का मामला दर्ज किया है लेकिन अगर सही मायनों में देखा जाए तो यह दुर्घटनावश मृत्यु नहीं बल्कि एक हत्या है। परिवार के बेटे की चाह को पूरा करने के चक्कर में एक स्त्री ने सालों मानसिक और शारीरिक दर्द सहा और अंततः उन्हीं की इच्छा की बलि चढ़ गई।

यह कोई पहला वाक्या नहीं है। भारत में पुत्र को परिवार का वंश आगे बढ़ाने वाला माना जाता है और इसकी मानसिकता से जकड़े अनपढ़ और पढे़-लिखे लोग हमेशा ही एक पुत्र की कामना करते हैं। पुत्र न होने पर यही चाह कब टीस और फिर टीस से अपराध में तब्दील हो जाती है, इसका पता ही नहीं चलता। अगर गहराई से आकलन किया जाए तो पता चलता है कि महिलाओं के साथ होने वाले कई प्रकार के अत्याचारों की जड़ में कहीं न कहीं एक बेटा पाने का मोह ही छिपा हुआ है। सबसे पहले तो इसके लिए स्त्री को कई बार शारीरिक व मानसिक यातनाएं दी जाती हैं। उस पर एक बेटा पैदा करने का मानसिक दबाव बनाया जाता है और बेटा न होने पर उसे ही कोसा जाता है। कभी-कभी स्त्री को तब तक गर्भधारण करना पड़ता है, जब तक वह परिवार को एक पुत्र न दे। इसके अतिरिक्त भारत में बच्चे के जन्मपूर्व गर्भपरीक्षण प्रतिबंधित होने के बावजूद भी अवैध तरीकों से लिंग जांच करवाई जाती है और लड़की होने पर उस नन्हीं सी जान को गर्भ में ही मार दिया जाता है। कभी-कभी अवैध रूप से किया गया अबार्शन स्त्री को भी मौत के मुंह में धकेल देता है। वहीं अगर बच्ची घर में जन्म ले लेती है तो भी अधिकतर घरों में उसे वह प्यार व आगे बढ़ने के मौके नहीं मिलते, जिसकी वह वास्तव में हकदार होती है।

इसके अतिरिक्त पुत्र मोह ही देश में लिंगानुपात में असमानता का कारण बनता है, जो अन्य कई तरह के अपराधों को जन्म देता है। देश में प्रति एक हजार लड़कों पर केवल 940 लड़कियां ही है। वहीं कुछ राज्यों में तो स्थिति और भी अधिक बदतर है। इन राज्यों में लड़कों को विवाह के लिए लड़कियां ही नहीं मिलतीं। लिंगानुपात में यही असमानता लड़कियों की जबरन शादी या एक से अधिक पुरूषों से शादी, लड़कियों की तस्करी या फिर लड़कियों को खरीदकर उनसे शादी करना जैसे कई अपराधों का कारण बनती है।

इस प्रकार, अगर महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों पर लगाम लगानी है तो सबसे पहले पुत्र मोह का दामन छोड़ना होगा। बेटियों की सुरक्षा के लिए मोदी सरकार ने साल 2015 में बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान की शुरूआत की। यहां पर यह समझना बेहद आवश्यक है कि यहां सवाल सोच का है अैर सरकार भले ही कितने भी कानून बना ले लेकिन अगर समाज में लोगों की मानसिकता नहीं बदलती, तो किसी भी कानून, नियम या योजनाओं से कोई विशेष लाभ नहीं होने वाला। इसे दुखद ही कहा जाएगा कि आज जब हर क्षेत्र में लड़कियों ने अपनी काबिलियत का बखूबी प्रदर्शन किया है, तब भी लोग अपने मन में एक बेटे की कसक लेकर जीते हैं। घर में लड़की होने पर मातम का माहौल रहता है, वहीं बेटा होने पर मिठाईयां बांटी जाती हैं। समाज में लोगों की सोच है कि बेटा बुढ़ापे का सहारा है। अगर वास्तव में ऐसा है तो शायद देश में इतने वृद्धाश्रम नहीं होते। वृद्धाश्रम में बुजुर्गों को छोड़ने वाली एक बेटी नहीं, बल्कि वास्तव में बेटा ही होता है। तो बेटे के मोह में बेटी के साथ अत्याचार। आखिर क्यों?


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