देव / राक्षस :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

08 मार्च 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (21 बार पढ़ा जा चुका है)

देव   / राक्षस :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*आदिकाल से इस धराधाम पर ऋषियों - महर्षियों एवं राजा - महाराजाओं द्वारा लोक कल्याण के लिए यज्ञ / महायज्ञ का अनुष्ठान किया जाता रहा है | जहाँ सद्प्रवृत्तियों द्वारा लोक कल्याण की भावना से ये सारे धर्मकार्य किये जाते रहे हैं वहीं नकारात्मक शक्तियों के द्वारा इन धर्मानुष्ठानों का विरोध करते हुए विध्वंस का सतत् प्रयास होता रहा है | इतिहास / पुराणों में अनेक कथानक उदाहरण स्वरूप देखने को मिलते हैं जहाँ यज्ञ कर रहे याज्ञिकों को प्रताड़ित करते हुए यज्ञ विध्वंस का प्रयास करते कृत्य किये जाते रहे हैं | रामायण में विश्वामित्र जी की यज्ञ विध्वंस करने का प्रयास सुबाहु एवं मारीच द्वारा किया गया तब विश्वामित्र जी स्वयं नारायण को यज्ञरक्षा के लिए लेकर आये | यज्ञानुष्ठान की रक्षा दुष्प्रवृत्तियों को उचित सीख देकर स्वयं नारायण करते हैं | ऐसा नहीं है कि यज्ञाध्यक्ष या आयोजक अपने यज्ञ की रक्षा नहीं कर सकते परंतु जब वे संकल्प में बँध जाते हैं तो वे नकारात्मक कार्य नहीं कर सकते क्योंकि संकल्प लेने के बाद आयोजक प्रतिज्ञारत हो जाता है और उसके द्वारा किया गया ऐसा कोई भी कार्य उसकी यज्ञ में बाधा उत्पन्न करता है | हमारे मनीषियों का कथन है कि किसी भी धर्मकार्य को करने का संकल्प ले लेने के बाद यजमान या आयोजक यदि कोई मन , वचन एवं कर्म से नकारात्मक कार्य करता है तो उसका संकल्प टूट जाता है | इसी बाध्यता के चलते एवं सकारात्मकता को बनाये रखने के लिए ऐसा कोई कार्य नहीं किया जाता | इस बात का फायदा उठाने का प्रयास नकारात्मक शक्तियाँ किया करती हैं , जबकि ऐसी शक्तियाँ सफल नहीं हो पाती हैं |* *आज भी संतों द्वारा लोककल्याण के निहित क्षेत्र व समाज को एक सूत्र में बाँधने के लिए ऐसे अनुष्ठान जनता के सहयोग से यत्र - तत्र किया जाता हैं | संतों का कार्य है लोक कल्याण करना | इसी उद्देश्य के साथ गाँव व क्षेत्र का सहयोग लेकर यज्ञादिक कार्यों को सम्पन्न कराने का प्रयास किया जाता है | परंतु मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" आज भी देख रहा हूँ कि जहाँ पूरा गाँव व क्षेत्र इस धर्मकार्य में तन मन धन से सहयोग करता दिखाई पड़ता है वहीं दूसरी ओर उसी समाज में कुछ नकारात्मक लोग भी होते हैं जो कि अपने कृत्यों द्वारा इन धर्मानुष्ठानों का सांकेतिक विरोध करते भी दिखाई पड़ते हैं | राक्षसी प्रवृत्तियाँ पहले भी थीं और आज भी हैं यह अलग विषय है कि इनका वश न पहले चला है और न ही अब चल रहा है | परंतु ये दुष्प्रवृत्तियाँ अपने कर्मों के द्वारा यज्ञों / अनुष्ठानों में विघ्न डालने का सतत प्रयास करते रहते हैं | धर्मकार्य होते रहे हैं और होते रहेंगे इन दुष्प्रवृत्तियों के मुंह पर कालिख लगती रही है और आगे भी लगती रहेगी | कुछ लोग ऐसे भी होते हैं कि यदि कुछ नहीं कर पाते हैं तो कार्यक्रम स्थल के अगल - बगल प्रदूषण ही फैलाने का कार्य करते रहते हैं चूंकि उनका विरोध पूरा गाँव व क्षेत्र करता भी है परंतु ऐसे लोगों का एकमात्र उद्देश्य होता है ऐसे धार्मिक कार्यों में विघ्न डालने का प्रयास मात्र करना | ऐसे ही लोग निशाचर कहे गये हैं |* *यज्ञादि धर्मानुष्ठान आदिकाल से होते आये हैं और आगे भी होते रहेंगे | निशाचर सदैव समाज में रहे हैं आवश्यकता है इनको पहचानने की |*

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