विवाह विधान :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

08 मार्च 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (32 बार पढ़ा जा चुका है)

विवाह विधान :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस धरा धाम पर चौरासी योनियों का वर्णन मिलता है , इनमें से सर्वश्रेष्ठ प्राणी बनकर मानव ने अनेक कीर्तिमान स्थापित किये | मनुष्य परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ कृति है , सृष्टि के संचालन में सहयोग करने के लिए ईश्वर ने नर के साथ नारी का जोड़ा भी उत्पन्न किया और हमारे सनातन ऋषियों विवाह का अद्भुत विधान बनाया | विवाह विधान मानव जीवन का स्वर्णिम अवसर होता है जहां पर एक अजनबी वर कन्या से मिलता है एवं गृहस्थ धर्म में प्रवेश करता है | आदिकाल में कन्या एक बार अपने वर का चयन करती थी एवं जीवन पर्यंत उसी के प्रति समर्पित होकर सृजन एवं संचालन का कार्य करती थी | यही कारण है कि हमारे देश में अनेक महान नारियों का चरित्र पढ़ने और सुनने को मिलता है | विवाह विधान कई प्रकार के बताए गए उनमें से "ब्रह्म विवाह" सर्वश्रेष्ठ माना गया है जिसका कमोबेश प्रचलन समाज में आज भी है | जहां कन्या अपने पिता के द्वारा चुने हुए वर को अपना जीवन साथी मान कर अपना संपूर्ण जीवन व्यतीत करने का प्रण लेती है | जीवन में एक बार पिता के द्वारा जिसका हाथ पकड़ा दिया जाता था वही उसका पति माना जाता था | विवाह के पहले कन्या अपने पति का मुंह भी नहीं देख पाती थी इसका प्रभाव भी होता था की बर का कन्या के प्रति एवं कन्या का वर के प्रति आकर्षण बना रहता था एवं जीवन की गाड़ी सुचारू ढंग से चलती थी |* *आज समय परिवर्तित हो गया है और सभी लोग स्वयं को आधुनिक मानने लगे हैं | इस आधुनिकता में जीवन का महत्वपूर्ण विवाह विधान भी आधुनिक हो गया है | जहां पूर्वकाल में कन्या का एक बार विवाह होता था वही आज एक ही कन्या एक ही वर से तीन बार विवाह कर रही है | नये विधान के अंतर्गत जब गोदभराई होती है उसी समय वर कन्या एक दूसरे को जयमाल पहनाते हैं दूसरी बार द्वारपूजन के बाद जयमाल का आयोजन होता है तब कहीं जाकर की कन्या मंडप में वर का हाथ पकड़ती है | इस प्रकार एक ही कन्या के तीन बार विवाह आज का समाज स्वयं करा रहा है | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" विचार करता हूं कि जहां पूर्वकाल में वर एवं कन्या विवाह मंडप में ही परस्पर निरीक्षण करते थे वही आज विवाह तय होने के तुरंत बाद वर कन्या का आपस में मोबाइल के द्वारा रात्रि भर बात करना दोनों की प्रति आकर्षण को कम कर रहा है , एवं यही कारण है कि नए जीवन साथी के प्रति न तो आकर्षण रह गया है और ना ही प्रेम | जिसकी यह स्थिति बनती है कि आज विवाह बहुत जल्दी टूट रहे हैं एवं अदालतों में संबंधविच्छेद के अनेक मुकदमे इसी आधुनिकता का परिणाम है | हम अपनी सनातन संस्कृति को भूलते चले जा रहे हैं एवं अपनी कन्या को स्वयं उच्छृंखल बना रहे हैं | इसका दोषी में वर एवं कन्या को न मानकर परिवार के संरक्षक को ही मानता हूं | सारा दोष परिवार के संरक्षकों का होता है जिन्होंने कन्या को यह सुविधा प्रदान की होती है | गोपनीयता जीवन में बहुत महत्वपूर्ण है इसे बनाए रखना चाहिए | इससे ज्यादा विकृति शहरों में देखने को मिलती हैं जहां विवाह के पहले ही वर कन्या रमणीक स्थानों पर घूम कर के एक दूसरे के साथ हैं जिसे आज की आधुनिक पीढ़ी "वेडिंग सेरेमनी" कहती है | विचार कीजिए हम कहां थे और कहां आ गये हैं |* *जब किसी संस्कृति के रक्षक ही उसके भक्षक बन जाते हैं तो स्थिति बड़ी भयावह हो जाती है | आज यही हो रहा है इस पर विचार करने की आवश्यकता है |*

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