श्रेष्ठता का भ्रम :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

08 मार्च 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (30 बार पढ़ा जा चुका है)

श्रेष्ठता का भ्रम :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सृष्टि का सृजन करने वाली आदिशक्ति भगवती महामाया , जिसकी सत्ता में चराचर जगत पल रहा है ! ऐसी कृपालु / दयालु आदिमाता को मनुष्य अपनी आवश्यकता के अनुसार विभिन्न नामों से जानता है | स्वयं महामाया ने उद्घोष किया है कि :- मैं ही ब्रह्मा , विष्णु एवं शिव हूँ | वही आदिशक्ति जहां जैसी आवश्यकता पड़ती है वहां उस प्रकार का स्वरूप धारण करके इस जगत का कल्याण मात्र करती हैं | जब सृष्टि शून्य थी तब उस महामाया ने सृष्टि संचालन की इच्छा करते हुए आवश्यकता के अनुसार ब्रह्म , विष्णु , रुद्र , काली , सरस्वती , लक्ष्मी , दुर्गा आदि अनेकों रूप धारण करके इस सृष्टि के संचालन में अपना योगदान दिया | जिस प्रकार किसी भी राष्ट्र का राष्ट्रपति सर्वोच्च होता है एवं सर्वाधिकार उसी के पास होता है उसी प्रकार अनेकों देवी देवता होते हुए भी सर्वोच्च सत्ता परमेश्वरी , भुवनेश्वरी की ही मानी जाती है | ऐसे में यदि हमारे मन में यह विचार आता है कि अनेक देवियों में श्रेष्ठ कौन है ? तो यह हमारी अज्ञानता का प्रतीक है | जहाँ जैसी आवश्यकता पड़ी वैसा रूप धारण करके महामाया ने अवतार लिया | कभी भी मन में यह विचार नहीं होना चाहिए कि कौन श्रेष्ठ है ? और कौन लघु | ऐसा करके हम परमात्मा के दोषी बनते हैं |* *आज अनेकों लोगों के मस्तिष्क में एक प्रश्न उठता है कि अनेक देवियों में सर्वश्रेष्ठ कौन है ? दुर्गा , काली , लक्ष्मी , आदि देवियों में भेद करने वालों को मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" इतना ही बताना चाहूंगा कि सभी देवियों का अपने अपने स्थान पर महत्वपूर्ण स्थान है | इसमें कभी भेद नहीं करना चाहिए , क्योंकि एक तरफ हमारे धर्मग्रंथ कहते हैं कि बिना आदिशक्ति के सृष्टि की संकल्पना ही व्यर्थ है , दूसरी तरफ हम इनमें अंतर करना चाहते हैं | विचार कीजिए परिवार में माँ , बहन , पत्नी एवं पुत्री आदि का अपने - अपने स्थान पर महत्त्वपूर्ण स्थान है जहाँ जिसकी आवश्यकता पड़ती है वैसा सम्मान मिलता है | जैसे एक शिक्षक पीएचडी करके पीएचडी के छात्रों को उच्च शिक्षा देता है परंतु वही शिक्षक जब प्राइमरी के बच्चों को बढ़ाता है तो उनको वर्णमाला का ज्ञान कराता हुआ दिखाई पड़ता है | ऐसे में विचार करना कि इस शिक्षक को कुछ आता ही नहीं है , या यह तो प्राइमरी के बच्चों को पढ़ा रहा है यह मूर्खता के अतिरिक्त क्या कहा जा सकता है ? शिक्षक को जहां जैसी आवश्यकता पड़ती है उस प्रकार का ज्ञान बाँट़ता है | ठीक उसी प्रकार वह आदिशक्ति भी जहां जैसी आवश्यकता पड़ती है वैसा स्वरूप धारण करके प्रकट होती है | भगवती के अनेक स्वरूप हैं इनमें भेद बुद्धि दर्शाने वाले पाप के भागी तो बनते ही हैं साथ ही उनकी उपासना पद्धति हुई दिग्भ्रमित हो जाती है |* *महामाया के सभी स्वरूप एक ही हैं इनमें कभी भेद नहीं करना चाहिए | जैसी जिसकी आवश्यकता हो वैसा स्वीकार करके इनकी आराधना करनी चाहिए |*

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