भितरघाती :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

08 मार्च 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (17 बार पढ़ा जा चुका है)

भितरघाती :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*हमारा देश भारत सदैव से एक सशक्त राष्ट्र रहा है | हमारा इतिहास बताता है कि हमारे देश भारत में अनेक ऐसे सम्राट हुए हैं जिन्होंने संपूर्ण पृथ्वी पर शासन किया है | पृथ्वी ही नहीं उन्होंने स्वर्ग तक की यात्रा करके वहाँ भी इन्द्रपद को सुशोभित करके शासन किया है | हमारे देश का इतिहास बहुत ही गौरवशाली रहा है इसीलिए हमारे देश भारत को विश्वगुरु कहा जाता था | अपने ज्ञान , शौर्य एवं वैज्ञानिकता का लोहा भारत ने सम्पूर्ण विश्व में मनवा कर कीर्ति पताका फहराई है | देश के पाहरी दुशमनों को तो हमारे वीर शासकों ने परास्त कर दिया परंतु वे हार गये अपने देश में बैठे कुछ चंद गद्दारों से | धनलोलुपता के कारण कुछ चंद लोगों ने अपने धर्म एवं मान - सम्मान को तिलांजलि देकर दुशमनों के साथ मिल गये और कालांतर हमारा देश परतंत्र (गुलाम) हो गया | देश को दासता की बेड़ियों में जकड़ने में उतना साहस विदेशी आक्रांताओं का नहीं रहा जितना इन चंद भितरघातियों / गद्दारों का रहा है | पृथ्वीराज चौहान , अमरसिंह राठौर , चन्द्रशेखर आजाद की पराजय एवं मृत्यु इस पात का ज्वलंत उदाहरण है कि हम विदेशियों से न हारकर जयचंदों से हारे हैं | ये मुट्ठी भर लोग जिनका न कोई धर्म होता है और न ही ईमान अपने लोभ के वशीभूत होकर सम्पूर्ण राष्ट्र को भी बलिदान करने से नहीं चूकते है | इन्हीं ऑस्तीन के सर्पों के कारण हम एक लम्बी अवधि तक परतंत्र रहे हैं |* *आज हम स्वतंत्र राष्ट्र में साँसे ले रहे हैं | हमें स्वतंत्रता दिलाने के लिए हमारे पूर्वजों ने दुशमनों से तो लोहा लिया ही साथ अपने घर में बैठे गद्दारों को भी यमलोक पहुँचाया | आज अनेक संघर्षों के बाद हमारा देश पुन: एक सशक्त राष्ट्र के रूप में स्थापित हुआ है | हम किसी भी देश को पराजित करने का साहस रखते हैं , हमारी तीनों सेनायें स्वयं में सक्षम हैं | परंतु मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" देख रहा हूँ कि आज भी कुछ चंद लोग अपने पद एवं धन के लोभ में देशविरोधी कृत्य कर रहे हैं | आज पुन: आवश्यकता है कि देश के बाहरी दुशमनों को परास्त करने के साथ ही इन ऑस्तीन के सर्पों का फन कुचला जाय | ये कुछ चंद भितरघाती पुन: देश को दासता की बेड़ियों में जकड़ने का कुचक्र करते हुए दिखाई पड़ रहे हैं | आज प्रत्येक भारतवासी को इन जहरीले सर्पों / जयचंदों की पहचान करके उनसे सावधान रहते हुए उन्हें सबक सिखाने का उपक्रम करना चाहिए , अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब ये मुट्ठी भर लोग एक विशाल राष्ट्र को अपनी लोभ की तराजू में रखकर तोल देंगे और हम पुन: किसी आक्रान्ता के दास कहलाने लगेंगे | हमारा इतिहास रहा है कि हमने देश के सम्मान में बाधक बन रहे अपने प्रियजनों को भी बलिवेदी पर चढ़ा दिया है | आज पुन: वही समय उपस्थित हो रहा है कि जिन्हें हम अपना प्रिय जननायक मानते हैं यदि वही देशविरोधी कृत्य कर रहा हो तो उसका बलिदान (परित्याग) कर दिया जाय | यही समय की मांग के साथ देशहित में भी है |* *प्रत्येक देशवासी के लिए देश ही सर्वोपरि होना चाहिए | हमारा कर्तव्य है कि देश के लिए यदि अपनों का भी बलिदान देना पड़े तो पीछे न हटें |*

अगला लेख: प्रसन्नता :-- आचार्य अर्जुन तिवारी



शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
08 मार्च 2019
*आदिकाल से इस धराधाम पर ऋषियों - महर्षियों एवं राजा - महाराजाओं द्वारा लोक कल्याण के लिए यज्ञ / महायज्ञ का अनुष्ठान किया जाता रहा है | जहाँ सद्प्रवृत्तियों द्वारा लोक कल्याण की भावना से ये सारे धर्मकार्य किये जाते रहे हैं वहीं नकारात्मक शक्तियों के द्वारा इन धर्मानुष्ठानों का विरोध करते हुए विध्वंस
08 मार्च 2019
20 मार्च 2019
*आदिकाल में जब इस सृष्टि में मनुष्य का प्रादुर्भाव हुआ तो उनको जीवन जीने के लिए वेदों का सहारा लेना पड़ा | सर्वप्रथम हमारे सप्तऋषियों ने वेद की रचनाओं से मनुष्य के जीवन जीने में सहयोगी नीतियों / रीतियों का प्रतिपादन किया जिन्हें "वेदरीति" का नाम दिया गया | फिर धीरे धीरे धराधाम पर मनुष्य का विस्तार ह
20 मार्च 2019
08 मार्च 2019
*सृष्टि का सृजन करने वाली आदिशक्ति भगवती महामाया , जिसकी सत्ता में चराचर जगत पल रहा है ! ऐसी कृपालु / दयालु आदिमाता को मनुष्य अपनी आवश्यकता के अनुसार विभिन्न नामों से जानता है | स्वयं महामाया ने उद्घोष किया है कि :- मैं ही ब्रह्मा , विष्णु एवं शिव हूँ | वही आदिशक्ति जहां जैसी आवश्यकता पड़ती है वहां
08 मार्च 2019
23 मार्च 2019
*इस धरा धाम पर मनुष्य सर्वश्रेष्ठ प्राणी बनकर स्थापित हुआ | अपने विकासक्रम में मनुष्य समाज में रहकर के , सामाजिक संगठन बनाकर निरंतर प्रगति की दिशा में अग्रसर रहा | किसी भी समाज में संगठन के प्रति मनुष्य का दायित्व एवं उसकी भूमिका इस बात पर निर्भर करती है कि मनुष्य के अंदर इस जीवन रूपी उद्यान को सुग
23 मार्च 2019
16 मार्च 2019
*सनातन धर्म में मानव जीवन को चार आश्रमों के माध्यम से प्रतिपादित किया गया है | ब्रह्मचर्य , गृहस्थ , वानप्रस्थ एवं सन्यास | सनातन धर्म में आश्रम व्यवस्था विशेष महत्व रखती है | यही आश्रम व्यवस्था मनुष्य के क्रमिक विकास के चार सोपान हैं , जिनमें धर्म , अर्थ , काम एवं मोक्ष आदि पुरुषार्थ चतुष्टय के समन
16 मार्च 2019
16 मार्च 2019
*सनातन काल से मनुष्य भगवान को प्राप्त करने के अनेकानेक उपाय करता रहा है , परंतु इसके साथ ही भगवान का पूजन , ध्यान एवं सत्संग करने से कतराता भी रहता है | मनुष्य का मानना है कि भगवान का भजन करने के लिए एक निश्चित आयु होती है | जबकि हमारे शास्त्रों में बताया गया है कि मनुष्य के जीवन का कोई भरोसा नहीं ह
16 मार्च 2019
08 मार्च 2019
*सृष्टि के आदिकाल से इस धरा धाम पर मानव जाति दो खंडों में विभाजित मिलती है | पहला खंड है आस्तिक जो ईश्वर को मानता है और दूसरे खंड को नास्तिक कहा जाता है जो परमसत्ता को मानने से इंकार कर देता है | नास्तिक कौन है ? किसे नास्तिक कहा जा सकता है ? यह प्रश्न बहुत ही जटिल है | क्योंकि आज तक वास्तविक नास्त
08 मार्च 2019
08 मार्च 2019
*सम्पूर्ण सृष्टि परमपिता परमात्मा के द्वारा निर्मित है | इस सृष्टि में वन , नदियाँ , पहाड़ , जलचर , थलचर एवं नभचर सब ईश्वर को समान रूप से प्रिय हैं | मनुष्य उस ईश्वर का युवराज कहा जाता है | युवराज का अर्थ है राजा का उत्तराधिकारी जो राजा द्वारा संरक्षित वस्तुओं का संरक्षण करने का उत्तरदायित्व सम्हाले
08 मार्च 2019
20 मार्च 2019
*सनातन धर्म के संस्कार , संस्कृति एवं वैज्ञानिकता सर्वविदित है | सनातन धर्म के महर्षियों ने जो भी नीति नियम बनाये हैं उनमें गणित से लेकर विज्ञान तक समस्त सूत्र स्पष्ट दिखाई पड़ते हैं | सनातन धर्म के संस्कार रहे हैं कि मनुष्य जब गुरु के यहां जाता था तब वह सेवक बनकर जाता था | इस पृथ्वी पर एकछत्र शासन
20 मार्च 2019
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x