आस्तिक व नास्तिक :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

08 मार्च 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (59 बार पढ़ा जा चुका है)

आस्तिक   व नास्तिक :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सृष्टि के आदिकाल से इस धरा धाम पर मानव जाति दो खंडों में विभाजित मिलती है | पहला खंड है आस्तिक जो ईश्वर को मानता है और दूसरे खंड को नास्तिक कहा जाता है जो परमसत्ता को मानने से इंकार कर देता है | नास्तिक कौन है ? किसे नास्तिक कहा जा सकता है ? यह प्रश्न बहुत ही जटिल है | क्योंकि आज तक वास्तविक नास्तिक मिलना असंभव ही प्रतीत हुआ है | यदि देखा जाय तो नास्तिक का अर्थ होता है जो परमसत्ता के अस्तित्व को नकार दे | सामान्यतः सभी अनीश्वरवादी एवं भौतिकवादी सहित संशयवादियों के विचार एक स्वर में नास्तिक घोषित किए जाते रहे हैं | परंतु क्या वास्तव में उन्हें नास्तिक माल लेना सही होगा | उसी प्रकार आस्तिक पर यदि विचार किया जाय तो यह तथ्य निकल कर सामने आता है कि स्वयं को आस्तिक कहने वाले भी कहीं ना कहीं उस परमसत्ता को मानने में डगमगा जाते हैं | यह कहा जा सकता है कि आस्तिक और नास्तिक दोनों की आस्था ही कमजोर है | उस परमसत्ता की उपस्थिति या पूर्णतय: अनुपस्थिति की अवस्था दोनों को संशय में डाले रखती है | चाहे वह कथित आस्तिक हो या नास्तिक | जब भी अपने विश्वास पर पूर्ण निष्ठा की बात आती है तो दोनों ही भ्रमित दिखाई पड़ते हैं | जबकि यदि देखा जाय तो नास्तिक होना आस्तिक होने से कहीं अधिक कठिन है | जिसे अपने अतिरिक्त और किसी पर विश्वास ना हो ऐसे ही मनुष्य को नास्तिक कहा जा सकता है |* *आज यदि हम एक नास्तिक की खोज करने निकले तो समाज में कोई भी वास्तविक नास्तिक नहीं मिलना चाहता है | छद्मवेशधारी , पाखंडी , ढोंगी नास्तिक मिल जाएंगे जिनकी अपरिपूर्ण आस्था व्यर्थ ही है | आज समाज में तथाकथित नास्तिकों की संख्या अधिक दिखाई पड़ रही है जो कि ईश्वरीय सत्ता , वेद , पुराण आदि को झूठा सिद्ध करने में दिन-रात लगे होते हैं , परंतु शायद उनको नास्तिक शब्द का अर्थ भी नहीं पता होता है | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" समाज में ऐसे अनेक लोगों को देख रहा हूं जिनके घरों में उनके पूर्वज एवं उनके माता-पिता तो अपने घर में देवी - देवताओं की कथा व पूजा समय समय पर किया करते हैं और ये स्वघोषित नास्तिक भी उन कार्यक्रमों में सम्मिलित होते हैं | यदि इनसे इस विषय में प्रश्न किया जाता है तो इनका जबाब यही होता है कि :- क्या करें ! हम तो नहीं मानते परन्तु परिवार व समाज के लिए ऐसा करना पड़ता है | सत्य यह है कि ऐसे लोग न तो नास्तिक होते हैं और न ही आस्तिक | ऐसे लोग सिर्फ और सिर्फ पाखंडी होते हैं आस्तिकता एवं नास्तिकता के बीच झूलते हुए अपना सम्पूर्ण जीवन व्यतीत कर देने वाले ऐसे लोग समाज में दिखावे के लिए तो झूठी शान बघारते रहते हैं परंतु अपने जीवन में कुछ भी करने के योग्य नहीं रह जाते | इनके विचार ही इन्हें जीवन भर परेशान करते रहते हैं कि मैं सही हूँ या नहीं ? ईश्वर को मानूँ या नहीं ? एक सच्चा नास्तिक ईश्वर के बहुत ही पास होता है | परंतु आज समाज की स्थिति देखकर कुछ भी कहना असम्भव सा है |* *आस्तिक हो या नास्तिक मनुष्य को दोनों ही अवस्थाओं में पूर्ण बनने का प्रयास करना चाहिए | क्योंकि अधकचरा ज्ञान एवं व्यवहार सदैव घातक ही होता है |*

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