ढपोर शंख :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

16 मार्च 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (38 बार पढ़ा जा चुका है)

ढपोर शंख :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस धराधाम पर सर्वोच्च प्राणी मनुष्य ने अपने व्यवहार व कुशल नीतियों के कारण समस्त पृथ्वी पर शासन करता चला आ रहा है | मानव जीवन में कौन किसका हितैषी है और कौन विपक्षी यह मनुष्य के वचन एवं व्यवहार से परिलक्षित होता रहा है | मनुष्य जीवन में मनुष्य अपने वचन पर स्थिर रहते हुए वचन पालन करते हुए समाज में स्थापित होता रहा है | किसी को दिए हुए वचन का पालन करने के लिए यदि मनुष्य को अपना सब कुछ दांव पर लगाना पड़ा है तो भी पीछे नहीं हटा है | हमारे पौराणिक एवं ऐतिहासिक ग्रंथ बताते हैं कि हमारे देश में सत्यवादी महाराज हरिश्चन्द्र में अपने वचन पालन के लिए अपना राज्य त्याग करके दासता भी स्वीकार की थी , वहीं मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम अपने पिता के वचन पालन के लिए चौदह वर्षों का वनवास स्वीकार करते हैं | जीवन में वचन या किसी के द्वारा किए गए वायदे का क्या महत्व होता है इसका बहुत सुंदर चित्रण गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपनी कालजई रचना रामचरितमानस में किया है | जहां महाराज दशरथ कहते हैं :- "प्राण जाइ पर वचन न जाई" अर्थात अपने वचन पालन के लिए , या जो कह दिया उसके लक्ष्य को पूरा करने के लिए हमारे पूर्वजों ने अपने जीवन को न्योछावर कर दिया है | प्राचीन काल में भी कुछ लोग ऐसे भी हुए हैं जिन्होंने अपने वचन का कोई महत्व नहीं रखा और हमारे महर्षियों ने उनको "ढपोर शंख" की संज्ञा दे दी | "ढपोर शंख" का अर्थ होता है :- "वदामि च ददामि न" अर्थात जो वायदा तो सबकुछ करने का कर लो लेकिन पूरा कुछ ना करें | ऐसे लोगों के जीवन में अपने वचन एवं संकल्प का कोई महत्व नहीं होता है |* *आज के समाज में जिधर भी दृष्टि घुमाओ "ढपोर शंखों" की संख्या कुछ अधिक ही दिखाई पड़ती है | लोग नित्य वायदे करते हैं , रोज कसमें खाते हैं परंतु उनको पूरा करने के लिए विचार तक नहीं करते हैं | आज कुछ स्वार्थी लोगों का मानना है कि अपना काम बनाने के लिए यदि झूठ भी बोलना पड़े , झूठे वचन भी देने पड़े तो दे देना चाहिए | क्योंकि यह लोग "वचने का दरिद्रता" के सिद्धांत को मानने वाले होते हैं जबकि सत्यता यह है कि यह लोग "वचने का दरिद्रता" का अर्थ शायद ही जानते होंगे | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" आपका ध्यानाकर्षण कराना चाहूंगा कि आज आज हमारे देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था है जहाँ जनता के द्वारा चुने गये प्रतिनिधि राजनैतिक मंचों के माध्यम से अनेक वचन जनता जनार्दन को देते हैं जिन्हें उन्हें कभी पूरा करना नहीं होता है | ये तथाकथित "ढपोर शंख" ही हमारे देश के लिए दुर्भाग्य सिद्ध हो रहे हैं | समाज में अपने वचन की मर्यादा रखने का जैसे प्रचलन ही समाप्त होता चला जा रहा है | "ढपोर शंख" की बढ़ती संख्या आज साधारण सी बात हो गयी है | आज हमें इस बात पर विचार करना चाहिए कि हमारे समक्ष वचन लेने वाला , सौगंध लेने वाला अपने वचन पर कितने प्रतिशत खरा उतरेगा और हम उस पर कितना विश्वास कर सकते हैं ? यह आत्म चिंतन करने के बाद ही मनुष्य का निर्णय होना चाहिए | क्योंकि किसी "ढपोर शंख" के भरोसे रह कर के जीवन को नहीं जिया जा सकता है | क्योंकि "ढपोर शंख" आपकी पिरत्येक बात को सुनकर उससे अधिक देने व करने का वचन तो दे देगा परंतु उसका पालन कदापि नहीं करेगा |* *समाज में चहुँओर व्याप्त हो रही "ढपोर शंखी" सभ्यता से बाहर निकलकर मानवता के प्रति किये गये संकल्प का पालन करके ही उन्नति की जा सकती है |*

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