परदोष दर्शन :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

16 मार्च 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (32 बार पढ़ा जा चुका है)

परदोष दर्शन :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस पृथ्वी पर जन्म लेने के बाद मनुष्य का परम लक्ष्य होता है भगवतप्राप्ति करना | भगवान को प्राप्त करने के लिए हमारे महापुरुषों ने अनेकानेक उपाय बताये हैं | अनेक उपाय करने के पहले आवश्यक है कि मनुष्य के हृदय में भक्ति का उदय हो क्योंकि बिना भक्ति के भगवान को प्राप्त कर पाना कठिन ही नहीं वरन् असम्भव है | इसी क्रम में स्वयं को प्राप्त करने का सबसे सरल साधन स्वयं मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने मैया शबरी से नवधा भक्ति के रूप में बताया है | नवधा भक्ति का वर्णन करने के बाद भगवान स्वयं कहते हैं इन नौ प्रकार की भक्ति में से एक भी जिसके पास हो जाती है वह हमको प्राप्त कर लेता है | इसी नवधा भक्ति में सातवीं भक्ति बताया गया है परदोष ना देखना | भगवान का बहुत बड़ा भक्त हो और दूसरों के दोष दर्शन करने का दोष उसके अंदर है तो वह कभी भगवान को प्राप्त नहीं कर सकता है | परदोष दर्शन बहुत बड़ा अवगुण है जो मनुष्य में व्याप्त हो जाता है तो उसे दूसरों में दोष ही दोष दिखाई पड़ते हैं | दूसरों के दोष देखने के चक्कर में वह अपने दोषों को भूल जाता है | और अपने भक्तिमार्ग से विमार्गी हो जाता है | अत: यदि भगवान को प्राप्त करना है तो दूसरों की अपेक्षा अपने दोषों का अवलोकन करके उनको समाप्त करने का प्रयास करना चाहिए |* *आज समाज में भगवान को प्राप्त करने के लिए अनेकानेक उपाय किए जा रहे हैं , परंतु यह भी सत्य है कि मनुष्य आज अनेक प्रकार के उपाय करने के बाद भी अपने हृदय में व्याप्त दोषों का शमन न करके दूसरों के दोषों को देखने में अधिक व्यस्त दिखाई देता है | यही कारण है कि मनुष्य सब कुछ करते हुए भी भगवान से दूर होता चला जा रहा है | मेरा "आचार्य अर्जुन तिवारी" का मानना है कि मनुष्य अपने जीवन में जिस गुण की ओर ज्यादा आकर्षित होता है वही गुण उसमें प्रकट हो जाते हैं | ठीक उसी प्रकार जब मनुष्य सिर्फ दूसरों के दोष ही देखता रहेगा तो वह दोष उसमें स्वयं प्रकट हो जाते हैं , क्योंकि मनुष्य जिसका चिंतन करता रहता है वहीं उसके क्रियाकलाप में उपस्थित होते रहते हैं | आज कोई भी मनुष्य अपना दोष ना तो देखना चाहता है ना ही किसी के बताने पर मानना चाहता है , जबकि यही सत्य हैं कि जब हम किसी के ऊपर एक उंगली उठाते हैं तो तीन उंगलियां स्वयं अपनी और मुड़ी होती हैं और वह यही कहती रहती हैं कि पहले अपने मन को , बचन को , और अपने कर्म को देखो तब दूसरों का दोष देखना | परंतु मनुष्य उसको समझ नहीं पाता है और दोष दर्शन में ही संपूर्ण जीवन व्यतीत कर देता है |* *यदि वास्तव में भगवान को प्राप्त करना है तो भगवान श्री राम जी के द्वारा बताई हुई नवधा भक्ति का पालन करना ही पड़ेगा |*

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