होली :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

20 मार्च 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (14 बार पढ़ा जा चुका है)

होली :--- आचार्य अर्जुन तिवारी  - शब्द (shabd.in)

*भारतवर्ष त्यौहारों का देश है | समय समय पर होने वाले त्यौहार एवं उनकी विशालता ही हमारे देश को अन्य देशों से अलग करती है | सभी त्यौहारों में "होली" का विशिष्ट स्थान है | यह त्यौहार हमारे ही देश में नहीं वरन सम्पूर्ण विश्व में पूर्ण हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है | होली से जुड़ी कई पौराणिक कथायें मिलती हैं परंतु सबसे प्रमुख है भक्त प्रहलाद की कथा | होली की पूर्व संध्या पर "होलिकादहन" किया जाता है | होलिका भूतकाल के बोझ का सूचक है जो प्रहलाद की निश्छलता को जला देना चाहती थी परंतु नारायण भक्ति सराबोर प्रहलाद ने सभी पुराने (दैत्यकुलीन) संस्कारो को जला दिया फिर नये रंगों के साथ आनंद का स्रोत निकला | हिरणाकश्यप बुराई का प्रतीक है तो प्रहलाद विश्वास , आनंद एवं निश्छलता का | जब हम बुराई भरे भूतकाल को छोड़कर एक नई शुरुआत की ओर बढ़ते हैं तब हमारे जीवन में रंगों का फव्वारा फूटता है एवं हमारे जीवन में आकर्षण आ जाता है | होली में रंगों का बहुत ही महत्व है | उसी प्रकार मनुष्य की भावनाओं का सम्बन्ध भी एक रंग से होता है | लाल रंग क्रोध से , हरा ईर्ष्या से , पीला प्रसन्नता से , गुलाबी प्रेम से , नीला विशालता से , श्वेत शांति से , केसरिया त्याग/संतोष से एवं बैंगनी ज्ञान से जुड़ा हुआ है | होली के त्यौहार का सार जानकर ही सबको इसका आनन्द उठाना चाहिए | होली के दिन लोग पुरानी वैमनस्यता भूलकर एक दूसरे गले मिलते हैं एवं एक दूसरे को अबीर लगाकर नये सम्बन्ध की शुरुआत करते हैं | होली मनाने का अर्थ ही यही हुआ कि अपनी समस्त नकारात्मकता का दहन करके स्वयं में नये रंगो को भरकर जीवन को सतरंगी बना लिया जाय |* *आज जहाँ लोग बदल गये , समाज बदल गया वहीं त्यौहारों के रंग - ढंग भी बदलते हुए प्रतीत हो रहे हैं | आज बदलते दौर में होली को मनाने के पारंपरिक नियमों की जगह आधुनिक अश्लील फूहड़ता ने ले ली है जिसके फलस्वरूप अब शरीर के अंगों से केसर और चंदन की सुगंध की बजाय गोबर की दुर्गंध आने लग गई है | लोकगीतों में मादकता भरा सुरमय संगीत विलुप्त होने लगा है और अब उसकी जगह अभद्र शब्दों की मुद्राएं भी अंकित दिखलाई पड़ने लगी हैं | फाल्गुन के प्राचीन उपमा-अलंकार लुप्त हो गये हैं | मदन मंजरियां एवं पांवों में महावर लगाई वे सुंदरियां अब नहीं दिखाई पड़तीं जो बसंत के स्वागत में फागुनी गीत गाती संध्या के समय निकला करती थीं चंग-ढफ की थाप और ढोलक की गूंज के साथ फाग गायन को सुनने के लिए अब कान तरस रहे हैं | आज की स्थिति एवं आधुनिकता को देखते हुए मैं आचार्य अर्जुन तिवारी" यही कहना चाहूँगा कि होली उमंग, उल्लास, मस्ती, रोमांच और प्रेम-आह्वान का त्योहार है | कलुषित भावनाओं का होलिकादहन कर नेह की ज्योति जलाने और सभी को एक रंग में रंगकर बंधुत्व को बढ़ाने वाला होली का त्योहार आज देश ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी पूरे जोश के साथ जोरों-शोरों से मनाया जाता है | भले विदेशों में मनाई जाने वाली होली का मौसम के हिसाब से समय और मनाने के तरीके अलग-अलग हो, पर संदेश सभी का एक ही है- प्रेम और भाईचारा और यह बना रहना चाहिए |* *होली में कटुता , दुशमनी आदि को भुलाकर एक दूसरे को रंग एवं अबीर/गुलाल से सराबोर करके एक नये रंगभरे जीवन की शुरुआत ही इस त्यौहार को मनाने की सार्थकता है |*

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