सत्य जो किया ने कहा नहीं !

22 मार्च 2019   |  Yadav Yogesh kumar -Rohi-   (46 बार पढ़ा जा चुका है)

राक्षसों को महाभारत में धर्मज्ञ कहा है ।
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राक्षस शब्द का अर्थ संस्कृत भाषा में होता है ।
धर्म की रक्षा करने वाला " धर्मस्य रक्षयति इति "राक्षस रक्षस् एव स्वार्थे अण् । इति राक्षस
“क्वचित् स्वार्थिका अपि प्रत्ययाः प्रकृतितो लिङ्गवचनान्यतिवर्त्तन्ते ।
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अवध्यां स्त्रियमित्याहुर्धर्मज्ञा धर्म निश्चये ।
धर्मज्ञान् राक्षसान् आहु: हन्यात् स च मामपि।३१।।

अर्थात् धर्म को जानने वाले राक्षस धर्म निर्धारण में स्त्रीयों को अवध्य ( न मारने योग्य ) कहते हैं ।
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राक्षसों को महाभारत में धर्मज्ञ कहा है । और असुर को वेदों में श्रेष्ठ कोटि का व्यक्ति भी ।
यक्ष यजन करने वाले थे ।
दानव दनु की सन्तान दान करने वाले ।
यह बात सत्य है परन्तु व्यभिचारी ब्राह्मणों ने सत्य को छिपाने की असफल चेष्टा की है ।

स्वयं वाल्मीकि-रामायण में और पुराणों में शराब पीने वाले सुर अर्थात् देवता हैं । और शराब न पीने बाले असुर !
और देवताओं की अय्यशी पुराणों में वर्णित है ही ।
पहले देखें--- महाभारत में राक्षसों को धर्म वेत्ता और पुण्यजन कहाँ और क्यों कहा गया है ।⏬
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अवध्यां स्त्रियमित्याहुर्धर्मज्ञा धर्म निश्चये ।
धर्मज्ञान् राक्षसाहुर्नहन्यात् स च मामपि।३१।।

धर्मज्ञ विद्वानों ने धर्म निर्णय के प्रसंग में
नारीयों को अवध्या बताया ।
राक्षसों को भी लोग धर्मज्ञ कहते हैं।
इस लिए सम्भव है ; कि राक्षस भी मुझे स्त्री समझ कर न मारे ।
सन्दर्भित :-महाभारत आदि पर्व बकवध पर्व 157 वाँ अध्याय।

संस्कृत कोश कारों ने पुण्यजन शब्द की गलत व्युत्पत्ति-की है। ताकि साधारण जनता इसके उच्च अर्थ को न जान पाए ।
अर्थों का अनर्थ किया वर्ण-व्यवस्था वादीयों ने
पुण्यजन का अनर्थ देखें---
(पुण्यः विरुद्धलक्षणया पापी चासौ जनश्चेति )
अर्थात् जो पुण्य के विरुद्ध लक्षण वाला पापी है वह जन " इस प्रकार व्याख्याऐं की परन्तु ये व्याख्या पूर्ण असंगत है )
सही अर्थ पुण्यजन का यह है 👇
पुण्यानि कार्याणि येभि: कारयन्ते जना: इति पुण्यजना: अर्थात् जिनके द्वारा पुण्यकार्य किये जाते हैं वे जन पुण्यजन कहे जाते हैं ।
राक्षसः का अर्थ भी धर्म रक्षकों से है ।
तो फिर भक्षक
को राक्षस कहना अनर्थ ही है ।

वत्स वैश्रवण कृत्वा यक्षै: पुण्यजनैस्तदा ।
दोग्धा रचतनामस्तु पिता मणिवरस्त य: ।।३३।. (हरिवंशपुराण नवम अध्याय )
( वेन का विनाश और पृथु का जन्म )

इसके बाद पुण्यजन और यक्षों ने मृतक के कपाल में रुधिर रूप का दोहन किया।
उस समय सुमाली बछड़ा और रजतनाम दोग्धा हुआ।

ये वर्णन काल्पनिक रूप से रक्षसों को गलत दर्शाने के लिए पुराणों में किये गये ।
शब्द स्वयं ही अपना इतिहास कह रहा है।
कि राक्षस रक्षक

परन्तु पुण्यजन का अर्थ होना चाहिए पुण्य करने वाला जन अर्थात् धर्मात्मा ।
वैसे भी ब्राह्मणों ने द्वेष वश विपरीत अर्थ ही किए ।

इस परम्पराओं में सम्बलित हैं पुष्यमित्र सुंग के विधानों का प्रकाशन करने वाले ब्राह्मण ।
जिनके महान अर्थों का अनर्थ किया गया ऐसे बहुत से शब्द हैं :- दो चार शब्दों के उदाहरण- देखें---

1-बुद्ध से बुद्धू !

2-पाषं बन्धनं षण्डयति खण्डयति इति पाषण्ड से पाखण्ड।

3- निर्ग्रन्थ: से नाखन्दा चोल अथवा कोल और फिर चोल से चोर आदि .... ।
अमर कोश वाचस्पत्यम् कोश आदि में भी व्युत्पत्तियाँ संदिग्ध ही है ।

। १।१।६३ ॥ यक्षः--- यज् धातु से व्युत्पन्न है ।
अर्थात यज्ञ करने वाला ।
परन्तु पुराणों में राक्षसों तथा यक्षों को अधर्मी और यज्ञ विध्वंसक वर्णित किया गया है।
कितना झूँठ ।

(यथा हरिवंशपुराण ) २ । २६ ।
“ सर्पैः पुण्यजनैश्चैव वीरुद्भिः
पर्व्वतैस्तथा पुण्याश्रितो जनः )

सर्प एक जन जाति का नाम हैं ---जो अंग्रेज़ी भाषा में Serf (दास) के अर्थ में है ।

अमरकोश तथा मेदिनी कोश में पुण्यजन का अर्थ सज्जन भी किया है ।
सज्जनः । इति मेदिनी । १६८ ॥

अब असुर शब्द भी वेदों में पूज्य तथा शक्ति सम्पन्नता का वाचक है।

शुक्ल यजुर्वेद 33वाँ अध्याय ।👇

आतिष्ठन्तं परि विश्वे ऽ अभूषञ् छ्रियो वसानश् चरति स्वरोचिः ।
महत् तद् वृष्णो ऽ असुरस्य नामा विश्वरूपो ऽ अमृतानि तस्थौ ॥ 33.34

सभी मेधावी जनों ने रथ में विराजमान असुर को सजाया।
अपने तेज से ही तेजवान असुर प्रकाशित हुए सुस्थित हैं कामनाओं की वर्षा करने वाले असुर विचित्र कीर्ति वाले । ये विश्व रूप को धारण करते हैं ;
तथा अमृत से व्याप्त हैं ।

इमे भोज अंगिरसो विरूपा
दिवस्पुत्रासो असुरस्य वीरा:
विश्वमित्राय ददतो मघानि सहस्र
सावे प्र तिरन्त आयु:। ७।। (ऋग्वेद १/५३/७ )

हे असुर ! ये सुदास और 'ओज' राजा की और से यज्ञ करते हैं ।
यह अंगिरा मेधातिथि और विविध रूप वाले हैं। देवताओं में बलिष्ठ (असुर) रूद्रोत्पन्न मरुद्गण अश्व मेध यज्ञ में मुझ विश्वामित्र को महान धन दें !
और अन्न बढ़ावें।

उषसा पूर्वा अध यद्व्यूषुर्महद वि जज्ञे अक्षरं पदे गो:
व्रता देवानामुप नु प्रभूषन् महद् देवानाम् असुरत्वम् एकम् ।। (ऋ० १/५५/१ )

तथा मोषुणो अन्न जुहुरन्त देवा मा पूर्वज अग्ने पितर :पदज्ञा ।
पुराण्यो: सझ्ननो : केतुरन्तर्महद् देवानाम् असुरत्वम् एकम् ।।२। (ऋ० १/५५/२/)

हे अग्ने ! देव गण हमारा विनाश न करें; देवत्व प्राप्त पितर गण हमको न मारे ।
यज्ञ की प्रेरणा देने वाले सूर्य आकाश पृथ्वी के मध्य उदित होते हैं । वे हमारी हिंसा न करें । उन सब महान देवताओं का बल एक ही है ।

यहाँ असुरत्व बल तथा तेज का वाचक है ।
तद् देवस्य सवितुर्वीर्यं महद् वृणीमहे असुरस्य प्रचेतस: ।
(ऋग्वेद - ४/५३/१ )

हम उस प्रचेतस असुर अर्थात् वरुण जो सबको जन्म देने वाला है ; उसका ही हम वरण करते हैं ।

अनस्वन्ता सत्पतिर्मामहे मे गावा चेतिष्ठो असुरो मघोन ।
हे मनुष्यों में अग्र पुरुष अग्ने !

तुम सज्जनों के पालन कर्ता , ज्ञानवान , बलवान तथा ऐश्वर्यवान हो ।
यहाँ अग्नि को असुर कहा गया है ।
इसके अतिरिक्त बौद्ध काल में रचित महाभारत आदि में भी असुरों की प्रशंसा हुई है। देखें 👇
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तथासुरा गिरिभिरदीन चेतसो मुहुर्मुह:
सुरगणमादर्ययंस्तदा
महाबला विकसित मेघ वर्चस:
सहस्राशो गगनमभिप्रपद्य ह ।।२५।
(महाभारत आदि पर्व आस्तीक पर्व १८वाँ अध्याय)

इसी प्रकार उदार और उत्साह से भरे हुए हृदय वाले महाबला असुर भी जल रहित बादलों के समान श्वेत रंग के दिखाई देते थे।

उस समय हजारों 'की संख्या में-- उड़ उड़ कर देवों को पीड़ित करने लगे ।
असुर शब्द ईरानी धर्म-ग्रन्थ अवेस्ता ए झन्द में अहुर
उनके ख़ुदा का वाचक है- अर्थात् अहुर-मज्द़ा।
वैदिक रूप असुर - महत् !

अवेस्ता ए झन्द में देव का रूप दएव है ।
जिसका अर्थ है दुष्ट , कामी , धूर्त ।

राक्षस शब्द का ही अर्थ धर्म का रक्षण करने वाला ।
ज्ञात करना चाहिए कि ब्राह्मणों ने द्वेषवश राक्षस जनों का नकारात्मक वर्णन क्यों किया ।

असुर संस्कृति मैसॉपोटमिया (ईराक-ईरान ) की संस्कृति में अपने क्रूर अनुशासन के लिए प्रसिद्ध थी ।
वाल्मीकि-रामायण में असुर की उत्पत्ति का उल्लेख :-
वाल्मीकि रामायण कार ने बालकाण्ड सर्ग में
45 के 38 वें छन्द में )
सुर-असुर की परिभाषा करते हुये लिखा है-
“सुरा पीने वाले सुर और सुरा नहीं पीने वाले असुर कहे गये l” 👇

सुराप्रतिग्रहाद् देवा: सुरा इत्याभिविश्रुता:. अप्रतिग्रहणात्तस्या दैतेयाश्‍चासुरा: स्मृता:॥

उक्त श्‍लोक के अनुसार सुरा का अर्थ
‘मादक द्रव्य-शराब’ है।
चूंकि आर्य लोग मादक तत्व सुरा का प्रारम्भ से पान (सेवन) करते थे
इस कारण आर्यों के कथित देव (देवता) सुर कहलाये और सुरा का पान नहीं करने वाले मूल-भारतवासी असुर (जिन्हें देव-संस्कृति के अनुयायीयों द्वारा अदेव कहा गया) . जबकि इसके उलट यदि देव संस्कृति के अनुयायीयों द्वारा रचित वेदों में उल्लिखित सन्दर्भों पर दृष्टि डालें तो ज्ञात होता है कि देव संस्कृति अनुयायीयों के आगमन से पूर्व तक यहाँं के मूल निवासियों द्वारा ‘असुर’ शब्द को विशिष्ठ सम्मान सूचक अर्थ में विशेषण के रूप में उपयोग किया जाता था।

क्योंकि संस्कृत में असुर को सन्धि विच्छेद करके
‘असु र’ दो हिस्सों में विभाजित किया है ।

और ‘असु’ का अर्थ ‘प्राण’ तथा ‘र’ का अर्थ ‘वाला’-‘प्राणवाला’ दर्शाया गया है ।
एक अन्य स्थान पर असुनीति का अर्थ प्राणनीति बताया गया है।

ॠग्वेद (10.59.56) में भी इसकी पुष्टि की गयी है.
इस प्रकार प्रारम्भिक काल में ‘असुर’ का भावार्थ ‘प्राणवान’ और ‘शक्तिशाली’ के रूप में दर्शाया गया है।

केवल इतना ही नहीं, बल्कि अनार्यों में असुर विशेषण से सम्मानित व्यक्ति को इतना अधिक सम्मान व महत्व प्राप्त था कि उससे प्रभावित होकर शुरू-शुरू में देव संस्कृतियों के अनुयायीयों के द्वारा रचित वेदों में (ॠग्वेद में)
आर्य-वरुण तथा अन्य कथित देवों के लिये भी ‘असुर’ शब्द का विशेषण के रूप में उपयोग किये जाने का उल्लेख मिलता है।

ॠग्वेद के अनुसार असुर विशेषण से सम्मानित व्यक्ति के बारे में यह माना जाता जात था कि वह रहस्यमयी गुणों से युक्त व्यक्ति है।
महाभारत सहित अन्य प्रचलित कथाओं में भी असुरों के विशिष्ट गुणों पर प्रकाश डालते हुए उन्हें मानवों में श्रेृष्ठ कोटि के विद्याधरों में शामिल किया गया है.




आप जानते हो जब वस्त्र नया होता है ।
वह शरीर पर सुशोभित भी होता है ; और शरीर की सभी भौतिक आपदाओं से रक्षा भी करता है ।👇

परन्तु कालान्तरण में वही वस्त्र जब पुराना होने पर जीर्ण-शीर्ण होकर चिथड़ा बन जाता है ।
अर्थात्‌ उसमें अनेक विकार आ जाते हैं ।

तब उसका शरीर से त्याग देना ही उचित है ।
आधुनिक धर्म -पद्धतियाँ केवल उन रूढ़ियों का घिसा- पिटा रूप है --जो बस ब्राह्मणों के स्वार्थ सिद्ध के विधान मूलक उपक्रम हैं ।
मन्दिर इनकी आरक्षित पीढ़ी दर पीढ़ी चलने वाली दुकाने हैं ।
देवता भी इनके अनजाने हैं ।
जितने भी मठ-आश्रम हैं ज्यादातर
अय्याशी के ठिकाने हैं।

बताओ क्या सर्व-व्यापी ईश्वर मन्दिर में कैद है ?

क्या कर्म- काण्ड परक धार्मिक अनुष्ठान करने से ईश्वर के दर्शन हो जाऐंगे ?

क्या ईश्वर दान का भूखा है ?

क्या ईश्वर ने ब्राह्मणों को अपने मुख से उत्पन्न किया ।
क्या शूद्र पैरों से उत्पन्न हुए ?

ये बैहूदी बाते धर्म की बाते हैं ।
परन्तु आज इस धर्म की जरूरत नहीं !

आज आवश्यकता है विज्ञान और साम्य मूलक सामाजिक व्यवस्थाओं की !
तुमने राक्षसों को अधर्मी कहा ।
तुमने असुरों को दुराचारी कहा।
जबकि वस्तु स्थित इसके विपरीत है ।👇

वाल्मीकि-रामायण में असुर की उत्पत्ति का उल्लेख :-
वाल्मीकि रामायण कार ने वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड सर्ग 45 के 38 वें छन्द में )
सुर-असुर की परिभाषा करते हुये लिखा है-
“सुरा पीने वाले सुर और सुरा नहीं पीने वाले असुर कहे गये l”
सुराप्रतिग्रहाद् देवा: सुरा इत्याभिविश्रुता:. अप्रतिग्रहणात्तस्या दैतेयाश्‍चासुरा: स्मृता:॥

परन्तु ब्राह्मणों के स्वार्थ परक धर्म ने ही वर्ण-व्यवस्था के विधानो की श्रृंखला में समाज को बाँधने की कृत्रिम चेष्टा की!
तो परिमाण स्वरूप समाज अपने मूल स्वरूप से विखण्डित हुआ ।
इन्होंने ने जाति मूलक वर्ण-व्यवस्था के पालन को ही धर्म कहा ।
समाज में असमानता पनपी --जो वास्तविक परिश्रमी कर्म कुशल अथवा सैनिक या यौद्धा थे ।
उन्हें शूद्र कहकर उनके अधिकार छीन लिए धर्म का झाँसा देकर जब्त करलिए गये पढ़ने और लड़ने के अधिकार भी

--जो अय्याश अथवा ब्राहमणों के चापलूस थे ।
उन्हें कृत्रिम क्षत्रिय घोषित कर दिया गया ।
अन्ध-श्रृद्धा धर्म का पर्याय बन गयी !
मन्दिर में चढ़ाबे के नाम पर नित्य नियमित अन्ध-भक्तों द्वारा सोने-चाँदी तथा धन चढ़ाया जाता ।

सोमनाथ की शिव प्रतिमा 200मन स्वर्ण की निर्मित थी ।
दक्षिण भारतीय इतिहास मन्दिरों में देख लो !

निम्न समझे जाने वाले वर्गों से सुन्दर व नव यौवना कन्याएें देवदासी के रूप में तैनात की जाती तथा मन्दिर के पुजारी उनके साथ सम्पृक्त होकर अपनी अतृप्त वासनाओं की तृप्ति करते ।

विदेशी लोग भारत की इस अन्धी श्रृद्धा से परिचित हो गये
तब ज्ञात इतिहास में पहले ईरानीयों में दारा प्रथम ने भारत को जाता फिर सिकन्दर ने फिर सात सौ बारह ईस्वी में अरब से सिन्ध होते हुए :- मोहम्मद विन काशिम ने तथा फिर महमूद गजनबी 1000ईस्वी तथा अन्त में फिर ईष्ट-इण्डिया कम्पन के माध्यम से अंग्रेजों का आगमन हुआ।

ये धर्म ही था जिसने देश को गुलाम बनाया ।
और ब्राहमणों का धर्म इसके लिए जिम्बेबार था ।

क्या हम्हें फिर गुलाम बनना है ?
धर्म की असली परिभाषा तो बुद्ध ने की 👇

इसे कितने ब्राह्मण मानते हैं !

धर्म की मात्र इतनी सी परिभाषा है
कि --जो व्यवहार हम अपने लिए उचित समझते हैं । वही व्यवहार हम दूसरों के भी साथ करें ।
यह धर्म है ।

परन्तु ब्राहमणों का धर्म सूत्र कहता है ।कि 👇
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दु:शीलो८पि द्विज: पूजयेत् .
न शूद्रो विजितेन्द्रिय: क:परीतख्य दुष्टांगा दोहिष्यति शीलवतीं खरीम् पाराशर-स्मृति (१९२)

अर्थात्‌ ब्राह्मण यदि व्यभिचारी भी हो तो भी 'वह पूजने योग्य है ।

जबकि शूद्र जितेन्द्रीय और विद्वान होने पर भी पूजनीय नहीं ।
शील वती गधईया से बुरे शरीर वाली गाय भली ...

अब बताऐं कि ये धर्म त्यागना चाहिए या नहीं !



साहित्य गूँगे इतिहास का वक्ता है ।
साहित्य किसी समय विशेष का प्रतिबिम्ब तथा तत्कालिक परिस्थितियों का खाका है ।
एक दर्पण है ।

२- कोई नहीं किसी का मददगार होता है ।
से आदमी भी मतलब का यार होता है ।।
छड़ देते हैं सगे भी अक्सर मुसीबत में ।
मुफ़लिसी में जब कोई लाचार होता है ।।
बात ये अबकी नहीं सदीयों पुरानी है ।
स्वार्थ से लिखी हर जीवन कहानी है ।।
यदि स्वार्थ है जीवन का वाहक ।
अहं जीवन की सत्ता है ।।
अहंकार और स्वार्थ , हर प्राणी की गुणवत्ता है ।।

३- विश्वास को भ्रम ,
और दुष्कर्म को श्रम कह रहे ।
और लूट के व्यवसाय को ,
ये लोग उपक्रम कह रहे।।
व्यभिचार है पाखण्ड है ।
रूढ़ियों को भी ये लोग धर्म कह रहे ।।

४- इन्तहा जिसकी नहीं,
उसका कहाँ आग़ाज है ।
ना जान पाया तू अभी तक
जिन्द़गी क्या राज है ।।

५- धड़कनों की ताल पर ,
श्वाँसों की लय में ढ़ाल कर ।
स्वर बनाकर प्रीति को
तब गाओ जीवन गीत को ।।

साज़ लेकर संवेदनाओं का ।
दु:ख सुख की ये सरग़में ।
आहों के आलाप में ।
कुछ सुनाती हैं हम्हें ।।

सुने पथ के ओ! पथिक तुम
सीखो जीवन रीति को ।।
स्वर बनाकर प्रीति को
तब गाओ जीवन गीत को ।।
सिसकियों की तान जिसमें ।
एक राग है अरमान का !
प्राणों के झँकृत तार पर ।
चिर- निनादित गान का ।।
विस्तृत मत कर देना तुम
इस दायित पुनीत को ।।
स्वर बनाकर प्रीति को
तब गाओ जीवन गीत को ।।
ताप न तड़पन रहेगी।
न श्वाँस और धड़कन रहेगी ।।
विद्युत - प्रवाह सी प्रेरणा ।
बनती हैं सम्बल बड़ा ।।
तुम्हेें जीना है अपने ही बल पर ।
लक्ष्य बनाओं जीत को ।।
स्वर बनाकर प्रीति को
तब गाओ जीवन गीत को ।।

६- खो गये कहीं बेख़ुदी में ।
ख़ुद को तलाशते ।।

लापता हैं मञ्जिलें ।
मिट गये सब रास्ते ।।

न तो होश है और न ही जोश है ।।
ये जिन्द़गी बड़ी खामोश है ।।

बिखर गये हैं अरमान मेरे
सायद बदनशीं के वास्ते ।।

ये दूरियाँ ये फासिले , बेतावीयों के सिलसिले !!
एक साद़गी की तलाश में परछाँयियों से आमिले ।।

दूर से भी काँच हमको ।
पणियों जैसे भासते ।।

सज़दा किया मज्दा किया ।।
माना जिसको ख़ुदा ।।

किश्ती किनारा पाएगी
कहाँ मिल पाया ना ख़ुदा ।।

वो खुद होकर हमसे ज़ुदा ।
ओझल हो गया आस्ते ।।

खो गये कहीं बेख़ुदी में ।
ख़ुद को तलाशते ।।

७- जिन्द़गी की किश्ती !
आशाओं के सागर ।।
बीच में ही डूब गये कुछ लोग घबराकर ।।
किसी आश़िक को पूछ लो ।
द़िल का हाल जाकर ।।
दुपहरी सा जल रहा है बैचारा तमतमाकर ।।
किसी कँवारी से मत पूछना
सहानुभूति दिखाकर ।।
तड़फड़ाती फिरती है बैचारी जैसे प्यासी लहर ।।
असीमित आशाओं के डोर में ।
बँधी पतंग है जिन्द़गी कोई ।।
मञ्जिलों से पहले ही भटक जातों हैं बटोही

क्यों कि !
बख़्त की राहों पर !
जिन्द़गी वो मुसाफिर है ।।
जिसकी "रोहि" मञ्जिल नहीं ।
और न कोई सफ़र है आखिर ।।
आशाओं के कुछ पढ़ाब जरूर हैं ।
'वह भी अभी बहुत दूर हैं ।।
बस ! चलते रो चलते रहो चरैवेति चरैवेति !

८- अपनों ने कहा पागल हमको ।
गैरों ने कहा आवारा है ।
जिसने भी देखा पास हम्हें ।
उसने ही हम्हें फटकारा है ।।

कहीं न कहीं कुछ सत्य है !


_________________________________________________

यादव योगेश कुमार "रोहि"

अगला लेख: "चौधरी, ठाकुर तथा चौहान जैसी उपाधियों के श्रोत " यादव योगेश कुमार "रोहि"



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