समाज के प्रति दायित्व :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

23 मार्च 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (11 बार पढ़ा जा चुका है)

समाज के प्रति दायित्व :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस धरा धाम पर मनुष्य सर्वश्रेष्ठ प्राणी बनकर स्थापित हुआ | अपने विकासक्रम में मनुष्य समाज में रहकर के , सामाजिक संगठन बनाकर निरंतर प्रगति की दिशा में अग्रसर रहा | किसी भी समाज में संगठन के प्रति मनुष्य का दायित्व एवं उसकी भूमिका इस बात पर निर्भर करती है कि मनुष्य के अंदर इस जीवन रूपी उद्यान को सुगंध से परिपूर्ण बनाने के लिए संकल्प , संस्कार , सुविचार व समर्पण भाव कितना है | कोई भी सामाजिक संगठन मनुष्य के शरीर की तरह ही होता है | जिस प्रकार मनुष्य का शरीर कई अंगों से मिलकर बना है उसी प्रकार कोई भी सामाजिक संगठन अनेक विचारों से मिलकर बनता है | किसी व्यक्ति का समाज के प्रति वही दायित्व होता है जो शारीरिक अंगों का शरीर के प्रति | यदि शरीर के विभिन्न अंग इसी प्रकार स्वार्थी हो जायं तो यह निश्चित है कि शरीर के लिए खतरा उत्पन्न हो जाएगा | जिस प्रकार सबसे पहले भोजन मुंह में जाता है और मुंह भोजन को अपने तक ही सीमित रखें और कुछ देर बाद उसका स्वाद लेने के बाद थूक दे तो उसके इस स्वार्थ का परिणाम बड़ा भयंकर होगा | क्योंकि जब मुंह का चबाया हुआ भोजन शरीर में नहीं जाएगा तो ना तो रस बनेगा और ना ही रक्त , मांस , मज्जा आदि | इस क्रिया के बंद हो जाने पर शरीर कमजोर होने लगेगा | उसी प्रकार यदि कोई व्यक्ति समाज का ध्यान ना दे करके स्वार्थ के लिए कार्य करने लगे तो समाज कमजोर होने लगेगा | प्रत्येक व्यक्ति समाज के लिए अपना दायित्व एवं अपनी भूमिका निस्वार्थ भाव से यदि निभाता रहे तो समाज उन्नति के शिखर पर पहुंच सकता है | किसी भी सामाजिक संगठन , किसी भी समाज में सर्वप्रथम प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं अनुशासित एवं निष्ठावान होना चाहिए | यदि व्यक्ति स्वयं अनुशासित व निष्ठावान नहीं है तो समाज के अन्य व्यक्तियों को ना तो कुछ कह सकता है और ना ही समाज की प्रगति का पर्याय बन सकता है |* *आज समाज में समाज को आगे ले जाने के लिए संगठन तो अनेकों बन गये है , परंतु आज समाज की जो स्थिति है वह किसी से छुपी नहीं हुई है | इसके कारणों पर विचार किया जाता है तो यही तथ्य निकल कर सामने आता है कि मनुष्य किसी भी सामाजिक संगठन का सदस्य मात्र अपने स्वार्थ पूर्ति के लिए बन रहा है | अपने - अपने स्वार्थ में सभी लगे हुए हैं | समाज के प्रति अपने दायित्व एवं अपनी भूमिका का निर्वहन आज मनुष्य नहीं कर पा रहा है | स्वार्थ , झूठ एवं अवसरवाद आज अपने चरम पर है | यही कारण है कि कोई भी संगठन बनने के कुछ दिन के बाद ही ध्वस्त होने लगता है | जबकि मेरा "आचार्य अर्जुन तिवारी" का मानना है कि प्रत्येक मनुष्य को किसी भी समाज का ध्यान वैसे ही रखना चाहिए जैसे वह अपने शरीर का ध्यान रखता है | व्यक्ति एवं समाज वस्तुतः एक ही तरह है , दोनों का विकास दोनों पर समान रूप से निर्भर है | कोई एक बात पूरे समाज से एक साथ कह सकना संभव नहीं इसलिए यह उपाय द्वारा व्यक्तियों से ही कही जाती है | व्यक्ति को सामाजिक बनने को कहने का अर्थ यही है कि यह बात पूरी समाज से कहीं गई है | व्यक्ति यदि स्वयं को सुधार कर समाज अर्थात दूसरे लोगों का हितैषी और सहयोगी बन जाए तो समझना चाहिए कि पूरा समाज भी वैसा बन गया है | समाज के बिना मनुष्य का अस्तित्व नहीं रह जायेगा अत: प्रत्येक व्यक्ति को अपने सामाजिक दायित्वों का निर्वहन पूर्ण ईमानदारी से करना चाहिए |* *व्यक्तिवादी बनने के कारण ही आज समाज एवं सामाजिक संगठनों की दुर्गति देखी जा रही है | मनुष्य को व्यक्तिवादी ना बन करके समाज के प्रति समर्पित होना चाहिए |*

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