तीन प्रकार के ऋण :----- आचार्य अर्जुन तिवारी

25 मार्च 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (8 बार पढ़ा जा चुका है)

तीन प्रकार के ऋण :----- आचार्य अर्जुन तिवारी  - शब्द (shabd.in)

*चौरासी लाख योनियों में सर्वश्रेष्ठ मानव योनि कही गयी है | मनुष्य का जन्म मिलना है स्वयं में सौभाग्य है | देवताओं की कृपा एवं पूर्वजन्म में ऋषियों के द्वारा दिए गए सत्संग के फलस्वरूप जीव को माता पिता के माध्यम से इस धरती पर मानव रूप में आने का सौभाग्य प्राप्त होता है | इस प्रकार जन्म लेकर के मनुष्य तीन प्रकार से ऋणी हो जाता है | हमारे शास्त्रों में इसे देवऋण , ऋषिऋण एवं पितृऋण की संज्ञा दी गई है | एक मनुष्य को अपने इन तीनों प्रकार के ऋणों से उऋण होने का प्रयास करना चाहिए | जिस प्रकार हम किसी से धन लेते हैं तो उसको चुकाने की चिंता लगी रहती है उसी प्रकार यह तीन प्रकार के ऋण भी उतारने का प्रयास प्रत्येक मनुष्य को करना चाहिए | यज्ञ , दान एवं धार्मिक अनुष्ठान करके मनुष्य देवऋण से मुक्ति पा जाता है | गुरु द्वारा प्राप्त ज्ञान का प्रसार एवं ऋषियों का तर्पण तथा गुरु के प्रति सेवाभाव बनाये रखने से ऋषिऋण से मुक्ति प्राप्त होती है | सबसे कठिन है पितृऋण | वैसे तो बताया गया है कि पितरों का श्राद्ध , पिण्डदान एवं संतानोत्पत्ति कर देने से पितृऋण से मुक्ति मिलती है | परंतु विचार कीजिए कि क्या मृत्योपरांत श्राद्ध आदि कर देने मात्र से पितृऋण से उऋण हुआ जा सकता है ?? शायद नहीं ! श्राद्ध तो मरने के बाद किया जाता है जीवित रहते हुए माता - पिता की सेवा न की जाय तो मरने के बाद श्राद्ध करने का कोई औचित्य नहीं है | जिनके उद्योग से हमारा जन्म हुआ है उन माता - पिता को यदि आपके किसी भी कृत्य से कष्ट होता है तो आप कभी भी पितृऋण से उऋण नहीं हो सकते | पूर्वकाल में मनुष्य अपने तीनों ऋणों से उऋण होने का पूरा प्रयास करता था जिसके फलस्वरूप वह अपना जीवन सुखपूर्वक व्यतीत करता था | यह अकाट्य सत्य है कि ऋणी व्यक्ति सुख की नींद नहीं सो सकता है |* *आज मनुष्य धन - वैभव से युक्त भले ही दिखाई पड़ता हो परंतु वह सुखी हो यह आवश्यक नहीं है | आज प्रत्येक मनुष्य किसी न किसी प्रकार के दुख से दुखी ही दिखाई पड़ता है | जब मनुष्य को अपार कष्ट होता है और वह अपना जन्मांक एवं कुण्डली लेकर ज्योतिषियों एवं विद्वानों के पास दौड़ लगाता देखा जाता है | आज प्राय: कुण्डलियों में "देवदोष व पितृदोष देखने को मिलता हौ | आज मनुष्य के दुख का सबसे बड़ा कारण क्या है ? इस पर विचार करने के बाद मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" इसी परिणाम पर पहुँचता हूँ कि आज का मनुश्य अपने ऊपर चढ़े हुए तीन प्रकार के ऋणों को भूल सा गया है | जीवन भर देवताओं एवं ऋषियों की अवहेलना करने वाले सुख की कामना करते हैं | जीवित माता - पिता को असहनीय कष्ट देकर उन्हें उपेक्षित जीवन जीने को विवश करने वाले उनके मरने के बाद समाज को दिखाने के लिए श्राद्ध करने का ढोंग करने वाले भला सुखी कैसे रह सकते हैं ? श्राद्ध सदैव श्रद्धा से होता है न कि दिखावे के लिए | आज लोग श्राद्ध , पिण्डदान एवं तर्पण को ढोंग कहने लगे हैं | यही कारण है कि वे पितृदोष से उत्पन्न अनेक प्रकार के रोग एवं व्याधियों से पीड़ित रहते हैं | इस अकाट्य एवं सार्वभौमिक सत्य को सभी को स्वीकार करना ही होगा |* *कहते हैं कि किसी का ऋणी होकर कोई मरना नहीं चाहता है तो हमारे जीवन में जन्म से उपस्थित इन तीनों ऋणों को उतारने का प्रयास भी मनुष्य को अवश्य करना चाहिए |*

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