मोह :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

25 मार्च 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (25 बार पढ़ा जा चुका है)

मोह :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सम्पूर्ण जीवनकाल में मनुष्य काम , क्रोध , लोभ , मद , मोह , अहंकार आदि से जूझता रहता है | यही मनुष्य के शत्रु कहे गये हैं , इनमें सबसे प्रबल "मोह" को बताते हुए गोस्वामी तुलसीदास जी मानस में लिखते हैं :- "मोह सकल व्याधिन्ह कर मूला" अर्थात सभी रोगों की जड़ है "मोह" | जिस प्रकार मनुष्य को अंधकार में कुछ नहीं दिखाई पड़ता है उसी प्रकार मोह में भी सभी मनुष्य अंधे से हो जाते हैं | मोह में आँखें होते हुए भी नहीं होती हैं , मोह के अंधेपन को ही हमारे ऋषियों ने आध्यात्मिक अंधापन कहा है | मानव जीवन में सभी प्रकार के विकारों का कारण मोह ही है | मोहरूपी सिक्के का दूसरा पहलू है भय , जहाँ मोह होता है वहीं भय भी होता है | भय यह कि यह मिट न जाये और मोह यह कि स्वयं को बचायें कैसे ? मोह का मूल होता है अज्ञान एवं परिणाम होता है दुख | यदि मनुष्य किसी कार्य में असफल होता है तो दुख होता है और यदि सफल हो जाता है तो भी दुख ही उपस्थित होता है | मनुष्य के मन में विचार उठते हैं कि ज्यादा से ज्यादा धन हो , अच्छा मकान हो , ताकि जीवन सम्मान से व्यतीत हो सके ! यही मोह है | मोह में सभी दृश्य उल्टे हो जाते हैं जैसे :- जमीन , जायदाद , मकान मनुष्य जिसे अपना समझता है वह तो मनुष्य के जन्म लेने के पहले से यहाँ थीं और मरने के बाद भी यहीं रहेंगीं तो भला यह किसी की कैसे हो सकती हैं ? परंतु इसी जाल में मनुष्य जीवन भर उलझा रहता है | मेरा बेटा , मेरा पति , मेरी पत्नी आदि जो मेरे तेरे का विस्तार है यही मोह का अंधकार है | मेरे और हमारे का भाव ही मोहरूपी अंधकार बनकार फैलता चला जाता है | मैं और मेरे का भाव ही मोह की निशानी है |* *आज स्वयं को निर्मोही सिद्ध करते हुए अनेक लोगों ने घर परिवार का त्याग करते हुए सन्यास आश्रम तो ले लिया है परंतु प्रत्येक मठाधीश अपने आश्रम के ज्यादा से ज्यादा विस्तीर के मोह में ही जकड़ा हुआ दिखाई पड़ता है | आज के युग में चारों ओर मोह का ही साम्राज्य दिखाई पड़ता है | मनुष्य मोह में इतना अंधा दिखाई पड़ रहा है कि छोटी सी छोटी बात पर भी खून खराबा करने को तैयार दिखाई पड़ता है | आज मोह का विस्तार कितना है यह बताने की आवश्यकता नहीं है | लोग परिवार से आगे बढ़कर समाज व जाति विशेष के मोह में अंधे होकर साम्प्रदायिक होते जा रहे हैं | समय समय पर हमारे मार्गदर्शकों द्वारा मोह को त्यागने व इससे बचने के उपाय बताये जाते रहे हैं | मेरा "आचार्य अर्जुन तिवारी" का मानना है कि जिस प्रकार किस्सी गन्ने से उसके रस को निकालने के लिए गन्ने को निचोड़ना पड़ता है उसी प्रकार मोह से बचने के लिए मनुष्य को भी स्वयं को निचोड़ना पड़ता है | स्वयं को निचोड़ने के विभिन्न मार्गों में सर्वश्रेष्ठ मार्ग है ध्यान का | ध्यान विधि के द्वारा मनुष्य अपने अन्तर्चक्षुओं का उन्मीलन करके ही संसार में व्याप्त मोहरूपी जाल से स्वयं को बचा सकता है | वैसे तो इस सकल सृष्टि में मोह एवं माया से कोई भी बच नहीं पाया है | बचता वही है जिसने ध्यान एवं योग का आश्रय ले लिया है | मोह से बचने का प्रथम स्तर है त्याग | बिना त्याग की भावना हृदय में उतेपन्न हुए मोह से बचना मुश्किल ही नहीं वरन् असम्भव है |* *मोहरूपी रात्रि में सभी संसारी जीव सोते हुए अनेक प्रकार के स्वप्न देखा करते हैं | इस मोहरूपी रात्रि में सोने से वही बच सकता है जो मैं एवं मेरे के भाव से विरक्त है |*

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