मुस्कुराती बहारों को नींद आ गई

26 मार्च 2019   |  Arshad Rasool   (25 बार पढ़ा जा चुका है)

मुस्कुराती बहारों को नींद आ गई

आज यूं गम के मारों को नींद आ गई,

जैसे जलते शरारों को नींद आ गई।


थे ख़ज़ां में यही होशियार-ए-चमन,

फूल चमके तो खारों को नींद आ गई।


तुमने नज़रें उठाईं सर-ए-बज़्म जब,

एक पल में हजारों को नींद आ गई।


वो जो गुलशन में आए मचलते हुए,

मुस्कुराती बहारों को नींद आ गई।


चलती देखी है 'अरशद'' इक ऐसी हवा,

जिससे दिल के शरारों को नींद आ गई।

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शब्दार्थ...

शरारों = अंगारों, खजां = पतझड़, चमन/गुलशन = उपवन,

खारों = कांटों, बज़्म = महफ़िल, बहार = बसंत।

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