संतुलन

27 मार्च 2019   |  मोहित शर्मा ज़हन   (29 बार पढ़ा जा चुका है)

संतुलन - शब्द (shabd.in)

आज सरयू जंगल का माहौल ग़मगीन था। जंगल के राजा बब्बर शेर सूमो का बेटा, जंगल का राजकुमार डिमो गंभीर रूप से घायल था। उसके माथे, छाती और पैरों पर गहरे ज़ख्म थे। गप्पू लोमड़ ने घात लगाकर डिमो पर पीछे से हमला किया था। वैसे कोई सूमो के मुँह पर कुछ नहीं कह रहा था पर दबी ज़ुबान में हर कोई इस घटना का ज़िम्मेदार सूमो को बता रहा था। बात ये थी कि बचपन से सूमो ने डिमो के अंदर बिना सोचे समझे निडर रहने की बात घर करवा दी थी।

“कोई घूर के भी देखे तो अपनी गरजती दहाड़ से उसका सू-सू निकाल दियो।”

“कोई ज़्यादा चें-चा करे तो उसके थप्पड़, घुसंड बजा दियो।”

“कोई हाथ उठाये तो उसमें बजा-बजा के भुस भर दिया कर…शाबाश मेरे बच्चे!”

इस सोच के साथ बड़े होते हुए डिमो के अंदर अहंकार आ गया। अपनी शक्ति और अन्य जानवरों से ऊपर होने के दंभ में डिमो बेमतलब की बहस, लड़ाइयों में पड़ने लगा। नदी किनारे जानवरों के जमावड़े में डिमो को गप्पू लोमड़ का भीड़ में धक्का लग गया। इतनी सी बात पर डिमो ने कई जानवरों के सामने गप्पू को थप्पड़ मार दिया और खूब बातें सुनाकर अपमान किया। गप्पू ने डिमो से इस बेइज़्ज़ती का बदला लेने की ठान ली। अब सूमो शेर ने अपने बेटे में निडरता तो भर दी पर उसे व्यावहारिकता का पाठ पढ़ाना छूट गया। ये तो बता दिया कि सामने वाले को पीट दो पर पिटने के बाद वह जानवर क्या अनिष्ट कर सकता है या कभी भविष्य में उस जानवर से कोई काम पड़ा तो क्या होगा। दुनियादारी केवल ताकत के दम पर कहाँ चलती है? यह सबक आज डिमो के साथ-साथ सूमो को भी मिल चुका था।

गप्पू पर पक्का मुकदमा चलाने के लिए एक गवाह की ज़रुरत थी। सांगा ऊदबिलाव ने ये घटना देखी थी पर उसी दिन सांगा को जंगल छोड़ना था। दूर देश से आयी अवैध नागरिक चमकीली छिपकली ने डर दिखाकर सांगा की नागरिकता के दस्तावेज़ हड़पकर सांगा की पहचान चुरा ली थी। इस कारण सांगा ऊदबिलाव को कुछ दिन पहले सरयू जंगल की नागरिकता से हाथ धोना पड़ा था। डिमो पर हमले के मुक़दमे की तारीख़ से 1 हफ्ता पहले यानी आज सांगा को जंगल छोड़ना था। लोग सांगा को बेवक़ूफ़ कह रहे थे पर उसकी यह बेवकूफी उसकी परवरिश में दबी थी। सांगा के साथ डिमो से एकदम उलट समस्या थी. बचपन से उसने अपने घर में कड़क माहौल देखा था। उसके ऊदबिलाव अभिभावकों ने ना केवल खुद से पर बाहरी दुनिया के प्रति सांगा में डर भर दिया था।

“कोई धमकाये तो सिर झुका कर बगल से निकल जाओ।”

“लड़ाई तो क्या बहस से बचने के लिए अगर माफ़ी मांगनी पड़े तो मांग लो।”

पिता की तेज़ आवाज़ से ही सांगा में सिरहन दौड़ जाती थी। हालत इतनी बदतर हो गयी थी कि बाहर भी कोई चिल्लाता तो सांगा डर जाता। दुनियादारी की कमी यहाँ भी थी। जहाँ डिमो बेवजह गर्म था वहीं सांगा को अपने अधिकार के लिए आवाज़ उठाने में भी डर लगता था। आज अगर दोनों संतुलित होते तो ना ये घटना होती और अगर ऐसा कुछ होता भी तो दोषी को सही सज़ा मिलती।

समाप्त!

सीख – अभिभावकों से निवेदन है कि ना तो अपने बच्चों को डिमो शेर जैसा खुला छोड़ दें और ना ही उसके व्यवहार पर सांगा ऊदबिलाव जैसी लगाम लगा दें। पैमाने (स्केल) के दोनों तरफ में से कहीं भी रहकर दुनिया में रहना मुश्किल हो जाता है। सही जीवन के लिए व्यवहार में संतुलन ज़रूरी है ताकि अनचाही घटनाओं से ज़्यादा से ज़्यादा बचा जा सके।

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