माता पिता एवं गुर :;--- आचार्य अर्जुन तिवारी

30 मार्च 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (25 बार पढ़ा जा चुका है)

माता पिता एवं गुर :;--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सनातन धर्म में तैंतीस करोड़ देवी देवताओं की मान्यता है | इन देवी - देवताओं को शायद ही किसी ने देखा हो , ये कल्पना भी हो सकते हैं | देवता वही है जिसमें कोई दोष न हो , जो सदैव सकारात्मकता के साथ अपने आश्रितों के लिए कल्याणकारी हो | शायद हमारे मनीषियों ने इसीलिए इस धराधाम पर तीन जीवित एवं जागृत देवताओं कल्पना करते हुए "मातृदेवोभव" , "पितृदेवोभव" एवं "गुरुदेवोभव" का उद्घोष किया है | माता एवं पिता अपने सभी सन्तानों को समानरूप से जन्म देकर बिना किसी भेदभाव के उनका पालन - पोषण करते हैं तो गुरु के आश्रम में अनेकों शिष्य समानरूप से शिक्षा ग्रहण करते हुए देखे जा सकते हैं | माता , पिता एवं गुरु को निर्दोष मानते हुए इन्हे जीवित देवी - देवता की उपमा दी गयी है | हमारे इतिहास में अनेकों कथानक पढ़ने को मिलते हैं जहाँ वेदोक्त एवं पुराणोक्त देवी देवताओं की उपासना का त्याग करके मात्र माता - पिता की सेवा करते हुए पुत्रों ने अपना नाम अमर कर लिया | श्रवण कुमार , मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम , आदि ऐसे चरित्र हैं जिन्होंने माता - पिता की सेवा एवं उनके वचन पालन के लिए अपना सर्वस्व निछावर कर दिया | कर्ण , उद्दालक , कबीरदास जैसे अनेक शिष्य भी हुए हैं जिन्होंने अपने गुरु के दुर्वचन एवं श्राप को भी अंगीकार किया परंतु कभी अपने गुरु में दोष नहीं देखा | ऐसा करके ही वे इतिहास के पन्नों पर आज भी अमर हैं | इस संसार में जिसने भी जन्म लिया है वह कभी भी इन तीनों (माता - पिता , गुरु) के ऋण से उऋण नहीं हो सकता | यदि माता - पिता न होते तो शायद जन्म ही न हो पाता , और यदि गुरु का संरक्षण न प्राप्त होता तो शायद देश समाज को जानने , समझने के योग्य मनुष्य नहीं बन सकता था | इसीलिए हमारे मनीषियों ने "मातृदेवोभव" "पितृदेवोभव" एवं "गुरुदेवोभव" का उद्घोष किया था |* *आज समय बदल चुका है , अधिकतर घरों में धरती के जीवित देवता उपेक्षित जीवन जीने को विवश हैं | आज की संतान जब कुछ योग्य हो जाती है तो अपने जन्मदाता माता - पिता से यह कहते हुए देखी जा सकती है कि आपने हमारे लिए किया क्या है ?? यदि जन्म देकर पढ़ाया - लिखाया तो यह तो आपका फर्ज था ! इतना ही अनेक भरों में यह भी देखने को मिल रहा है कि जिन माता - पिता को पुत्र प्राणों से ज्यादा मानता है विवाहोपरान्त उन्हीं माता - पिता में उसे दोष ही दोष दिखाई पड़ने लगता है | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" देख रहा हूँ कि आज इस दोष से निर्दोष कही जाने वाली "गुरुसत्ता" भी नहीं बच पाई है | ऐसे - ऐसे लोग इस समाज में देखने को मिल रहे हैं जो यह कहते हुए सुने जा सकते हैं कि :- यदि शिष्य नालायक निकल गया तो अवश्य ही गुरु का दोष है | ऐसे सभी लोगों की दृष्टि पर नकारात्मकता का पर्दा पड़ा होता है | जिन्हें हमारे धर्मग्रंथों ने देवी - देवता की उपाधि दी है उनमें अपना किंचित स्वार्थसिद्ध करने के लिए आज का मनुष्य दोष देख रहा है | यह ये नहीं समझ रहे हैं कि यहाँ कर्मप्रधान है , हम जैसा करेंगे वैसा ही फल प्राप्त होना है | आज जैसा हम अपने माता - पिता एवं गुरु के साथ व्यवहार कर रहे हैं वैसा ही व्यवहार आने वाले भविष्य में हमारी संतानें एवं शिष्य हमारे साथ करेंगे यह अकाट्य है | मनुष्य को यह चाहिए कि यदि हम अपने माता - पिता एवं गुरु का सम्मान न कर पायें तो कम से कम अपमान तो न करें ! उन्हें दोषी तो न बनायें ! उनका दोष क्या यही है कि उन्होंने जन्म देकर पालन करके समाज को समझने का तरीका बताया | आज यदि ऐसा हो रहा है तो इसका कारण यही समझा जा सकता है कि आज की संताने अधिक समझदार एवं बुद्धिमान हो गयी हैं जो ऐसे चरित्रों पर भी उंगली उठा सकती हैं जिन चरित्रों पर दोषारोपण करने का साहस राम , कृष्ण एवं अनेकों महापुरुष भी नहीं कर पाये | यह संस्कारविहीनता ही मनुष्य को दिग्भ्रमित कर रही है |* *प्रत्येक मनुष्य को अपने माता - पिता एवं गुरु के प्रति जीवन भर कृतज्ञ रहना चाहिए | क्योंकि भविष्य में वे भी इस पर पदासीन होने वाले हैं |*

अगला लेख: कर्मफल :--- आचार्य अर्जुन तिवारी



शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
27 मार्च 2019
*इस संसार में जन्म लेने के बाद मनुष्य अनेक प्रकार के घटनाक्रम से होते हुए जीवन की यात्रा पूरी करता है | कभी - कभी मनुष्य की जीवनयात्रा में ऐसा भी पड़ाव आता है कि वह किंकर्तव्यविमूढ़ सा होकर विचलित होने लगता है | यहीं पर मनुष्य यदि सत्यशील व दृढ़प्रतिज्ञ नहीं है तो वह अपने सकारात्मक मार्गों का त्याग
27 मार्च 2019
21 मार्च 2019
*रामनवमी का पवित्र दिवस जिसे श्री राम के प्राकट्योत्सव के रूप में मनाया जाता है दो दिन बाद आने वाला है | प्रतिवर्ष हम सभी बड़े हर्षोल्लास के यह पर्व मनाते चले आ रहे हैं | एक दिन यह पर्व मनाकर हम फिर इसे या भगवान राम के बताये मार्गों को भूलने लगते हैं | मर्यादापुरुषोत्तम की मर्यादा का पालन करना आज हम
21 मार्च 2019
29 मार्च 2019
*मानव जीवन पाकर के प्रत्येक व्यक्ति सफल होना चाहता है | जीवन के सभी क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने की इच्छा रखने वाला मनुष्य अपने उद्योग , प्रबल भाग्य एवं पारिवारिक सदस्यों तथा गुरुजनों के दिशा निर्देशन में सफलता प्राप्त करता है | परंतु मनुष्य की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वह कितना सकारात्मक
29 मार्च 2019
20 मार्च 2019
*सनातन धर्म के संस्कार , संस्कृति एवं वैज्ञानिकता सर्वविदित है | सनातन धर्म के महर्षियों ने जो भी नीति नियम बनाये हैं उनमें गणित से लेकर विज्ञान तक समस्त सूत्र स्पष्ट दिखाई पड़ते हैं | सनातन धर्म के संस्कार रहे हैं कि मनुष्य जब गुरु के यहां जाता था तब वह सेवक बनकर जाता था | इस पृथ्वी पर एकछत्र शासन
20 मार्च 2019
16 मार्च 2019
*इस धराधाम पर सर्वोच्च प्राणी मनुष्य ने अपने व्यवहार व कुशल नीतियों के कारण समस्त पृथ्वी पर शासन करता चला आ रहा है | मानव जीवन में कौन किसका हितैषी है और कौन विपक्षी यह मनुष्य के वचन एवं व्यवहार से परिलक्षित होता रहा है | मनुष्य जीवन में मनुष्य अपने वचन पर स्थिर रहते हुए वचन पालन करते हुए समाज में स
16 मार्च 2019
20 मार्च 2019
*आदिकाल में जब इस सृष्टि में मनुष्य का प्रादुर्भाव हुआ तो उनको जीवन जीने के लिए वेदों का सहारा लेना पड़ा | सर्वप्रथम हमारे सप्तऋषियों ने वेद की रचनाओं से मनुष्य के जीवन जीने में सहयोगी नीतियों / रीतियों का प्रतिपादन किया जिन्हें "वेदरीति" का नाम दिया गया | फिर धीरे धीरे धराधाम पर मनुष्य का विस्तार ह
20 मार्च 2019
30 मार्च 2019
*इस धरा धाम पर परमात्मा की सर्वोत्कृष्ट रचना मनुष्य को मानी गई है | जन्म लेने के बाद मनुष्य ने धीरे धीरे अपना विकास किया और एक समाज का निर्माण किया | परिवार से निकलकर समाज में अपना विस्तार करने वाला मनुष्य अपने संपूर्ण जीवन काल में अनेक प्रकार के रिश्ते बनाता है | इन रिश्तो में प्रमुख होती है मनुष्य
30 मार्च 2019
27 मार्च 2019
*सम्पूर्ण विश्व में भारत ही ऐसा देश है जहाँ से "वसुधैव कुटुम्बकम्" का उद्घोष हुआ | हमारे मनीषियों ने ऐसा उद्घोष यदि किया तो उसके पीछे प्रमुख कारण यह था कि मानव जीवन में कुटुम्ब अर्थात परिवार का महत्त्वपूर्ण व विशिष्ट स्थान है | देवी - देवताओं से लेकर ऋषि - मुनियों तक एवं राजा - महाराजाओं से लेकर असु
27 मार्च 2019
31 मार्च 2019
*यह समस्त सृष्टि निरन्तर चलायमान है ! जो कल था वह आज नहीं है जो आज है वह कल नहीं रहेगा | कल इसी धरती पर राम कृष्ण आदि महान पुरुषों ने जन्म लिया था जो कि आज नहीं हैं ! आज हम सब इस धरती पर जीवन यापन कर रहे हैं कल हम भी नहीं रहेंगे ! हमारी आने वाली पीढ़ियां इस धरती पर विचरण करेंगी | जहाँ कल नदियाँ थीं
31 मार्च 2019
27 मार्च 2019
*परमात्मा द्वारा सृजित यह सृष्टि बड़ी ही विचित्र है | ईश्वर ने चौरासी लाख योनियों की रचना की ! पशु , पक्षी , मनुष्य , जलचर आदि जीवों का सृजन किया | कहने को तो यह सभी एक जैसे हैं परंतु विचित्रता यही है कि एक मनुष्य का चेहरा दूसरे मनुष्य से नहीं मिलता है | असंख्य प्रकार के जीव हैं , एक ही योनि के होन
27 मार्च 2019
23 मार्च 2019
*इस धरा धाम पर मनुष्य सर्वश्रेष्ठ प्राणी बनकर स्थापित हुआ | अपने विकासक्रम में मनुष्य समाज में रहकर के , सामाजिक संगठन बनाकर निरंतर प्रगति की दिशा में अग्रसर रहा | किसी भी समाज में संगठन के प्रति मनुष्य का दायित्व एवं उसकी भूमिका इस बात पर निर्भर करती है कि मनुष्य के अंदर इस जीवन रूपी उद्यान को सुग
23 मार्च 2019
16 मार्च 2019
*सनातन धर्म में मानव जीवन को चार आश्रमों के माध्यम से प्रतिपादित किया गया है | ब्रह्मचर्य , गृहस्थ , वानप्रस्थ एवं सन्यास | सनातन धर्म में आश्रम व्यवस्था विशेष महत्व रखती है | यही आश्रम व्यवस्था मनुष्य के क्रमिक विकास के चार सोपान हैं , जिनमें धर्म , अर्थ , काम एवं मोक्ष आदि पुरुषार्थ चतुष्टय के समन
16 मार्च 2019
27 मार्च 2019
*इस संसार में जन्म लेने के बाद मनुष्य अनेक प्रकार के घटनाक्रम से होते हुए जीवन की यात्रा पूरी करता है | कभी - कभी मनुष्य की जीवनयात्रा में ऐसा भी पड़ाव आता है कि वह किंकर्तव्यविमूढ़ सा होकर विचलित होने लगता है | यहीं पर मनुष्य यदि सत्यशील व दृढ़प्रतिज्ञ नहीं है तो वह अपने सकारात्मक मार्गों का त्याग
27 मार्च 2019
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x