जीवन में समभाव :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

31 मार्च 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (22 बार पढ़ा जा चुका है)

जीवन में समभाव :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*यह समस्त सृष्टि निरन्तर चलायमान है ! जो कल था वह आज नहीं है जो आज है वह कल नहीं रहेगा | कल इसी धरती पर राम कृष्ण आदि महान पुरुषों ने जन्म लिया था जो कि आज नहीं हैं ! आज हम सब इस धरती पर जीवन यापन कर रहे हैं कल हम भी नहीं रहेंगे ! हमारी आने वाली पीढ़ियां इस धरती पर विचरण करेंगी | जहाँ कल नदियाँ थीं वहाँ आज मैदान दिखाई पड़ता है | जहाँ घने जंगल एवं पर्वत श्रृंखलायें थी वहाँ आज ऊँचे - ऊँचे भवन एवं बस्तियाँ दिखाई पड़ रही हैं | इस संसार में कुछ भी स्थाई नहीं है | यहाँ जो भी आया है उसका विनाश अवश्य होना है | इस संसार में यदि कुछ शेष रह जाता है तो वह है मनुष्य के कर्म एवं उसका नाम | यहाँ महान कर्म करने वालों को यदि याद किया जाता है तो बुरे कर्म करने वाले स्मरण किये जाते हैं परंतु याद करने के भावों में परिवर्तन आ जाता है | मनुष्य को जीवन में सदैव ऐसे कर्म करने चाहिए कि उसके न रहने के बाद भी यह संसार उनको याद करता रहे | किसी से द्वेष , बैर आदि रखकर किसी का अपमान करके या कुछ अनिष्ट करके मनुष्य कुछ पल के लिए तो स्वयं में प्रसन्न रह सकता है परंतु यह प्रसन्नता स्थाई नहीं रह सकती , क्योंकि यहाँ स्थाई कुछ भी नहीं है | मनुष्य अपने कर्मों के माध्यम से ही सुख , दुख प्रशंसा एवं बुराई प्राप्त करता है | मनुष्य परिवार में जन्म लेकर इस धराधाम पर विकास करता है उसके इस विकास में जहाँ माँ ने अपनी नींद , भूख , प्यास एवं आवश्यक आवश्यकताओं का त्याग किया होता है वहीं पिता ने दिन रात मेहनत करके उसे कुछ बनाने का प्रयास किया होता है ! मनुष्य को यह कभी नहीं भूलना चाहिए | मनुष्य के द्वारा यह भूलने का अपराध इसलिए नहीं करना चाहिए क्योंकि वह भी निरन्तर उसी दिशा में अगिरसर हो रहा होता है जहाँ उसे भी माता - पिता बनने का सौभाग्य प्राप्त होने वाला होता है | अत: यह ध्यान रखते हुए सावधान रहें कि जो हम आज बाँट रहे हैं वही हमको वापस मिलना है |* *आज संसार में मनुष्य की वह स्थिति हो गयी है कि जिसका वर्णन कर पाना ही मुश्किल है | आज सारा संसार राग , द्वेष , अहंकार के वशीभूत होकर अपना क्रियाकलाप सम्पादित कर रहा है | जहाँ विश्व के अनेक देश एक दूसरे के प्रति आमने - सामने खड़े हैं वहीं समाज की सबसे छोटी इकाई परिवार भी इससे अछूता नहीं रह गया है | आज मनुष्य जैसे ही कोई उच्चपद या तनिक धन पा जाता है उसको ऐसा प्रतीत होने लगता है कि इस समय मेरे समान कोई नहीं है | उस पदलोलुपता या धनलोलुपता में वह परिवार एवं समाज के लोगों को तुच्छ समझने लगता है | हद तो तब हो जाती है जब मनुष्य अपने माता पिता तक को ठुकरा देने का दुस्साहस कपने लगता है | जिन मित्रों के माध्यम से वह उच्चपद पर आसीन होता है उन्हीं को वह बैरी मानकर दुत्कारने का प्रयास करने लगता है | ऐसे सभी लोगो से मेरा "आचार्य अर्जुन तिवारी" का यही पूछना है कि क्या वह माँ की रातों की नींद वापस कर सकता है ? क्या पिता का समय या मित्रों का किया गया मार्गदर्शन वापस कर सकता है ?? शायद नहीं | आज जो जिस पद पर है वह उसी पद पर बना रहेगा यह आवश्यक नहीं है | अपने प्रेम एवं सम्बन्धों को बनाकर रखिये इस लम्बे जीवन में पता नहीं कब किसकी आवश्यकता पड़ जाय | चिड़िया आकाश में फर्राटे भरते समय यदि यह विचार करे कि पृथ्वी एवं पृथ्वीवासी तुच्छ हैं , मेरे समान नहीं हैं क्योंकि मैं तो आकाश में उड़ रही हूँ | विचार कीजिए कि वह आकाश में कब तक रह सकती है ? कभी तो वह समय आयेगा जब उसको पृथ्वी पर उतरना पड़ेगा | इसलिए कभी भी ऐसा विचार नहीं करना चाहिए | क्योंकि यहाँ कब क्या हो जाय कोई नहीं जान पाया है |* *यदि सम्भव हो सके तो सबसे प्रेमभाव बनाकर रखे ! न सम्भव हो तो द्वेषभाव भी न रखकर समभाव बनाने का प्रयास करते रहना चाहिए |*

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