आतंकवादी चूहा

01 अप्रैल 2019   |  सौरभ शर्मा   (67 बार पढ़ा जा चुका है)


मासूमियत का असली मतलब आप किसी भी बच्चे या जानवर की नजरों से नजरें मिलाकर पता कर सकते हैं। शायद इसी सच्चाई से प्रेरित होकर हमारे पूर्वजों ने इंसान का शरीर और जानवरों की गर्दनों को जोड़कर भगवानों की कल्पना की थी। इसी के चलते हमें ये भगवान बड़े भाते हैं जैसे - गणेश जी। मगर इनके वाहन मूषक राज को भगवान की मोहर लगने के बाद भी समाज में कोई खास इज्जत नहीं मिल पाई। इस नन्हें जीवन को हम गणेश की मूर्ति के पास ही देखना अच्छा समझते हैं। हमारी इस जीव से कोई दुश्मनी तो नहीं है, मगर इससे ज्यादा नजदीकियां बढ़ाने का भी हमारा कोई इरादा नहीं था। लेकिन एक दिन गणेश जी ने हमारी भक्ति-परीक्षा के लिए अपनी मूषक सेना एक सैनिक हमारे घर में प्रवि" करा दिया। अब यह नया अतिथि कभी वापस जाने वाले मेहमान की तरह हमारे घर में जमकर बैठ गया। अपनी दिलेरी की हर जगह छाप छोड़ते हुए यह सैनिक हमारे घर में अपने साम्राज्य को ईस्ट इंडिया कंपनी की तरह बढ़ाने लगा। कभी तरबूज हमें महाभारत में छलनी हुए भीष्म पितामह की तरह मिलता तो कभी हमारे कपड़ों पर नए फैशन वाली कटिंग मिलती। हर रात ये घुसपैठिया सरहद पार के आतंकवादी की तरह हमारे घर में घुसता और अपनी कुतरने के प्राकृतिक गुण वाले बम से हमारा कुछ-ना-कुछ नुकसान करके सुबह उल्टे पांव लौट जाता।

हद तो तब हो गई जब रात को घुसने वाला ये शिकारी दिन में भी नजर आने लगा था। इसे देखते ही हम खून का घूंट पीकर रह जाते कि एक कल का आया पिद्दी सा चूहा हमारे घर में हमें ही ललकार रहा है। क्षत्रिय होने के नाते हमने भी चुनौती को स्वीकार कर लिया और बाजार से एक चूहेदानी ले आए। अब उस चूहेदानी को हथियार बनाकर हम भी उस आर-पार की लड़ाई में कूद पड़े।

एक रात हमने पिंजरा लगाया और खटिया पर चादर तानकर सोने का नाटक करने लगे। चूहा आया और स्थिति को अनुकूल समझ पिंजरे की तरफ बढ़ा, हम अपनी खुशी रोक नहीं पा रहे थे मगर अगले ही पल हमारी खुशी जाती रही, जब चूहा रोटी का टुकड़ा लेकर भाग गया और पिंजरा बंद नहीं हुआ। हमने मन ही मन उस दुकानदान को अपशब्दों का एक ग्रंथ भेंट कर दिया जिससे ंपिंजरा खरीदा था। मगर दिल का मलाल कम ना हुआ। खैर अगली सुबह की नई उम्मीद के बारे में सोचकर हम सो गए। उस छद्म-युद्ध में उस घुसपैठिये से हमारी पहली हार हो चुकी थी।

अपनी दूसरी योजना बनाई और उसे क्रियान्वित करने के लिए छुटटी का दिन चुना। इसका मुख्य कारण था कि उस दिन हमारी श्रीमती जी मायके गई हुई थी बच्चों को साथ लेकर। अब किसी शेर की तरह घात लगाकर हम भी एक जगह बैठ गए और चूहे की प्रतीक्षा करने लगे। चूहा आया और पिंजरे की तरफ बढ़ा। उसके पिंजरे में घुसते ही हमारे सब्र का बांध टूट गया और हमने झाडू फेंककर पिंजरे पर मारी, मगर पिंजरा बंद होने से पहले ही चूहा निकल गया था। फिर हमने उठकर उस पर डंडे से प्रहार करना शुरु कर दिया मगर हमारा एक भी वार से छू नहीं पाया और एक घंटे की दौड़-धूप के बाद हम कमरे की हालत पर ध्यान दिए बिना ही निद्रा मग्न हो गए। घंटे भर बाद जागने के बाद हमारा अभियान फिर चालू हो गया। हमारी ऐसी ही कई मुठभेड़चूहे के साथ हुई। श्याम को देवी जी ने कमरे की हालत देखकर हमें खूब खरी-खोटी सुना डाली। इस कहा-सुनी ने हमारे और चूहे के बीच की दुश्मनी के रंग को और भी गहरा कर दिया। अब हमें उस चूहे को पकड़ने के लिए शत-प्रतिशत फूल-प्रूफ प्लान की जरूरत थी।

एक रात जब हम पानी पीने के लिए उठे तो उस चूहे की आहट अपने सोफे के नीचे सुनी। हमने झट से खिड़की-दरवाजे बंद कर दिए, और ऐसा कोई रास्ता नहीं छोड़ा जहां से वो कमरे से बाहर निकल सके। हमने कमरे में रखी नई झाडू उठाली और उसे मांद से बाहर निकालने का प्रयास करने लगे। हमें सफलता मिली और चूहा दूसरी जगह छिपने के लिए भागा। मौके का फायदा उठाकर हमने वार करना चाहा पर हमारा वार खाली गया। बंद दरवाजे को देखकर अब वो भी समझ गया कि अब इस लड़ाई को खुलकर ही लड़ना पड़ेगा। वो हम पर वार तो नहीं कर सकता था मगर हमें छका सकता था। फिर भागकर वह अलमारी के पीछे छिप गया मगर आज हमने उसकी छाती से सांसे छीनने की कसम खा ली थी। हमने उसे अलमारी पर झाडू से आवाज करके बाहर निकाला तो वो दूसरी अलमारी के पीछे जा छिपा। इसी तरह 10-15 मिनट तक वह हमें छकाता रहा।

हमारी समझ में गया कि चूहा कमरे के सामान को चक्रव्यूह की तरह इस्तेमाल कर रहा है। इसलिए उसे दरवाजे से दूर भगाकर किसी जगह छुपने के लिए मजबूर किया और वो वहां सहम कर बैठ गया, फिर हमने कमरे से कुछ कुर्सियां-मेज बाहर निकाल दिए, खूंटियों पर टंगे कपड़े भी बाहर रख दिए, खिड़की-दरवाजों के पर्दे जमीन से इतनी ऊपर बांध दिए जिस पर चूहा चढ़ ना सके। अब फिर हमने लड़ने के लिए तैयार होकर उसे बाहर निकाला, मगर अभी भी कुछ सामान हमारे राह में अटकलें बनकर खड़ा हुआ था। फिर हमने पहियों वाली अलमारी भी बाहर निकाल दी और जो सामान बाहर नहीं जा सकता था उसके चारों तरफ अपने घूमने लायक जगह बना ली। अब उसके लिए छिपने को ज्यादा जगह नहीं बची थी। हम उस पर वार करने लगे और वो हमें थकाता रहा। अपना हौंसला बढ़ाने के लिए हम उसे अपशब्द कहने लगे जिसे सुनकर दूसरे कमरे में सो रही श्रीमती जी भी उठ गई और कमरे के बाहर से ही सवाल जवाब करने लगी। हमारे मुंह से बस इतना ही निकाला कि आज इस चूहे को जिंदा नहीं छोड़ेंगे। उस छोटे आतंकवादी ने हमारे निजी दायरे में घुसकर गैरवक्त पर हमारे क्षत्रिय रक्त को चुनौती दे दी थी।

पसीने से तर हम उसके पीछे कमरों में इधर से उधर भागते रहे। अब हमें और कोई सुध नहीं थी। हमने तय कर लिया था कि कल के सूरज के दर्शन हम अपनी जीत का जश्न मनाकर ही करेंगे। अब तो चूहे की हिम्मत भी जवाब देने लगी थी। वह भी सोचता होगा की आज जान बची तो इस घर में कभी वापस नहीं आऊंगा। हमने भी अपनी सारी कुंठा के सैलाब में चूहे को डुबोकर मारने का फैसला कर लिया था। डेढ़ घंटे की हमारी मेहनत रंग लाई और एक जबरदस्त वार ने चूहे को पस्त कर दिया और दो-तीन झाडू गुस्से में ही हमने उस घायल दुश्मन को मारी और अपनी जीत को पक्का मानकर हमने विजयी भाव से सिर उठाया। चूहे को उठाकर हमने चूहेदानी में डाल दिया। थोड़ी ही देर में चूहा फिर से उछलने लगा जैसे कुछ हुआ ही ना हो। उसे भी अपनी जिंदगी के बचने की खुशी थी। कमरे में बिखरे नई झाडू के तिनके हमारी जीत का प्रमाण थे। आज हमने भी अपनी क्षत्रिय प्रथा को निभाकर यह प्रमाण दे दिया कि दुश्मन बाहर हो या घर में, हमारे सामने कभी टिक सकेगा।

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