महत् चिंतन

04 अप्रैल 2019   |  विजय कुमार तिवारी   (36 बार पढ़ा जा चुका है)

प्रश्न है कि हम कहाँ से शुरु करें?क्या करें?किस तरह करें?किसे आधार बनाकर करें या किसके लिए करें?अब तक जो करते आये हैं उसका क्या अर्थ है?कहीं कोई उसका औचित्य है भी या नहीं?अभी हम परमात्मा की गोद में हैं तो सार प्रश्न है कि पहले कहाँ थे?तब भी धरती पर ही थे और अब भी हमारे पांव धरती पर ही हैं।यही फूल-पौधे,यही भौंरे और यही लोग-बाग तब भी थे,अब भी हैं।कौन सा मूल सिद्धान्त काम करता है कि देखते-देखते हमारे भीतर और बाहर सबकुछ बदलने लगता है?हम बच्चा से युवा,जवान और वृद्ध होते जाते हैं।बचपना छूट जाता है और सयानापन,समझदारी आने लगती है।ऐसा भी होता है कि जिस चीज को जोर से पकड़ना चाहते हैं,वह पकड़ में नहीं आता और हमारी समस्या बन जाता है।जो पकड़ में आता है,वह छोड़ने से भी नहीं छूटता।

हमारा जन्म,हमारा वातावरण,हमारे माता-पिता,हमारी संस्कृति किसी का भी चुनाव हम नहीं करते।सबकुछ हमें मिलता है।हमें उसी में सीखना और जीना होता है।हम भाग नहीं सकते।तब भी नहीं जब हम दुख अनुभव करते हैं और उससे छुटकारा चाहते हैं।हमारा तत्कालीन कोई भी ज्ञान काम नहीं आता।समस्या तब और दुरूह हो उठती है जब समाधान के रुप में अनेक मत-मतान्तर,संगठन,संघ,सम्प्रदाय उद्घोष करते हैं।सभी अपनी-अपनी ओर बुलाते हैं।सभी स्वयं को श्रेष्ठ कहते हैं और अपने-अपने मार्ग का बखान करते हैं।सामान्य प्राणी किसे सत्य माने और किसका अनुसरण करे?

दार्शनिक जे.कृष्णामूर्ति कहते हैं-"पहल" यानी बिना किसी प्रोत्साहन के आप स्वयं कोई काम शुरु करते हैं।हो सकता है कि यह कोई बड़ा या असाधारण काम न हो।जब आप स्वयं एक पौधा लगाते हैं,सहज ही किसी के प्रति करुण होते हैं,भारी वजन उठाकर ले जा रहे किसी व्यक्ति को देखकर सहृदयता से मुस्करा देते हैं,रास्ते पर पड़े पत्थर को उठाकर एक ओर रख देते हैं,राह में गुजरते किसी जानवर की पीठ थपथपा देते हैं तो इस "पहल" में ही किसी असाधारण सम्भावना की चिंगारी छिपी रहती है।यह किसी बड़ी पहल की छोटी शुरुआत होती है।इस छोटी सी शुरुआत में ही किसी बड़ी बात का आधार छिपा होता है।भीतर की कोई करूण लय उफान मारती है और सामने बड़ी सार्थक एवं महत्वपूर्ण दुनिया सम्भावनाशील होती दिखती है।ऐसे में ही हम जीवन में सुख और दुख की बारीक दीवार को पहचानने लगते हैं।खलिल जिब्रान कहते हैं-सुख और दुख दोनो साथ ही रहते हैं।बस थोड़ा सा अन्तर होता है।सुख की अवस्था में आप स्वादपूर्ण भोजन कर रहे होते हैं तो दुख वहीं बगल के कमरे में चारपाई पर आपकी प्रतीक्षा कर रहा होता है।हम उस दुख से लड़ने लगते हैं।हमारी उर्जा इस सांसारिक लड़ाई में खर्च होती रहती है और अन्त में हमारे हाथ कुछ भी नहीं आता।हम हाथ मलते रह जाते हैं।संत-महात्मा कहते हैं कि परमात्मा हमें देखता रहता है।क्या वह हमारा क्षय देखता है?हमें पतित होते हुए और गिरते हुए देखता है?हमारी दुर्दशा देखकर,हमारा पतन देखकर क्या वह दुखी होता है?उसका आनन्द-भेद तब क्या सोया रहता है?सद-चित्त स्वरुप हमारी आत्मा पतित कैसे होने लगती है?

योगानन्द जी ने जीवन के सार तत्व को रहस्यमय माना है।यह रहस्य उसके उद्देश्य में भी है।वे कहते हैं-यह कठिन अवश्य है परन्तु ऐसा भी नहीं कि उसे जाना ही न जा सके।भगवान बुद्ध ने भी संसार को दुखमय कहा है।आश्चर्य है कि परमात्मा के इस अतुलनीय सृजन को लोगों ने पहचाना नहीं।क्या सचमुच यह संसार दुखमय है?दुखमय तो हमारा चिंतन है,हमारा कर्म है।दरअसल सभी ने संसार के केवल एक पहलू को देखा और समझा है।इसका दूसरा पक्ष अछूता ही रहता है और हम निर्णय देने लगते हैं।ऐसे में ही कबीर साहब की उल्टी बाणी का रहस्य समझ में आता है।इसी तरह से अनगिनत सन्तो ने समझा कि हम कौन हैं?यह संसार क्या है?हमें कहाँ होना चाहिए और कहाँ पड़े हुए हैं?

परमात्म-सम्बन्ध ही यथार्थ है।शेष सारे सम्बन्ध लेन-देन के हैं।इस रहस्य को जिसने समझ लिया वह ज्ञानी हो गया,सुखी हो गया।कबीर चिल्ला-चिल्ला कर जगाते हैं।हम जागना ही नहीं चाहते।हम गहरी नींद में हैं।यही हमारा लेन-देन हमारे जन्मों का कारण है।ऋण चुकाने और वसूली करने के लिए ही जीवात्मा चौरासी लाख योनियों में भटकती फिरती है।हम जिन्हें अपना समझते हैं,जिनके साथ प्रत्यक्ष के सम्बन्ध बने हैं,प्यार,सहानुभूति,करुणा,दया,क्षमा की उम्मीद करते हैं,वह तो अपना लेनदारी वसूलने आया है।जिस क्षण उसकी पूर्ण वसूली हो जाती है,वह रुकता नहीं,हमारे जीवन से चला जाता है।हम मोहबस रोते हैं,तड़पते हैं और उसे याद करते हैं।यह प्रतीति ही हमारे दुखों का कारण है।हमें रोना नहीं चाहिए वल्कि खुश होना चाहिए कि हमें ऋण से मुक्ति मिली है।

हम नियति के हाथों खिलौना बने हुए हैं।सन्तों की बातों को कहाँ समझ पाते हैं?कबीर की वाणी भी दुख से निवृत्ति का मार्ग नहीं सुझा पाती।प्रकृति हम पर हावी रहती है और हम पीड़ा सहते रहते हैं।आत्मीय से आत्मीय सम्बन्ध भी इससे परे नहीं है।कबीर हमें मुक्त करना चाहते हैं,ठगिनी माया से बचाना चाहते हैं।

हमने अपार उन्नति की है फिर भी महामारी,बाढ़,तूफान,बीमारी,मृत्यु जैसी विभीषिका हमें त्रस्त किये रहते हैं।उनके सामने हम हार जाते हैं।हमे दूसरा पक्ष दिखाई नहीं देता।सामने वाला हिस्सा हमारे लिए कुरुप एवं भयावह होता है और हम अपनी सम्पूर्ण उर्जा के बावजूद पार की दृष्टि नहीं जगा पाते।तत्क्षण दूसरे हिस्से को देख पाने की हिम्मत नहीं बचती।हम इसी में निमग्न हो जाते हैं।हमारे सारे तन्त्र और औजार इसी उहापोह में लगे रह जाते हैं।

हमें इससे उबरना चाहिए।थोड़ी हिम्मत से सम्पूर्ण रहस्य खुल जायेगा।अक्सर लोग मुहाने से निराश हो लौट पड़ते हैं क्योंकि हमारी अन्तर्दृष्टि सोयी रहती है।बहिर्दृष्टि से संसार दिखता है और अन्तर्दृष्टि से रहस्य खुलता है।कबीर साहब कहते हैं-"ज्यों की त्यों धरि दिन्हीं चदरिया।"यह साहसिक कदम है और सम्पूर्ण त्याग की माँग करता है।ऐसा कबीर साहब ही कह सकते हैं।यह कबीर साहब ही कर सकते हैं।हमें अपनी चादर का ध्यान रखना होगा।यह मैली करने के लिए नहीं मिली हैi इसे साफ रखना है अन्यथा परमात्मा हमें छोड़ने वाला नहीं है।इस रहस्य को सन्तों ने खूब पहचाना है।अपने-अपने अनुभवों के आधार पर सभी ने इसका गुणगान किया है।सभी सुखी हैं।दुखी केवल हम हैं।यह संसार दुखी है।कबीर साहब ने कहा है-दुखिया सब संसार है,सुखिया दास कबीर।

पहल तो हमें ही करनी होगी।पहचान भी हमें ही करनी है।ब्रह्म-विज्ञान के ज्ञान के आलोक में सम्पूर्ण ज्ञान-विज्ञान स्वतः प्रगट होते हैं।इसे ऋषियों ने जाना और हमें बताया है।इसकी धार सतत प्रवाहित होती रही।कबीर के माध्यम से,अनेक सन्त-महात्माओ के माध्यम से भिन्न-भिन्न रुपो मे प्रगट होती रही है।प्राचीन ऋषियों के साथ-साथ आधुनिक काल में भी महर्षि रमण,महर्षि अरविन्द,शंकराचार्य,चैतन्य महाप्रभु,सदाफल देव जी,चतुर्भुज सहाय,श्रीराम शर्मा आचार्य,जे.कृष्णमूर्ति जैसे उस धार को धारण करने वालों ने हमें अनुभव करवाया।हम इसमें ना भी उलझें कि पहले अण्डा आया या पहले मूर्गी आयी तो भी यह प्रश्न उठता ही है कि साधक को गुरु पकड़ता है या गुरु साधक की खोज करता है।प्रचलित मान्यता है कि गुरु पोषण

करके साधक को उपर उठाता है।साधक में लम्बी प्रतीक्षा का धैर्य होना चाहिए।हमने पत्थर को भगवान बनाया है,पूजा है और अपनी आस्था के बल पर सारी सिद्धियाँ प्राप्त की हैं।हमें सुख मिला है और आनन्द भी।किसी को संशय नहीं रखना चाहिए।परमात्मा ही गुरु-तत्व का स्वरुप धारण करके जीवों का कल्याण करता है।यदि प्यास है तो पानी भी है,भूख है तो भोज्य-पदार्थ भी हैं।उसी तरह आनन्द की चाह है तो आनन्द का स्रोत भी है।हम में उस महत सुख और आनन्द की तीव्र चाह होनी चाहिए।तभी परमात्मा का द्वार खुलता है और गुरु-तत्व तत्क्षण उपस्थित होकर जीवात्मा को उस घाट पहुँचा देता है।प्रश्न तब भी बना रहता है कि साधक क्या करे-गुरु की प्रतीक्षा करे या उस महत आनन्द के लिए पुकारे?

हम किसी आत्मीय-जन की मृत्यु पर रोते हैं जबकि हजारों अपरिचित लोगों की मौत पर ध्यान भी नहीं दे पाते।ऐसे में कौन सी सूत्र-रचना काम कर रही होती है?किसी की वाणी प्रीतिकर लगती है,अपनी ओर खींचती है जबकि अधिसंख्य हमारे भीतर उल्टी स्थिति का भाव जगाते हैं।क्या हमारा भीतरी इसके लिए जिम्मेदार है या वह वातावरण जिसमें हम जीते और सांस लेते हैं?अन्त में ऐसा क्यों लगता है कि आज तक वैसा कुछ भी नहीं हुआ जिसे हमने चाहा या हमने किया?यहाँ सबकुछ बिना हमारी पहल के ही हो रहा है। कुछ है जो अज्ञात है और वही सबकुछ चला रहा है।हमारा उस पर कोई नियन्त्रण नहीं है वल्कि हमें ही उसका नियन्त्रण मानना पड़ता है।हमें तो उसका ज्ञान भी नहीं होता।कोई गुरु,कोई वेत्ता करुणा करके उसका ज्ञान करवा देता है।

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