कर्म प्रधान :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

05 अप्रैल 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (28 बार पढ़ा जा चुका है)

कर्म प्रधान :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*ईश्वर द्वारा बनाई हुई सृष्टि कर्म पर ही आधारित है | जो जैसा कर्म करता है उसको वैसा ही फल प्राप्त होता है | यह समझने की आवश्यकता है कि मनुष्य के द्वारा किया गया कर्म ही प्रारब्ध बनता है | जिस प्रकार किसान जो बीज खेत में बोता है उसे फसल के रूप में वहीं बाद में काटना पड़ता है | कोई भी मनुष्य अपने किए हुए कर्मों से एवं उससे मिलने वाले प्रतिफल से स्वयं को बचा नहीं सकता है | मनुष्य को कोई भी कर्म करने के पहले यह विचार अवश्य कर लेना चाहिए कि इसका फल क्या मिलेगा ? क्योंकि इतिहास गवाह है कि जिन्होंने जैसे कर्म किए हैं देर सवेर उसको उसका फल भुगतना ही पड़ा है | ईश्वर ने इस सृष्टि को कर्म प्रधान बनाया है ।इसलिये प्रत्येक मनुष्य को प्रतिदिन अपने किये हुये कर्मों पर विचार करके अपनी उन्नति का उपाय करना चाहिये | यहाँ कोई किसी के सुख - दुख के लिए उत्तरदायी नहीं होता है | हमारे धर्मशास्त्रों में लिखा :--- "स्वयं कर्म करोत्यात्मा स्वयं तत्फलमश्नुते ! स्वयं भ्रमति संसारे स्वयंतस्माद्विमुच्यते !!" अर्थात :- मनुष्य स्वयं कर्म करता है और स्वयं ही उसका फल भोगता है | वह स्वयं ही इस संसार सागर में डूबता रहता है तथा स्वयं ही प्रयास करके इससे मुक्त हो जाता है तथा मोक्ष को प्राप्त करता है | यदि मनुष्य अपने कर्मों के फल को भोगने से स्वयं को बचा पाता तो भगवान के अवतार माने जाने वाले मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम अपने पिता महाराज दशरथ की मृत्यु नहीं होने देते | योगेश्वर भगवान श्री कृष्ण अभिमन्यु को बचा लेते | परंतु ऐसा नहीं हुआ क्योंकि प्राणी मात्र को अपने शुभ और अशुभ कर्मों का फल अवश्य भोगना पड़ता है | अच्छे फल की प्राप्ति के लिए प्रत्येक मनुष्य को अच्छे कर्म करने के लिए प्रतिबद्ध होना चाहिए | यदि मनुष्य किसी के साथ कोई ऐसा कर्म करता है जिसे समाज मान्यता नहीं देता है मान लीजिए कल उसके साथ भी वैसा ही कर्म करने वाला कोई प्रकट हो जाएगा |* *आज के आधुनिक युग में मनुष्य कब क्या कर डालेगा इसका अनुमान लगाना भी मुश्किल कार्य है | आज चारों ओर छल , कपट , घात , प्रतिघात एवं विश्वासघात का ही बोलबाला दिखाई पड़ रहा है | परिवार से लेकर के समाज तक देश से लेकर के संपूर्ण विश्व में इन कर्मों का ही प्रसार आज देखने को मिल रहा है | तनिक जायदाद के लिए भाई - भाई के साथ विश्वासघात कर रहा है , पुत्र पिता के साथ छल कर रहा है , गुरुद्वारों में शिष्य अपने गुरु की गद्दी प्राप्त करने के लिए कपट का सहारा लेते हुए अपने ही सद्गुरु से घात कर रहे हैं | कुल मिलाकर जो भी कर्म आज मनुष्य के द्वारा किए जा रहे हैं या जो भी आज ऐसा कर रहे हैं उन सभी से मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" इतना ही कहना चाहूंगा कि आप आज जो बीज खेत में डाल रहे हैं कल उसी की फसल आपको काटना है | आज जो आप अपने भाई के साथ कर रहे हैं , जो अपने पिता के साथ कर रहे हैं या जो अपने गुरु के साथ कर रहे हैं कल वही प्रतिफल आपको मिलेगा | आपके साथ भी कोई वैसा ही कर्म करने वाला इस संसार में प्रकट हो जाएगा | क्योंकि मानस में बाबा जी ने स्पष्ट लिख दिया है :- " कर्म प्रधान विश्व रचि राखा " कोई यदि यह सोचे कि आज जो मैं कर रहा हूं कल बहुत सुखी रहूंगा ऐसा कदापि नहीं हो सकता है | संसार रूपी खेत में कर्म रूपी जैसा बीज मनुष्य के द्वारा डाला जाता है वैसी ही फसल मनुष्य को प्राप्त होती है | यह अकाट्य है इसको कोई काट नहीं सकता |* *मनुष्य को कोई भी कर्म करने के पहले उसके प्रतिफल के विषय में अवश्य विचार कर लेना चाहिए कि हम जो करने जा रहे हैं इसका परिणाम क्या होगा | अन्यथा फिर मनुष्य को पछतावे के अलावा और कुछ नहीं प्राप्त होता |*

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