मंत्रों का प्रभाव :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

05 अप्रैल 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (9 बार पढ़ा जा चुका है)

मंत्रों का प्रभाव :-- आचार्य अर्जुन तिवारी  - शब्द (shabd.in)

*मानव जीवन में यदि मनुष्य अपने कर्मों का शुभाशुभ फल प्राप्त करता है तो वहीं उसके जीवन पर कुण्डली में उपस्थित ग्रहों का भी सीधा प्रभाव देखने को मिलता है | ग्रहों के दुष्प्रभाव से मनुष्य का जीवन इतना अधिक प्रभावित हो जाता है कि मनुष्य राजा भी बन सकता है एवं कुछ ही पलों में राजा भी रंक हो जाता है | कभी - कभी तो ये ग्रह मारक हो करके पूर्ण स्वस्थ मनुष्य को भी मृतशैय्या पर पहुँचा देते हैं | ऐसी स्थिति में मनुष्य समस्त कल , बल , छल एवं उसके पास उपस्थित समस्त संसाधन धरे के धरे रह जाते हैं | मृत्यु संसार का वह सत्य है जिससे आज तक कोई भी नहीं जीत पाया है | परिजन पल पल मृत्यु को व्यक्ति के समीप आता हुआ देखकर भी कुछ नहीं कर पाते हैं | कहा जाता है कि सबसे बली काल होता है परंतु काल से भी बली हैं भगवान महाकाल, जिनका नाम है मृत्युञ्जय , अर्थात मृत्यु पर भी विजय प्राप्त करने वाले | क्षण भर में काल का भी मार्ग परिवर्तित करके ग्रहों को अनुकूल कर देने की क्षमता देवाधिदेव महादेव में ही है | जब संसार के समस्त उपाय , समस्त आशायें क्षीण हो जाती हैं तब महारुद्र , भगवान मृत्युञ्जय की कृपा कटाक्ष से मनुष्य पुनर्जीवन प्राप्त करता है | हमारे धर्मग्रंथों में अनेक ऐसी कथायें देखने को मिलती हैं जहाँ मनुष्य काल के गाल में भी जाकर मृत्युञ्जय भगवान की कृपा से वापस आ गया है | मृकुण्ड के पुत्र मार्कण्डेय जी इसके ज्वलंत उदाहरण हैं | किसी की भी कृपा प्राप्त करने के लिए मनुष्य को शरणागति अपनानी पड़ती है | यदि मनुष्य पूर्ण श्रद्धाभाव से भगवान मृत्युञ्जय की शरण लेता है तो वह एक बार मृत्यु को भी परास्त करके पुन: जीवन प्राप्त करता है | जीवनदायक महामृत्युञ्य मंत्र की ऊर्जा एवं क्षमता को आज के वैज्ञानिक एवं उच्चकोटीय चिकित्सक भी मानने को विवश हैं |* *आज के चकाचौंध भरे युग में जहाँ मनुष्य धर्म , कर्म , पूजा पद्धति से दूर होता चला जा रहा है वहीं उसको अनेक प्रकार की व्याधियाँ प्रतिदिन घातक बनकर काल के गाल में पहुँचा रही हैं | सापे साधन के होने के बाद भी मनुष्य अपने किसी प्रिय को बचा नहीं पाता है | आज जहाँ यंत्र , मंत्र एवं तंत्र को अंधविश्वास व ढकोंसला कहकर टालने का प्रयास किया जाता वहीं इसका प्रभाव भी देखने को मिलता है | आज के वैज्ञानिक युग में जहाँ मनुष्य ने सबकुछ प्राप्त करने का प्रयास किया वहीं मृत्यु से जीतने की कला नहीं सीख पाया है तो उसका एक ही कारण है कि मनुष्य इन जीवनदायक मंत्रों के प्रभाव से अनभिज्ञ है | मैंने "आचार्य अर्जुन तिवारी" ने देश के बड़े - बड़े चिकित्सालयों में कार्यरत अनेक चिकित्सकों के मुखारविन्द से यह कहते हुए भी सुना है कि "मैं तो अपना प्रयास कर रहा हूँ , बाकी भगवान की इच्छा "! आज भी जिन लोगों ने भगवान मृत्युञ्जय की शरण ली है उसका रोगी मृत्यु को भी परास्त करके चिकित्सालय से घर वापस आ जाता है | ऐसी घटनायें महान चिकित्सकों को भी आश्चर्यचकित कर देने वाली होती हैं | जहाँ संसार के लोगों के संसाधन गोड़ हो जाते हैं वहाँ फिर भगवत्सत्ता अपना प्रभाव दिखाती है और संसार के लोगों के समस्त पूर्वानुमान धरे के धरे रह जाते हैं | आज भी इन मंत्रों का सीधा प्रभाव मानव जीवन पर पड़ते हुए देखा जा सकता है | समाज में अनेकों ऐसे उदाहरण देखने को मिलते हैं कि चिकित्सकों के द्वारा रोगी को देखकर एवं ज्योतिषियों के द्वारा रोगी की कुण्डली को देखकर मृत्यु के समय की घोषणा कर देने के बाद भी भगवान मृत्युञ्जय की शरण लेने पर चिकित्सकों एवं ज्योतिषियों की समस्त घोषणायें व्यर्थ हो जाती हैं और मनुष्य स्वस्थ व निरोगी हो जाता है |* *मंत्रों का प्रभाव कम नहीं हुआ है बल्कि कम हो गयी है मनुष्य की श्रद्धा , जिसके कारण आज मनुष्य को अनेक प्रकार की व्याधियाँ घेर रही हैं |*

अगला लेख: प्रायश्चित :--- आचार्य अर्जुन तिवारी



शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
30 मार्च 2019
*सनातन धर्म में तैंतीस करोड़ देवी देवताओं की मान्यता है | इन देवी - देवताओं को शायद ही किसी ने देखा हो , ये कल्पना भी हो सकते हैं | देवता वही है जिसमें कोई दोष न हो , जो सदैव सकारात्मकता के साथ अपने आश्रितों के लिए कल्याणकारी हो | शायद हमारे मनीषियों ने इसीलिए इस धराधाम पर तीन जीवित एवं जागृत देवताओ
30 मार्च 2019
25 मार्च 2019
*सनातन धर्म में मनुष्य के जीवन में संस्कारों का बहुत महत्त्व है | हमारे ऋषियों ने सम्पूर्ण मानव जीवन में सोलह संस्कारों का विधान बताया है | सभी संस्कार अपना विशिष्ट महत्त्व रखते हैं , इन्हीं में से एक है :- यज्ञोपवीत संस्कार ! जिसे "उपनयन" या "जनेऊ संस्कार" भी कहा जाता है | ऐसा माना गया है कि मनुष्य
25 मार्च 2019
25 मार्च 2019
*सम्पूर्ण जीवनकाल में मनुष्य काम , क्रोध , लोभ , मद , मोह , अहंकार आदि से जूझता रहता है | यही मनुष्य के शत्रु कहे गये हैं , इनमें सबसे प्रबल "मोह" को बताते हुए गोस्वामी तुलसीदास जी मानस में लिखते हैं :- "मोह सकल व्याधिन्ह कर मूला" अर्थात सभी रोगों की जड़ है "मोह" | जिस प्रकार मनुष्य को अंधकार में कु
25 मार्च 2019
27 मार्च 2019
*सम्पूर्ण विश्व में भारत ही ऐसा देश है जहाँ से "वसुधैव कुटुम्बकम्" का उद्घोष हुआ | हमारे मनीषियों ने ऐसा उद्घोष यदि किया तो उसके पीछे प्रमुख कारण यह था कि मानव जीवन में कुटुम्ब अर्थात परिवार का महत्त्वपूर्ण व विशिष्ट स्थान है | देवी - देवताओं से लेकर ऋषि - मुनियों तक एवं राजा - महाराजाओं से लेकर असु
27 मार्च 2019
27 मार्च 2019
*परमात्मा द्वारा सृजित यह सृष्टि बड़ी ही विचित्र है | ईश्वर ने चौरासी लाख योनियों की रचना की ! पशु , पक्षी , मनुष्य , जलचर आदि जीवों का सृजन किया | कहने को तो यह सभी एक जैसे हैं परंतु विचित्रता यही है कि एक मनुष्य का चेहरा दूसरे मनुष्य से नहीं मिलता है | असंख्य प्रकार के जीव हैं , एक ही योनि के होन
27 मार्च 2019
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
अंग्रेजी  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x