आज की संतानें :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

05 अप्रैल 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (10 बार पढ़ा जा चुका है)

आज की संतानें :--- आचार्य अर्जुन तिवारी  - शब्द (shabd.in)

*इस संसार में मनुष्य जन्म लेने के बाद विवाहोपरांत मनुष्य की सबसे बड़ी कामना होती है संतान उत्पन्न करना | जब घर में पुत्र का जन्म होता है तो माता-पिता स्वयं को धन्य मानते हैं | हमारे शास्त्रों में भी लिखा है :- "अपुत्रस्तो गतिर्नास्ति" अर्थात जिसके यहां पुत्र नहीं होता उसकी सद्गति नहीं होती | संतान के पालन पोषण में माता पिता जो त्याग करते हैं उसका वर्णन कर पाना असंभव है | पुत्र थोड़ा बड़ा होता है माता पिता के द्वारा सर्वस्व निछावर करने का प्रयास किया जाता है , तो किसी गलती पर उसको डांटना भी माता पिता का कर्तव्य होता है | माता पिता अपने पुत्र को प्रेम करते हैं तो उसके गलत कार्यो पर उसको फटकार भी लगाते हैं , उनके फटकार लगाने का अर्थ मात्र इतना होता है कि अपनी संतान को सचेत कर सकें कि जो कार्य उसके द्वारा किया जा रहा है वह भविष्य के लिए उचित नहीं है | माता पिता की बात को मानकर जो संतान उनके रोके हुए मार्गों पर जाने से स्वयं को रोक लेती है एवं यह मानती है उनको जन्म देने वाले माता पिता यदि हम को इस कार्य के लिए रोक रहे हैं या फटकार लगा रहे हैं तो हमारे लिए उचित ही होगा , तो उसका जीवन सुधर जाता है | माता पिता के बताए मार्ग पर चलते हुए सत्पथ का अनुयायी होता है | और जिस ने यह मान लिया कि मेरे माता-पिता बात - बात पर हमको डांटते हैं इसमें इनकी द्वेषभावना है तो वह पुत्र नकारात्मक स्वभाव वाला हो करके गलत रास्तों को पकड़ लेता है | जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए |* *आज के आधुनिक युग में चाहे वह पुत्र हो चाहे किसी आश्रम का शिष्य हो , यदि माता - पिता , गुरु के द्वारा उसे फटकार लगाई जाती है तो संतान या शिष्य यही सोचता है कि हमको बात बात पर टोंक करके हमारे माता पिता एवं गुरु उचित नहीं कर रहे हैं | उसको इसमें माता पिता की द्वेष भावना दृष्टिगत होने लगती है | और मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" है देख रहा हूं कि आज के युग में बिना किसी कारण के प्राय: संताने घर छोड़ कर शहरों की ओर पलायन कर जाती हैं और शिष्य अपने गुरु के आश्रम को याउनके समीप्य का त्याग करके दूसरों की शरण में चले जाते हैं | इन पुत्रों को एवं शिष्यों को यह विचार करना चाहिए कि जिन्होंने हम को जन्म दे करके अपने पांव पर चलना सिखाया , हमको पढ़ना लिखना सिखाया या इस योग्य बनाया कि हम समाज में स्थापित हो सके वह भला आपसे द्वेषभावना क्यों रखेगा ?? अगर अभिभावक के द्वारा कहे गए किसी वचनों से आत्मिक कष्ट प्राप्त होता है तो उस विषय पर विचार करना चाहिए कि यदि हमें बात बात पर डाँट पड़ रही है तो इसका कारण क्या हो सकता है ?? उन कारणों पर आत्ममंथन करके उसमें सुधार करना चाहिए जिससे कि भविष्य में उस भूल की पुनरावृत्ति न हो ! ना कि पलायन कर देना चाहिए | परंतु आज प्राय: यही देखा जा रहा है | परिवार एवं आश्रम टूटने का यह एक महत्वपूर्ण कारण है जो कि आने वाले भविष्य के लिए विचारणीय एवं चिंतनीय दोनों कहा जा सकता है |* *माता पिता एवं गुरु सदैव अपने पुत्र एवं शिष्य को सत्मार्ग पर लगाना चाहते हैं , उसे समाज में स्थापित करना चाहते हैं | अतः उनके प्रति ऐसा विचार भूलकर भी नहीं लाना चाहिए |*

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