ज्ञान :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

05 अप्रैल 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (37 बार पढ़ा जा चुका है)

ज्ञान :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*चौरासी लाख योनियों में भटकने के बाद जीव को देव दुर्लभ मानव शरीर प्राप्त होता है | इस शरीर को पाकर के मनुष्य की प्रथम प्राथमिकता होती है स्वयं को एवं अपने समाज को जानने की , उसके लिए मनुष्य को आवश्यकता होती है ज्ञान की | बिना ज्ञान प्राप्त किये मनुष्य का जीवन व्यर्थ है | ज्ञान प्राप्त कर लेना महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि महत्वपूर्ण है अर्जित ज्ञान का सार्थक एवं सकारात्मक प्रयोग करना | हमारे ऋषियों महर्षियों एवं महापुरुषों ने अपने अर्जित ज्ञान को लोक कल्याण में लगाया एवं मानव मात्र को जीवन जीने की कला सिखाई | उन्होंने ज्ञान के माध्यम से स्वयं का कल्याण तो किया ही साथ ही समस्त मानव जाति के कल्याण हेतु दिशा निर्देश दिया है | विचार कीजिए हमारे देश भारत में अनेकों ग्रंथ विद्यमान हैं जो कि मानव जीवन के लिए उपयोगी सिद्ध हुए हैं यदि उनके लेखकों के द्वारा अपने ज्ञान का सकारात्मक प्रयोग न किया गया होता तो क्या हम जीवन , देश या समाज के विषय में कुछ जान सकते थे ? शायद ऐसा संभव नहीं था | किसी भी विषय में मनुष्य ज्ञान प्राप्त करके यदि उसका सार्थक एवं सकारात्मक प्रयोग नहीं करता है तो उसका ज्ञान नकारात्मकता की ओर अग्रसर हो करके मानव मात्र के लिए अकल्याणकारी सिद्ध होता है | अतः प्रत्येक मनुष्य को अपने अर्जित ज्ञान का सदैव सार्थक एवं सकारात्मक प्रयोग करने का प्रयास करते रहना चाहिए , जिससे कि उसके ज्ञान प्रकाश से देश एवं समाज प्रकाशमान हो |* *आज हमारे देश में ज्ञानियों की कोई कमी नहीं परंतु सोशल मीडिया के इस युग में ज्ञान का कितना सकारात्मक प्रयोग हो रहा है यह भी देखने को मिला है | सोशल मीडिया का आविष्कार भी किसी के ज्ञान का स्रोत ही है , परंतु आज इसका जितना सार्थक एवं सकारात्मक प्रयोग हो रहा उससे ज्यादा नकारात्मक प्रयोग भी देखने को मिल रहा है | जिसके माध्यम से लोग अपने विचारों को जन-जन तक पहुंचा रहे हैं वहीं मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" यह भी देख रहा हूं कि सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों के संबंध भी बिगड़ रहे हैं | स्वयं को ज्ञानी सिद्ध करने के प्रयास में अपने ज्ञान का सदुपयोग ना करते हुए लोग बात बात पर वाद - विवाद करते हुए दिखाई पड़ रहे हैं , जिसका जिसका परिणाम लोगों के आपसी संबंधों में कटुता के रूप में देखा जा सकता है | यदि यह कहा जाय कि आज ज्ञान का नकारात्मक प्रयोग अधिक हो रहा है तो अतिशयोक्ति ना होगी | जबकि यदि संभव हो सके तो मनुष्य को अपनी ऊर्जा लोक कल्याणक कार्यों में लगानी चाहिए अन्यथा मनुष्य का ज्ञान ज्ञान नहीं कहा जा सकता है | ऐसे ज्ञान प्राप्त करने से क्या लाभ जो अपने परिजनों , मित्रों एवं गुरुजनों से दूरियां बढ़ा दे | दुर्भाग्य यह है कि आज यही हो रहा है | कुछ ज्ञान प्राप्त कर लेने के बाद मनुष्य दूसरों की प्रत्येक बातों में नकारात्मकता ढूंढने लगता है संबंधों में कटुता आने का यही सबसे बड़ा कारण है जो कि नहीं होना चाहिए |* *यह जीवन प्राप्त करके यदि कुछ ज्ञान प्राप्त हो गया है तो उस ज्ञान के माध्यम से संबंधों में निकटता आनी चाहिए | जो ज्ञान लोगों में दूरियां बढ़ा दे उसे ज्ञान ना कह कर के अज्ञानता ही कहा जाएगा |*

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