मि. ख़ का शहर

09 अप्रैल 2019   |  विजय कुमार तिवारी   (16 बार पढ़ा जा चुका है)

कहानी

मि० का शहर

विजय कुमार तिवारी

मि०ख के शहर में हमलोग पहुँच गये हैं।समुद्र के किनारे बसा हुआ यह सुन्दर शहर बहुत प्राचीन नहीं है।ख का कहना है कि उसके ही दादा-परदादा ने इसे आबाद किया है।मान लेने में मुझे कोई आपत्ति नहीं है।कोई ना कोई तो होता ही है आरम्भ करने वाला।अब जबकि हमलोग घूम रहे हैं यहाँ, तो लगता है कि ऐसी कल्पना नहीं रही होगी के दादा-परदादा के मन में।यह भी हो सकता है कि के पिता या चाचा ने नहीं माना होगा उनका कहना,तभी शहर के बसने में बेतरतीबी गयी है।लोग-बाग बेढंगे तौर से इधर-उधर फैल गये हैं।

मुम्बई से सीधे हमलोग पहुँचे हैं।अरे,यह तो बताना भूल ही गया कि हम इस छोटे से शहर में क्यों जाना चाहते हैं।दरअसल महीनों से हम भ्रमण में हैं और अपने देश को घूम-घूमकर देखना चाहते हैं।साथ में विभागाध्यक्ष और आंटी भी हैं।मि०ख का शहर उनकी ससुराल है।मुम्बई आकर ससुराल जांय,यह हो नहीं सकता।आंटी का खास आग्रह है कि के शहर यानी उनके मायका चलना ही होगा।हमें भला क्या दिक्कत,हम तो तैयार हैं।

आंटी कुछ अधिक ही खूबसूरत हैं और इसका भान भी है उनको।साथ-साथ घूमते हुए मैं जरा अधिक ही विश्वासपात्र हो गया हूँ।ऐसे में मुम्बई में मुझे अकेले छोड़कर जाने की उनकी कत्तई ईच्छा नहीं है।मुझे थोड़ी परेशानी है।यदि ले चलना है तो सभी को ले चलिए।यह स्वार्थपूर्ण कार्य मुझसे नहीं होगा।विभागाध्यक्ष के नेतृत्व में, भ्रमण पर निकले हुए स्नात्कोत्तर के हम छात्र जिस जगह ठहरे हैं वह हमारे सहपाठी के भाई का घर है और यहाँ आकर ही हम समझ पाये हैं कि मुम्बई की चाल का जीवन क्या होता है।जगह जैसी भी हो,उनका आदर और सेवा-भाव मुझे अभिभूत किया है।

भोर में ही आंटी और साहब चले गये।हम मुक्त और स्वतन्त्र हैं।जवां दिल,स्वतन्त्र और मुम्बई जैसी खूबसूरत जगह।खूब घुमाई हो रही है।मजा ही मजा है।खूब दृश्य देखे जा रहे हैं।शाम में थककर चूर हुए लौटे तो मुझे साहब का पत्र मिला।वे अपने साले साहब के साथ उनकी गाड़ी में आये थे और बहुत प्रतीक्षा करके वापस गये हैं।मुझे पत्र में निर्देश है कि सभी को साथ लेकर पहुँचूँ।

ट्रेन की गति बहुत तेज है और रात के ठीक बारह बजे हमलोग के शहर में उतरे।ख का यह शहर अजनबी नहीं लगता।ऐसा क्यों है?इसके पहले ऐसी अनुभूति नहीं हुई है।ख के शहर के,इस छोटे से स्टेशन पर,रात के बारह बजे हमें जानने-पहचानने वाला कोई नहीं है।कैसे मालूम करें के घर का पता?रात में कोई गलत ही बता दे।जिस युवा लड़के से हम पूछते हैं,वह मुस्करा देता है और मेरा नाम बताता है।किंचित संशय होता है।हमें लिवा लाने के लिए ने उसे भेजा है।हम चल पड़े।मुख्य घुमावदार मार्ग से जाकर वह हमें खेतों के मेड़ वाले रास्ते से ले जा रहा है।

आश्चर्य होता है और खुशी भी।पूरा परिवार जगा हुआ है।हमारी प्रतीक्षा की जा रही है। इस भागमभाग वाली दुनिया में यह बहुत अच्छा लगा।कई जवान आँखें मेरी तरफ मुड़ती हैं,मुस्कराती हैं जैसे निमन्त्रित कर रही हो।

"मैं तो आपसे कहानी सुनूँगीं,परियों वाली,"लगभग 10 वर्षीया, की छोटी बहन मेरे पास आकर खड़ी हो गयी।

"मैं भी,"उसके छोटे भाई ने कहा।

"हम लोग कवितायें सुनेंगे,"एक समवेत स्वर उभरा।

"मुझे क्या सुनायेंगे आप?"खूबसूरत आँखों वाली लड़की ने पूछा।मैने उसकी ओर देखा। स्मित मुस्कान उभरी उसके चेहरे पर।सुन्दर है वह,जवान और मिलनसार भी।

"हटो तुम सब,' एक अधेड़ सी महिला ने सबको डांटा," खिलाना, पिलाना,बस।"

"साॅरी ममा,"खूबसूरत आँखों वाली लड़की उठ खड़ी हुई।

रात का लगभग एक बज रहा है।हम मुम्बई से खाकर ही निकले थे।भला खाने की ईच्छा हो भी तो कैसे?हमने ना कर दिया।हम में से किसी ने पानी पीने की बात की।खूबसूरत आँखों वाली लड़की ने जग उठाया और गिलास में पानी डालने लगी।मैंने गौर किया,किसी की आँखों में नींद नहीं है।मैने पूछा,इसकी बावत।खूबसूरत आँखों वाली लड़की ने कहा,"बुआ ने हमें सब बता दिया है।जब से आयीं हैं,उनकी कोई ऐसी बात नहीं है जिसमें आपकी चर्चा हो।मतलब झगड़ा हुआ तो आपने सुलझाया,समस्या आयी तो आपने दूर की,लड़के उदास हुए तो आपने हँसाया,हर शहर में रहने की व्यवस्था आपने की,सबके खाने की चिन्ता आपको थी,आपने कवितायें सुनाईं और आपने सबको प्यार किया।आपकी कारगुजारियों को सुनाकर बुआ लोट-पोट जाती हैं।"

मैंने गौर किया,सभी उत्सुक हैं।खूबसूरत आँखों वाली लड़की को देखते हुए मैंने हथियार डाल दिया,"तब तो मुक्ति नहीं है।"

"बिल्कुल नहीं," खूबसूरत आँखों वाली लड़की की पुतलियाँ चमक उठीं।

मैंने उत्साहित होकर मुस्कराते हुए पूछा,"तो ठीक है,आदेश हो,पहले कौन सा कार्यक्रम प्रस्तुत करूँ।"

खूबसूरत आँखों वाली लड़की कुछ सोचते हुए तय करती है,"आज की रात केवल कवितायें,क्यों भाभी?"उसने अपनी भाभी की ओर देखा।

"हाँ,"उसकी भाभी के चेहरे पर जैसे मस्ती भरी मुस्कान तैर गयी।

खूबसूरत आँखों वाली लड़की ने धीरे से मुझसे कहा,"भाभी को कविता का शौक है।"उसने जोर से कहा,"मुन्नी और मुन्ना अपनी फरमाईश कल करेंगे।"

रात के दो बजे काव्य-पाठ शुरु हुआ।खूब तालियाँ बजीं।वाह-वाह का खूब शोर मचा।लड़की की आँखों में तेज होती जाती चमक से मेरा उत्साह बढ़ता गया।

हमारे सोने की व्यवस्था हो चुकी थी।हम उपर वाले हाल में गये।लड़की और उसकी भाभी भी हमारे साथ थीं।भाभी ने भी अपनी डायरी से कुछ कवितायें सुनाई।खूबसूरत आँखों वाली लड़की हँसने लगी।साथ के लड़को को नींद रही थी।लड़की मुझसे कुछ पूछना चाह रही थी।हम छत की ओर निकल आये।चाँदनी रात में जैसे सबकुछ स्नेहिल,स्निग्ध और शान्त है।

"बुआ ने एक बात कही है,"उसने कहा,"शायद वाराणसी की घटना है।क्या वह बहुत खूबसूरत थी?आपने उसे बदमाश लडकों से कैसे बचाया?क्यों बचाया? फिर चेन्नई तक उसे पूरा संरक्षण दिया।चेन्नई में आप उसके घर भी गये।दिनभर मैरिना बीच,स्नैक गार्डेन,मार्केट,विश्वविद्यालय जाने कहाँ-कहाँ भटके थे साथ-साथ।स्टेशन तक छोड़ने भी आयी थी वह।बुआ बता रही थी,वह बहुत खोयी-खोयी सी थी।क्या आपको उसकी याद नहीं आती?""कमाल है,"उसने शरारत से कहा।

"क्या उत्तर दूँ? मुझे लगता है कि वह एक हादसा था।वह खतरे में थी।मैंने अपना फर्ज निभाया।उसके भाव क्या थे,यह वही जाने।"मैंने सच्चाई कहा।खूबसूरत आँखों वाली लड़की मुस्करा रही थी मानो उसे विश्वास ही नहीं था।

प्रातः लड़की हमसे पहले जागी और उसकी भाभी भी।हमारे लिए नाश्ता भी भाभी ने बनाया।घूमने जाते समय हम सभी दो गाड़ियों में सवार हुए।खूबसूरत आँखों वाली लड़की के आग्रह पर भाभी ने मुझे अपने साथ बैठने को कहा।शायद बुआ से उन लोगों ने पहले ही बातें कर ली थी।जिस फ्लोर पर हम सोये थे,उस पर भाभी का शयनकक्ष था।चाय देते हुए भाभी ने पूछा,"कैमरे में शायद रील डलवाना है,बुआ जी बोल रही थीं।"

"हाँ,बाजार से हो आता हूँ,"मैंने कहा।

हमारे साथ आंटी,भाभी,लड़की की ममा भी गयीं।हमारा भोजन दोपहर में एक साथ उनके अतिथिगृह में होने वाला था।हम सभी समुद्र के किनारे, नारियल के पेड़ो के बीच बने अतिथिगृह में पहुँच गये।मि0 का शहर सुन्दर है।लोग मिलनसार हैं।लड़की में समाज-सेवा की भावना है।उसने अनेकों बार रक्त-दान किया है।आदिवासी बच्चों को पढ़ाने का काम उसकी देख-रेख में चलता है।वह स्वयं एक अच्छी खिलाड़ी भी है।मुझे उसकी खूबसूरती के पीछे उसकी कर्मठता,उसका धैर्य और त्याग ने ज्यादा प्रभावित किया।उसके प्रश्नों से लगा,उसमें गहन चिन्तन-दृष्टि है।

समुद्र के किनारे नारियल के बाग में बैठकर हम उसके स्कूल एवम् बच्चों को देख रहे थे।दूर-दूर तक फैला नीला समुद्र अपनी ऊँची-ऊँची लहरों से अद्भूत आकर्षण पैदा कर रहा है।पाल ताने नौकायें लहरों पर मानो खेल रही हैं।

भोजनोपरान्त हम आराम की मुद्रा में हैं।महिलायें कमरो में हैं और पुरुष बाहरी लान में।खूबसूरत आँखों वाली लड़की मेरे पास गयी।उसने अनेक प्रश्न कर डाले। उत्तर देना कभी-कभी कठिन लगता है।मुन्ना और मुन्नी कहानियों के लिए कहते हैं।सुनाता हूँ,छोटी-छोटी कहानियाँ,अपनी यात्रा के अनेक सुखद संस्मरण।खूबसूरत आँखों वाली लड़की खूब ध्यान से सुन रही है।कहानी के पीछे की कहानी को समझने का प्रयास कर रही है।कभी खुश होती है तो कभी नाखुश।कई बार मुझे टोकती है और सलाह देती है कि मुझे ऐसा करना चाहिए था या ऐसा नहीं करना चाहिए था।मेरे मन में भी ढेर सारे प्रश्न कुलबुला रहे हैं।शायद वह समझ रही है और मुस्कराती है।

"मुझे किसी के प्रश्नों का उत्तर देना है।समझ में नहीं आता कि क्या करूँ."उसने बहुत गहरी दृष्टि से मुझे देखा।मुझे हँसी आयी परन्तु स्वयं को रोकते हुए मैंने उसे देखा।शायद उसे शर्म महसूस हुई।उसने पलकें झुका लीं और एक लाली उभर आयी उसके चेहरे पर।

"कैसा उत्तर? किस प्रश्न का? किसने पूछा है?"

"आप समझ रहे हो।किसी के प्यार का उत्तर देना है मुझे।आप मेरी मदद कीजिए।"उसने गम्भीरता से कहा।

झन्न से कुछ टूटा भीतर।मैंने पुनः उसे गौर से देखा और कहा,"उत्तर देने की जरुरत नहीं पड़ती।प्यार में आप ही आदमी प्रश्न होता है और आप ही उसका उत्तर।"

वह शायद नहीं समझी।उसने कहा,"मैंने स्वयं को व्यस्त कर लिया है।"

"तब तो अधूरा रह जायेगा सबकुछ।पहले स्वयं को पूर्ण करना चाहिए।तभी सम्पूर्णता से किया जा सकेगा।प्यार के लिए आत्मबल और आत्मसम्मान भी चाहिए।मुँह मोड़ना आत्म-पलायन है।शायद जीवन भर पछतावा रहेगा।प्यार वलिदान चाहता है। इसमें केवल देना और करना होता है।"

उसकी आँखों में चमक उभरी जो पहले से तेज होती गयी।

दो दिनों बाद हम लौटने लगे मि0 के शहर से।ख के साथ सभी हमें छोड़ने आये हैं।मुन्नी ने मुझे एक पुस्तक दी और भाभी ने एक कलम।सभी बड़े आशीर्वाद दे रहें थे।

"मैं क्या दूँ?"शायद यही सोच रही है खूबसूरत आँखों वाली लड़की।उसकी खूबसूरत आँखें भर आयी हैं।मैं भी भावुक हो उठा हूँ।

"प्यार जाग जाये तो मरने नहीं देना चाहिए।उसके प्रश्न का उत्तर दे देना।"भावुकता के भीतर से मुस्कराते हुए मैंने धीरे से कहा।

गाड़ी चल पड़ी।

उसके चेहरे पर पूर्ण आश्वस्ति के भाव हैं मानो उसने पूर्ण उत्तर खोज लिया है। मि0 का शहर पीछे,बहुत पीछे छूट गया है और रह गयी है स्मृति मे खूबसूरत आँखों वाली लड़की।

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