घोष शब्द वैदिक काल से गोपों का विशेषण या पर्याय रहा है ।

12 अप्रैल 2019   |  Yadav Yogesh kumar -Rohi-   (47 बार पढ़ा जा चुका है)

यद्यपि हम घोष हैं परन्तु घोष शब्द वैदिक काल से गोपों का विशेषण या पर्याय रहा है ।
और यह किसी वंश का सूचक कभी नहीं था ।

क्यों कि हैहय वंशी यादव राजा दमघोष से पहले भी घोष यादवों का गोपालन वृत्ति मूलक विशेषण रहा।

इस विषय में वेद प्रमाण हैं; उसमे भी ऋग्वेद और उसमे भी इसके चतुर्थ और षष्ठम् मण्डल मध्यप्रदेश में "घोष" यद्यपि यादवों का प्राचीनत्तम विशेषण है।

जो गोपालन की प्राचीन वृत्ति ( व्यवसाय) से सम्बद्ध है
पौराणिक काल में यह "घोष " बन गया जबकि वैदिक सन्दर्भों में यह गोष: है ।
घोष: शब्द के जिस रूप को लोगों ने सुना तो उन्होनें
(घुष् ध्वनौ धातु की कल्पना कर डाली )
और अर्थ कर दिया कि --जो  गायें को आवाज देकर बुलाता है।
'वह घोष है।

परन्तु ऋग्वेद में यह गोष: का बहुवचन गोषा तथा गोषन् रूप में गोपालकों का ही वाचक है देखें--नीचे ऋग्वेद के उद्धरण👇
गोष: (गां सनोति सेवयति सन् (षण् ) धातु)
अर्थात्‌ --जो गाय की सेवा करता है ।

गोदातरि “गोषा इन्द्रीनृषामसि” सिद्धान्त कौमुदीय धृता श्रुतिः 👇
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नूनं न इन्द्रापराय च स्या भवा मृळीक उत नो अभिष्टौ ।
इत्था गृणन्तो महिनस्य शर्मन्दिवि ष्याम पार्ये गोषतमाः
ऋग्वेद ६ । ३३ । ५ ।

प्र ते बभ्रू विचक्षण शंसामि गोषणो नपात् ।
माभ्यां गा अनु शिश्रथः ॥२२॥
ऋग्वेद ४ । ३२ । २२ ।👇

सायण भाष्य:-प्र ते॑ ब॒भ्रू वि॑चक्षण॒ शंसा॑मि गोषणो नपात्

माभ्यां॒ गा अनु॑ शिश्रथः ॥२२

प्र । ते॒ । ब॒भ्रू इति॑ । वि॒ऽच॒क्ष॒ण॒ । शंसा॑मि । गो॒ऽस॒नः॒ । न॒पा॒त् ।

मा । आ॒भ्या॒म् । गाः । अनु॑ । शि॒श्र॒थः॒ ॥२२

प्र । ते । बभ्रू इति । विऽचक्षण । शंसामि । गोऽसनः । नपात् ।

मा । आभ्याम् । गाः । अनु । शिश्रथः ॥२२

हे “विचक्षण प्राज्ञेन्द्र “ते त्वदीयौ “बभ्रू बभ्रुवर्णावश्वौ “प्र “शंसामि प्रकर्षेण स्तौमि" ।
हे “गोषनः गवां सनितः हे “नपात् न पातयितः
स्तोतॄनविनाशयितः।
किंतु पालयितरित्यर्थः ।
हे इन्द्र त्वम् “आभ्यां त्वदीयाभ्यामश्वाभ्यां “गा “अनु अस्मदीया गा लक्षीकृत्य “मा “शिश्रथः विनष्टा मा कार्षीः । गावोऽश्वदर्शनात् विश्लिष्यन्ते । तन्मा भूदित्यर्थः ॥

उपर्युक्त ऋचा में गोष: शब्द गोपोंं का वाचक है ।
जो ऋग्वेद के चतुर्थ और षष्टम् मण्डल में वर्णित है।
शब्दों का शारीरिक परिवर्तन भी होता है ।
लौकिक भाषाओं में यह घोष: हो गया।
तब भी इसकी आत्मा (अर्थ) अपरिपर्वतित रहा ।
आज कुछ घोष लोग अपने को यादव भले ही न मानें परन्तु इतिहास कारों ने उन्हें यादवों की ही गोपालक जन-जाति स्वीकार किया है।
वैसे भी दमघोष से पहले भी घोष शब्द हैहय वंशी यादवों का गोपालन वृत्ति मूलक विशेषण रहा है

पुराणों में वर्णित हैहय भारत का एक प्राचीन यादव राजवंश था।
जैसे-
यदु के चार पुत्र थे –
(I) सहस्त्रजित, (II) क्रोष्टा,
(III) नल और (IV) रिपु.
हैहय वंश यदु के ज्येष्ठ पुत्र सहस्त्रजित के पुत्र का नाम शतजित था.
शतजित के तीन पुत्र थे – महाहय, वेणुहय तथा हैहय.
परन्तु कालान्तरण में
ब्राह्मण वाद की रूढ़िवादी परम्पराओं की विकट छायाओं आच्छादित हैं ।
इन्हें कोई पूछे कि ठाकुर उपाधि तुर्को और मुगलों की उतरन( Used clothes) है ।
--जो तुर्की आरमेेनियन और फारसी भाषाओं में जमींदारों या सामन्तों की उपाधि थी ।
संस्कृत भाषा या किसी शास्त्र में तो ठाकुर शब्द है ही नहीं
यह बारहवीं सदी में हिन्दुस्तान की भाषाओं में प्रविष्ट हुआ
जब देश पर तुर्को और मुगलों की शासन था ।
घोष यादवों का गोपालन वृत्ति मूलक विशेषण रहा।
--जो ऋग्वेद के चतुर्थ और षष्टम् मण्डल में गोष: के रूप में है जिसका अर्थ है ।
गां सनोति सेवयति इति गोष: --जो गाय की सेवा करता है 'वह गोप !

अब कुछ हमारे घोष समाज के लोग कहने लगे है कि घोष और घोसी अलग होते हैं ।
परन्तु वे निहायत अशिक्षित माने जाऐंगे
जिन्हें भाषा-विज्ञान  ( linguistic) का ज्ञान नहीं
--जो केवल साक्षर मात्र हैं ।

प्रस्तुति-करण :–यादव योगेश कुमार "रोहि"
क्यों कि घोष शब्द ही प्राकृत भाषाओं में घोसी बन गया है
जबकि घोष भी वैदिक गोष: का लौकिक रूपान्तरण है
जिनका अर्थ गोसेवक अथवा गोप ही होता है.
वृष्णि वंशी यादव उद्धव को 'ब्रजभाषा के कवि सूरदास आदि ने घोष कहा ।
यादवों का एक विशेषण है घोष -👇
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आयो घोष बड़ो व्यापारी  लादि खेप
गुन-ज्ञान जोग की, ब्रज में आन उतारी ||
फाटक दैकर हाटक मांगत,
भोरै निपट सुधारी धुर ही तें खोटो खायो है,
लए फिरत सिर भारी ||

इनके कहे कौन डहकावै ,
ऐसी कौन अजानी ।
अपनों दूध छाँड़ि को पीवै,
खार कूप को पानी ||
ऊधो जाहु सबार यहाँ ते, बेगि गहरु जनि लावौ |
मुंह मांग्यो पैहो सूरज प्रभु, साहुहि आनि दिखावौ ||
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वह गोपियाँ  उद्धव नामक घोष की शुष्क ज्ञान चर्चा को अपने लिए निष्प्रयोज्य बताते हुए उनकी व्यापारिक-सम योजना का विरोध करते हुए कहती हैं ।
घोष शब्द यद्यपि गौश्चर: अथवा गोष: का परवर्ती तद्भव रूप है परन्तु इसे भी संस्कृत में मान्य कर दिया गया ।
और इसकी घुष् धातु से व्युत्पत्ति कर दी गयी ।
--जो पूर्ण रूपेण असंगत व अज्ञानता जनित व्याकरणिक और भाषा विज्ञान के नियम के विरुद्ध ही है ।👇
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घोष: (घोषति शब्दायते इति ।

घोषः, पुंल्लिङ्ग (घोषन्ति शब्दायन्ते गावो यस्मिन् ।
घुषिर् विशब्दने “हलश्च ।” ३ । ३ । १२१। इति घञ् )
आभीरपल्ली (अहीरों का गाँव)
अर्थात् जहाँ गायें रम्हाती या आवाज करती हैं 'वह स्थान घोष है ।
वस्तुत यह काल्पनिक व्युत्पत्ति मात्र है ।
(यथा, रघुःवंश महाकाव्य । १ । ४५ ।
“हैयङ्गवीनमादाय घोषवृद्धानुपस्थितान् ।
नामधेयानि पृच्छन्तौ वन्यानां मार्गशाखिनाम् ”
द्वितीय व्युत्पत्ति गोप अथवा आभीर के रूप में है 👇
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घोषति शब्दायते इति । घुष् कर्त्तरि अच् ।)
गोपालः । (घुष् भावे घञ् ) ध्वनिकारक।

(यथा, मनुः । ७ । २२५ । “तत्र भुक्त्वा पुनः किञ्चित् तूर्य्यघोषैः प्रहर्षितः ।

कायस्थादीनां पद्धतिविशेषः ।
(यथा, कुलदीपिकायाम् “वसुवंशे च मुख्यौ द्वौ नाम्ना लक्षणपूषणौ । घोषेषु च समाख्यातश्चतुर्भुज
महाकृती )
अमरकोशः व्रज में गोप अथवा आभीर घोष कहलाते हैं संज्ञा स्त्री०[संघोष कुमारी] गोपबालिका ।
गोपिका ।
बंगाल में कायस्थों का एक समुदाय घोष कहलाता है ।
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'ब्रजभाषा के कवियों ने घोष या अहीर यादवों को ही कहा है ।👇
उदाहरण —प्रात समै हरि को जस गावत
उठि घर घर सब घोषकुमारी ।
(भारतेंदु ग्रन्थावली भा० २, पृ० ६०६ )
संज्ञा पुंल्लिङ्ग [संज्ञा] [ आभीर] १. अहीर । ग्वाल 

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रसखान ने  अहीरों को अपने -ग्रन्थों में कृष्ण के वंश के रूप में वर्णित करते हैं । 👇
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या लकुटी अरु कामरिया पर,
      राज तिहूँ पुर को तजि डारौं।

  आठहुँ सिद्धि, नवों निधि को सुख,
           नन्द की धेनु चराय बिसारौं॥

रसखान कबौं इन आँखिन सों,
            ब्रज के बन बाग तड़ाग निहारौं।

कोटिक हू कलधौत के धाम,
                करील के कुंजन ऊपर वारौं॥
सेस गनेस महेस दिनेस,
                   सुरेसहु जाहि निरंतर गावै।
जाहि अनादि अनंत अखण्ड,
                              अछेद अभेद सुबेद बतावैं॥
नारद से सुक व्यास रहे,
                          पचिहारे तऊ पुनि पार न पावैं।
ताहि अहीर की छोहरियाँ,
                           छछिया भरि छाछ पै नाच नचावैं॥

हरिवंश पुराण में यादवों अथवा गोपों के लिए घोष (घोषी) शब्द का बहुतायत से प्रयोग है ।
नीचे देखें---👇
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ताश्च गाव: स घोषस्तु स च सकर्षणो युवा।
कृष्णेन विहितं वासं तमध्याससत निर्वृता ।३५।

अर्थात् उस वृदावन में सभी गौएें गोप (घोष) तथा संकर्षण आदि सब कृष्ण साथ आनन्द पूर्वक निवास करने लगे ।३५।
(उद्धृत अंश)👇
हरिवंश पुराण श्रीकृष्ण का वृन्दावन गमन नामक ४१वाँ अध्याय।
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ऋग्वेद भारतीय संस्कृति में ही नहीं अपितु विश्व- संस्कृतियों में प्राचीनत्तम है ।
हरिवंश पुराण यादवों का गोप (अहीर) अथवा आभीर
रूप में ही वर्णन करता है ।
यदुवंशीयों का गोप अथवा आभीर विशेषण ही वास्तविक है ;
क्योंकि गोपालन ही इनकी शाश्वत् वृत्ति (कार्य) वंश परम्परागत रूप से विख्यात है ।।
हरिवंश पुराण में आभीर और गोप शब्द परस्पर पर्याय
वाची हैं ।
और घोष भी गोपों का प्राचीन विशेषण है ।👇

द्रोण नन्दो८भवद् भूमौ, यशोदा साधरा स्मृता ।
कृष्ण ब्रह्म वच: कर्तु, प्राप्त घोषं पितु: पुरात् ।
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वसुदेवदेवक्यौ च कश्यपादिती।
तौच वरुणस्य गोहरणात् ब्रह्मणः शापेन गोपालत्वमापतुः। यथाह
(हरिवंश पुराण :- ५६ अध्याय )

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सम्पर्क सूत्र:–8077160219
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यादव योगेश कुमार "रोहि"

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