मुक्तक

14 अप्रैल 2019   |  अलोक सिन्हा   (28 बार पढ़ा जा चुका है)

जाने कैसा घुटन भरा अँधेरा है ,

सकल कारवां विपदाओं ने घेरा है |

पथ दर्शक सब दरबारी चारण हुये ,

किससे पूछें कितनी दूर सवेरा है |


2

मैंने उगता छिपता सूरज देखा है ,

क्षितिज नहीं कुछ भी बस भ्रम की रेखा है |

तुम शासन के प्रगति आंकड़े मत बांचो ,

भोग रहे जो बस वो असली लेखा है |

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