आवश्यकता आविष्कार की जननी है :- आचार्य अर्जुन तिवारी

16 अप्रैल 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (67 बार पढ़ा जा चुका है)

आवश्यकता आविष्कार की जननी है :- आचार्य अर्जुन तिवारी

*मनुष्य की इच्छायें एवं आवश्यकतायें अनन्त हैं | जब से मनुष्य इस धराधाम पर आया तब से ही यह दोनों चीजें विद्यमान हैं | एक सुंदर एवं व्यवस्थित जीवन जीने के लिए मनुष्य को नित्य नये आविष्कार करने पड़े , जहाँ जैसी आवश्यकता मनुष्य को प्रतीत हुई वहाँ वैसे आविष्कार मनुष्य करता चला गया | अपने इन्हीं आविष्कारों के माध्यम से मनुष्य ने समाज में सब कुछ प्राप्त कर लेने के प्रयास में सफल भी हुआ | इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए किसी की कही हुई लोकोक्ति याद आ जाती है कि :- "आवश्यकता आविष्कार की जननी है" | यह सत्य है कि आवश्यकता आविष्कार की जननी है परन्तु इस संसार में जैसे प्रत्येक कार्य के नकारात्मक एवं सकारात्मक दो विभाग होते हैं उसी प्रकार आवश्यकतायें भी नकारात्मक एवं सकारात्मक होती हैं | मानव जीवन जीने के लिए कुछ आवश्यक आवश्यकतायें होती हैं तो कुछ अनर्गल आवश्यकतायें मनुष्य को जीवन भर शांति से नहीं बैठने देतीं | लंकाधिराज रावण को ईश्वर ने सबकुछ प्रदान किया था परंतु और अधिक पाने की इच्छा ही उसकी आवश्यकता बनती चली गयी परिणाम सभी जानते हैं | श्री राम के राज्याभिषेक की सारी तैयारियाँ हो चुकी थीं यदि श्रीराम चाहते तो कोई उनको अयोध्या से बाहर नहीं कर सकता था परंतु धरती को आतताईयों से बचाने के लिए उनका वन जाना ज्यादा आवश्यक था | कहने का तात्पर्य यह है कि मनुष्य को आवश्यकता उसकी इच्छा के अनुसार ही प्रकट होती है ऐसे समय में प्रत्येक मनुष्य को यह विचार अवश्य करना चाहिए कि अपनी आवश्यकता की पूर्ति के लिए कहीं अनजाने में किसी का अपमान एवं समाज का अहित तो नहीं हो रहा है |* *आज के वैज्ञानिक युग में जहाँ आवश्यकताओं ने देश को सशक्त एवं समृद्धशाली बनाया है वहीं समाज में कुछ ऐसे तत्त्व भी हैं जो अपनी आवश्यकताओं का ढिंढोरा पीटकर अनर्गल कृत्य करते रहते हैं | आज प्राय: यह देखा जा रहा है कि अपनी अनन्त इच्छाओं एवं गृहस्वामी बनने की प्रबल आकांक्षा मों सन्तानें अपने वृद्ध माता पिता को या तो घर से निकाल रहे हैं या फिर स्वयं उनसे अलग होकर अपना नया बसेरा बना रहे हैं | समाज के वयोवृद्ध लोगों के समझाने पर ऐसे लोग यही उत्तर देते हैं कि :- "आवश्यकता आविष्कार की जननी है" | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" यह बात स्वीकार करता हूँ कि आवश्यकता आविष्कार की जननी है परन्तु क्या ऐसी आवश्यकतायें मनुष्य के लिए लाभदायक हैं ?? क्या इसे उचित आवश्यकता कहा जा सकता है ?? अपनी आवश्यकता बताकर अपने परिवार , संगठन या समाज से अलग होकर इसे आवश्यक आवश्यकता बताने वाले विकास भले कर लें परंतु यह भी सत्य है कि भावावेश में वे ऐसा कर तो लेते हैं परंतु पुरानी यादें उन्हें जीवन भर कचोटती रहती हैं | बाद में मनुष्य चाहते हुए परिवार में वह स्नेह एवं सम्मान नहीं प्राप्त कर पाता | ऐसे लोगों को विचार करना चाहिए कि हमारी आवश्यकता के चक्कर में कहीं किसी की भावनायें तो नहीं आहत हो रही हैं | परंतु आज का विवेकवान मनुष्य इस विषय पर विचार ही नहीं करना चाहता उसे तो बस यह लगता है कि यह हमारी आज की आवश्यकता है और इसे करना चाहिए | उचित - अनुचित का विचार आवश्यकताओं के आगे बौना हो गया है |* *आवश्यकता आविष्कार की जननी अवश्य है परंतु अनर्गल आवश्यकतायें मनुष्य को पतन की ओर भी अग्रसर कर देती हैं | इस पर भी विचार अवश्य करना चाहिए |*

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