तिलक का महत्त्व --- आचार्य अर्जुन तिवारी

18 अप्रैल 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (34 बार पढ़ा जा चुका है)

तिलक का महत्त्व   --- आचार्य अर्जुन तिवारी

🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸 *‼ भगवत्कृपा हि केवलम् ‼* 🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘🌻 *भारतीय सनातन की मान्यतायें एवं परम्परायें सदैव से अलौकिक एवं अद्भुत होने के साथ ही मानव मात्र के लिए सहयोगी व उपयोगी सिद्ध हुई हैं | जिस प्रकार सनातन की सभी मान्यतायें दिव्य रही हैं उसी प्रकार एक मान्यता है मस्तक पर तिलक लगाना | तिलक - चन्दन लगाना हमारी आदि परम्परा रही है | तिलक लगाने के पीछे आध्यात्मिक महत्व तो है ही साथ ही वैज्ञानिक महत्त्व भी बताया गया है | सनातन के किसी भी विधान को करने के पहले तिलक/चन्दन का विधान बताया गया है | हमारे धर्मग्रंथों में तो यहाँ तक लिखा है कि :-- "स्नाने दाने जपे होमो देवता पितृकर्म च ! तत्सर्वं निष्फलं यान्ति ललाटे तिलकं बिना !! अर्थात ;- मस्तक पर तिलक धारण किये बिना यदि तीर्थ स्नान , दानकर्म , जपकर्म , यज्ञ होमादि , पितरों का श्राद्ध एवं देवपूजन आदि किया जाता है तो वह सफल न होकरके निष्फल हो जाता है | अत: बिना तिलक लगाये कोई भी शुभकर्म नहीं करना चाहिए | दोनों भौंहों के बीच आज्ञाचक्र होता है जो मानव मस्तिष्क को नियंत्रित करता है वहाँ तिलक करने से मस्तिष्क व शरीर में ऊर्जा का संचार होता है | मनुष्य को नकारात्मकता नहीं घेरती है एवं मनुष्य के विचार दिव्य बनते हैं | यदि ब्राह्मण का मस्तक बिना चन्दन/तिलक के सूना रहता है तो उसे "चाण्डाल" की श्रेणी में रखा जाता है | क्योंकि चन्दन न लगाने से ब्राह्मणत्व एवं देवत्व जागृत नहीं होता है | पुरुषवर्ग जहाँ चन्दन लगाकर अपनी ऊर्जा को नियंत्रित करते हैं वहीं स्त्रियाँ कुंकुम का टीका लगाती हैं | जहाँ तिलक या टीका लगाया जाता है वहाँ भगवान श्री हरि विष्णु का निवास माना जाता है | वैसे तो शरीर के कई अंगों में चन्दन लगाने की परम्परा है परंतु इनमें मुख्य है मस्तक पर तिलक धारण करना |* *आज के भौतिकवादी युग में जहाँ सनातन की कुछ परम्पराओं को मानने में लोगों को लज्जा व संकोच होता है वहीं हम अपनी दिव्यता को भी खोते चले जा रहे हैं | आज वैज्ञानिक भी ललाट पर तिलक लगाने की परम्परा को मान्यता देते हुए यह सिद्ध कर रहे हैं कि मानव के मस्तिष्त को नियंत्रित करने में आज्ञाचक्र (दोनों भौंहों के बीच का स्थान) का महत्वपूर्ण योगदान होता है | और हमारे सनातन मार्गदर्शकों ने आदिकाल से आज्ञाचक्र को जागृत बनाये रखने के लिए तिलक का विधान बनाया था | आज प्राय: यह चर्चा होती है कि चन्दन कैसा होना चाहिए ? कौन सा चन्दन लगाना चाहिए ? इस विषय पर मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" लोगों का ध्यानाकर्षण अपने धर्मग्रंथों की ओर करामा चाहूँगा जहाँ स्पष्ट लिखा है कि :-- "पर्वताग्रे नदीतीरे रामक्षेत्रे विशेषत: ! सिन्धुतीरे वल्मीके तुवसीमूलमाश्रित: !! मृदएतास्तु संपाद्या वर्जयेदन्यमृत्तिका ! द्वारवत्युद्भवाद्रोषी चंदनादुर्धपुण्ड्रकम् !! अर्थात :- यदि सम्भव हो तो चंदन सदैव पर्वत के नोक का , नदी तट की मिट्टी का , पुण्य तीर्थ का , सिंधु नदी के तट का , चींटी की बॉर्बी तुलसी के मूल की मिट्टी का उत्तम कहा गया है | रोली , कुंकुम एवं हल्दी का तिलक करना शुभ एवं रोगनाशक कहा गया है | इतने दिव्य विधान होने पर भी यदि हम आज किसी से पिछड़ रहे हैं तो इसका मुख्य कारण यही है कि आज हम अपनी मान्यताओं को या तो भूल रहे हैं या फिर स्वयं को आधुनिक बनाने के चक्कर में उनसे दूरी बना रहे हैं |* *सनातन की एक एक मान्यता मानवमात्र के लिए कल्याणक एवं जीवनोपयोगी है आवश्यकता है इन्हें जानने एवं समझने की |*

तिलक का महत्त्व   --- आचार्य अर्जुन तिवारी

अगला लेख: जाकी रही भावना जैसी :-- आचार्य अर्जुन तिवारी



शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
05 अप्रैल 2019
*इस संसार में मनुष्य जन्म लेने के बाद विवाहोपरांत मनुष्य की सबसे बड़ी कामना होती है संतान उत्पन्न करना | जब घर में पुत्र का जन्म होता है तो माता-पिता स्वयं को धन्य मानते हैं | हमारे शास्त्रों में भी लिखा है :- "अपुत्रस्तो गतिर्नास्ति" अर्थात जिसके यहां पुत्र नहीं होता उसकी सद्गति नहीं होती | संतान क
05 अप्रैल 2019
05 अप्रैल 2019
*मानव जीवन में यदि मनुष्य अपने कर्मों का शुभाशुभ फल प्राप्त करता है तो वहीं उसके जीवन पर कुण्डली में उपस्थित ग्रहों का भी सीधा प्रभाव देखने को मिलता है | ग्रहों के दुष्प्रभाव से मनुष्य का जीवन इतना अधिक प्रभावित हो जाता है कि मनुष्य राजा भी बन सकता है एवं कुछ ही पलों में राजा भी रंक हो जाता है | कभी
05 अप्रैल 2019
05 अप्रैल 2019
*इस संसार में अनेकों प्रकार के पंथ , संप्रदाय एवं धर्म देखे जा सकते हैं , प्रत्येक धर्म एवं संप्रदाय का अपना अपना नियम अपने व्रत , पर्व , त्यौहार यहां तक कि "नववर्ष" भी अलग होते हैं | जिस प्रकार ईसा (अंग्रेजी), चीन या अरब का कैलेंडर है उसी तरह राजा विक्रमादित्य के काल में भारतीय वैज्ञानिकों ने इन सब
05 अप्रैल 2019
19 अप्रैल 2019
*सनातन हिन्दू धर्म के चरित्रों का यदि अवलोकन करके आत्मसात करने का प्रयास कर लिया जाय तो शायद इस संसार में न तो कोई समस्या रहे और न ही कोई संशय | हमारे महान आदर्शों में पवनपुत्र , रामदूत , भगवत्कथाओं के परम रसिया अनन्त बलवन्त हनुमन्तलाल जी का जीवन दर्शन दर्शनीय है | हनुमान जी का जन्मोत्सव मनाने में य
19 अप्रैल 2019
सम्बंधित
लोकप्रिय
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x