निराभिनता का उदाहरण हनुमान जी -- आचार्य अर्जुन तिवारी

19 अप्रैल 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (24 बार पढ़ा जा चुका है)

निराभिनता का उदाहरण हनुमान जी -- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस समस्त विश्व में जन जन के मनोमस्तिष्क में भारतीयता , बुद्धिमत्ता , वीरता , दासता , कुशलता एवं चातुर्य का प्रतीक माने जाने वाले पवनपुत्र , केशरीनन्दन , रामदूत बजरंगबली का चित्र अवश्य अंकित होगा | यदि निराभिमानता (अभिमान रहित) का उदाहरण भारतीय ग्रंथों में ढूँढ़ा जाय तो एक ही चरित्र उभर कर सामने आता है और वह हनुमान जी का | कोई भी ऐसा कार्य नहीं जो कि उनके लिए कठिन हो | जामवंत जी ने उद्घोष किया :- "कवन सो काज कठिन जगमांहीं ! जो नहिं होत तात तुम्ह पाहीं !! परंतु उनको अभिमान छू तक नहीं गया | १०० योजन (४०० कोस) के समुद्र को लांघकर निशाचरों से भरी रावण की लंका में जिस निर्भीकता एवं वीरता से हनुमान जी ने रावण से वार्तालाप किया एवं स्वर्णनगरी लंका का दहन करके रामादल में लौटे | लेकिन जब राघवेन्द्र सरकार ने पूछा कि हनुमान यह सब कैसे किया ? तो उन्होंने एक ही जबाब दिया :- "सो सब तव प्रताप रघुराई !" अर्थात मैंने तो कुछ किया ही नहीं बल्कि सब आपकी कृपा से ही हो पाया है | स्वर्गलोक , मृत्युलोक एवं पाताललोक में जिसकी वीरता का डंका बजता हो उसकी यह निराभिमानता ही उनको (हनुमान जी) प्रभु का प्यारा बनाती है | आकाशमार्ग से रात्रि भर में ही संजीवन बूटी लाना हो , या पाताल लोक से अहिरावण का वध करके अपने आराध्य श्री राम एवं लक्ष्मण के प्राण बचाने हों यह सभी कार्य करते हुए भी हनुमान जी में कभी भी अहंकार के दर्शन नहीं हुए | निराभिमानता के प्रत्यक्ष उदाहरण ऐसे धीर वीर हनुमान जी को साष्टांग दण्डवत प्रणाम |* *आज समाज में हनुमान जी को मानने वालों की कमी नहीं है | हनुमान जी कलियुग के प्रत्यक्ष देवता हैं | प्रत्यक्ष फल देने वाले हनुमान जी की पूजा की बड़े भक्ति एवं श्रद्धा के साथ भक्तजन करते हैं , परंतु आज के समाज में प्रायः यह देखने को मिलता है कि हनुमान जी को अपना आराध्य मानने वाले भक्तों के हृदय में अहंकार का समुद्र हिलोरें मारता रहता है | नहीं कुछ तो कुछ लोग यही बताते घूमते रहते हैं कि हम तो नित्य एक घंटे हनुमान जी की पूजा करते हैं , यदि देखा जाय तो यह साधारण सी बात परंतु इस बात में भी अभिमान का पुट दिखाई पड़ता है | एक तरफ जहां हनुमान जी अनेकों दुष्कर कार्य करने के बाद भी उसका कारण स्वयं को नहीं मानते वहीं उनके भक्त किंचित कार्य करने के बाद उसका बखान स्वयं करन लगते हैं | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" आज समाज में ऐसे भक्तों की संख्या अधिक देख रहा हूं जो अपने बल , भक्ति एवं सेवा का बखान सार्वजनिक मंचों से कर रहे हैं | ऐसे लोग हनुमान जी की भक्ति कर रहे हैं या भक्ति करने का दिखावा कर रहे हैं यह तो हनुमानजी ही जाने , परंतु मेरा मानना है कि जिस प्रकार हनुमान जी कोई भी कार्य करने के बाद उसका श्रेय अपने प्रभु श्री राम को दे देते थे उसी प्रकार प्रत्येक मनुष्य को अपने "मैं" का त्याग करके उसका श्रेय हनुमान जी को दे देना चाहिए , परंतु दुर्भाग्यवश ऐसा नहीं हो रहा है | आज तो मनुष्य बड़े गर्व के साथ कहता है कि यह मैंने किया | वह यह नहीं जानता की यही "मैं" मनुष्य के विनाश का कारण है | मनुष्य किसी भी विषय में यदि किंचित भी अभिमान करता है तो समझ जाना चाहिए कि उसका पतन प्रारंभ होने वाला है | इस "मैं" से बचे रहने की आवश्यकता है |* *निराभिमानता का प्रत्यक्ष उदाहरण हनुमान जी पूजा करने के बाद भी यदि मनुष्य के अंदर अभिमान का उदय हो रहा है तो समझ लो वह हनुमान जी की पूजा करने का दिखावा मात्र कर रहा है |*

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