विष रस भरा कनक घट जैसे :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

23 अप्रैल 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (121 बार पढ़ा जा चुका है)

विष रस भरा कनक घट जैसे :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*परमपिता परमात्मा ने इस सुंदर सृष्टि रचना की और इस सुंदर सृष्टि में सबसे सुंदर बनाया मनुष्य को | मनुष्य की सुंदरता दो प्रकार से परिभाषित की जाती है एक तो शरीर की सुंदरता दूसरे मन की सुंदरता | तन और मन का चोली दामन की तरह साथ होता है | यह दोनों ही एक दूसरे के पूरक और पोषक है , किंतु मनुष्य का सारा ध्यान पर आया शरीर की सुंदरता को संवारने में ही निकल जाता है एवं मनुष्य मन को सुंदर बनाने की ओर ध्यान नहीं देता है | इससे उसके मन में मलिनता आ जाती है | शरीर तो सुंदर हो जाता है परंतु मन असुंदर ही रह जाता है | ऐसे ही लोगों के लिए मानस में बाबा जी ने लिखा है :-- "मन मलीन तन सुंदर कैसे ! विष रस भरा कनक घट जैसे !!" बाबा जी ने बहुत ही गहरी बात लिखी है | यदि मन में मलिनता हो तो तन की सुंदरता व्यर्थ ही होती है , क्योंकि वह शरीर विष भरे सोने के कलश के समान हो जाता है | प्रत्येक मनुष्य को विचार करना चाहिए कि परमात्मा ने हमको सृष्टि का सर्वोत्तम उपहार यह सुंदर शरीर दिया है तो हमारे अंदर मन भी साफ , शुद्ध , छल क कपट से रहित निर्मल होना चाहिए , अन्यथा शरीर की सुंदरता का कोई अर्थ नहीं रह जाता है | मन की सुंदरता इसलिए आवश्यक है क्योंकि हमारे मनीषियों ने मनसा , वाचा और कर्मणा में पहला स्थान मन को दिया है , यदि मन ठीक है तो वचन और कर्म भी ठीक हो जाते हैं | मन से ही बोलने और करने की शुरुआत होती है यही आधार है | मनुष्य का मन जिस प्रकार होता है उसी प्रकार उस की प्रवृत्ति बन जाती है | मन का शोधन , स्वच्छता , व संयम अध्यात्म की पहली सीढ़ी है और उत्थान का मार्ग है | इसलिए अपने मन को सुंदर बनाने के लिए सतत प्रयत्नशील बने रहना चाहिए |* *आज समय बदला , समाज बदला , संबंध बदले किंतु तन मन की सुंदरता के बारे में सोच और विचार नहीं बदल पाया | आज भी तन के साथ मन की सुंदरता ही सच्ची सुंदरता मानी जाती है | मनुष्य को अपना मन सुंदर बनाने के लिए ज्ञान की आवश्यकता होती है , इसके साथ ही अपने स्वभाव को बदलना पड़ता है | कुभाव को छोड़कर सुभाव को अपनाना पड़ता है | अपने आचरण को सुंदर , सदाचारी बनाना पड़ता है ताकि सतोगुण बढे एवं रजोगुण व तमोगुण दूर हो सके | मेरा "आचार्य अर्जुन तिवारी" का मानना है कि यदि मन शांत और स्थिर है तो मन में तनाव , कुंठा , क्रोध और अवसाद जैसे विकार नहीं प्रकट हो सकते हैं | अनावश्यक कष्ट और क्लेश जीवन में नहीं आते हैं | वस्तुत: निर्मल मन के व्यक्ति सच्चिदानंद स्वरूप भगवान को पा सकते हैं | जिसके मन में छल , कपट , वैर , द्वेष , घृणा और हिंसा के कुभाव भरे रहते हैं उनके सुकृत नष्ट हो जाते हैं | धन , साधन और सुविधाओं के रहने के बाद भी ऐसा व्यक्ति सुखी नहीं रह पाता है और भाँति - भाँति के दुखों से घिरा रहता है | मन को बड़ा चंचल कहा गया है | तनिक असावधानी से इस मन पर अज्ञान , आलस्य , प्रमाद , अकर्मण्यता और उदासीनता जैसे मैल की परत चढ़ जाती है | हम तन को तो धोते और संवारते रहते हैं किंतु मन मलिन और रोगी होता चला जाता है , और इसके परिणाम स्वरूप मनुष्य में मलिनता , अहंकार , स्वार्थ , चोरी , बेईमानी , धूर्तता तथा दुराचार आदि प्रकट हो जाते हैं , जिसका परिणाम सदैव विनाशकारी ही हुआ है |* *हमारे मनीषियों मन की स्वच्छता पर इसीलिए बल दिया है और प्रायः सभी धर्मग्रंथों में मन को ही साधने के लिए महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश भी दिए गए हैं | मन को साधने के लिए , सुंदर बनाने के लिए आत्मावलोकन परम आवश्यक है |*

अगला लेख: जाकी रही भावना जैसी :-- आचार्य अर्जुन तिवारी



शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
30 अप्रैल 2019
*आदिकाल से हमारा देश भारत संपूर्ण विश्व में यदि विश्व गुरु कहा जाता था तो इसका कारण था भारत देश की संस्कृति एवं संस्कार | कहने को तो विश्व में अनेकों सभ्यतायें हैं परंतु यदि संस्कृति की बात की जाय तो संपूर्ण विश्व में एक ही संस्कृति देखने को मिलती है जिसे भारतीय संस्कृति कहा जाता है | हमारी भारतीय स
30 अप्रैल 2019
29 अप्रैल 2019
*इस धराधाम पर जन्म लेने के बाद अपनी जीवन यात्रा में आगे बढ़ने के लिए प्रत्येक मनुष्य का एक लक्ष्य होता | हमारे महापुरुषों ने मानव जीवन का लक्ष्य एवं उद्देश्य आत्मोन्नति करते हुए सदाचरण का पालन करके ईश्वर की प्राप्ति करना बताया है | ईश्वर को प्राप्त करने के लिए वैसे तो मनुष्य अनेक साधन साधता है परंतु
29 अप्रैल 2019
23 अप्रैल 2019
*परमपिता परमात्मा ने सुंदर संसार की रचना की , और इस संसार को एक उपवन की तरह बनाया | इस संसार में आपको प्रत्येक वस्तु मिलेगी चाहे वह सकारात्मक हो चाहे नकारात्मक | गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपने मानस में लिखा है :-- "जड़ चेतन गुण दोषमय विश्व कीन्ह करतार" अर्थात यहां गुण भी हैं और दोष भी | यह आपकी दृष्टि
23 अप्रैल 2019
18 अप्रैल 2019
🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸 *‼ भगवत्कृपा हि केवलम् ‼* 🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘🌻 *भारतीय सनातन की मान्यतायें एवं परम्परायें सदैव से अलौकिक एवं अद्भुत होने के साथ ही मानव मात्र के लिए सहयोगी व उपयोगी सिद्ध हुई हैं | जिस प्रकार सनातन की सभी मान्यतायें दिव्य रही हैं उसी प्रकार
18 अप्रैल 2019
23 अप्रैल 2019
*मनुष्य अपने जीवनकाल में अनेकों क्रिया - कलाप करता रहता है , भिन्न - भिन्न स्वभाव के लोगों की संगत करता रहता है | अपने स्वभाव के विपरीत लोगों के साथ रहकर अपने स्वभाव को बदलने का भी प्रयास करता रहता है | इसमें वह कुछ हद तक सफल भी हो जाता है , समय आने पर वह अपना मूल स्वभाव कहीं जाता नहीं है | वही व्यक
23 अप्रैल 2019
सम्बंधित
लोकप्रिय
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x