स्वभावो नोपदेशेन :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

23 अप्रैल 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (28 बार पढ़ा जा चुका है)

स्वभावो नोपदेशेन :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*मनुष्य अपने जीवनकाल में अनेकों क्रिया - कलाप करता रहता है , भिन्न - भिन्न स्वभाव के लोगों की संगत करता रहता है | अपने स्वभाव के विपरीत लोगों के साथ रहकर अपने स्वभाव को बदलने का भी प्रयास करता रहता है | इसमें वह कुछ हद तक सफल भी हो जाता है , समय आने पर वह अपना मूल स्वभाव कहीं जाता नहीं है | वही व्यक्ति जिसे समाज के लोग उपेक्षित दृष्टि से देखा करते थे वही व्यक्ति जब किसी सम्मानित व्यक्ति के साथ रहने लगता है तो समाज के लोग उसका भी सम्मान करने लगते हैं | लेकिन उसके जिस स्वभाव के कारण समाज ने उसे उपेक्षित किया था वह स्वभाव नहीं बदल पाता और अवसर मिलते ही अपना स्वभाव प्रदर्शित कर ही देता है | ऐसे लोग उस विषैले सर्प की तरह होते हैं जिसे चाहे जितना दूध पिलाओ परंतु अवसर मिलते ही वे विषवमन कर ही देते हैं | ऐसे लोग चाहे जितने अच्छे लोगों की संगत में रहें परंतु उनका मूल स्वभाव परिवर्तित नहीं हो पाता है | ऐसे लोगों के लिए पंचतंत्र में एक श्लोक देखने को मिलता है :- "स्वभावो नोपदेशेन शक्यते कर्तुमन्यथा ! सुतप्तमपि पानीयं पुनर्गच्छति शीतताम् !!" अर्थात :- किसी के स्वभाव या आदत को सिर्फ सलाह देकर बदलना संभव नहीं है, जैसे पानी को गरम करने पर वह गरम तो हो जाता है लेकिन पुनः स्वयं ठंडा हो जाता है | ये लोग इसी पानी की तरह होते हैं जो कि बहुत देर तक अपना स्वभाव परिवर्तित नहीं रख पाता | अपने इस स्वभाव के कारण ऐसे लोग समय समय पर उपेक्षित एवं तिरस्कृत भी होते रहते हैं परंतु स्वभाव नहीं बदलता |* *आज परिवार से लेकर समाज तक , धर्मक्षेत्र से लेकर राजनीति तक ऐसे लोगों का ही बोलबाला दिख रहा है | आज लोग इतने अवसरवादी हो गये हैं कि अपना स्वार्थ सिद्ध करने के बाद ऐसे पलटते हैं कि देखने वालों को महान आश्चर्य होता है | जिसके साथ मनुष्य दिन रात रहते हुए अपने जीवन के स्वर्णिम क्षणों को भोगता है उसी के साथ जब वह विश्वासघात करके आगे निकले का प्रयास करता है तो समाज को आश्चर्य होता है | आज चाहे राजनेता हों , चाहे कोई शिष्य हो या फिर मित्र हर कोई अवसरवादी क्रियाकलाप करते हुए देखे जा सकते हैं | किसी के साथ एक लम्बे समय तक रहकर समाज में स्थापित होने वाले जब अपने मार्गदर्शक के ही स्थान पर बैठने की लालसा में उसी के साथ विश्वासघात करते हैं तो यही समाज के प्रबुद्धजन कहते हैं कि ऐसा कैसे हो गया ? परंतु मेरा "आचार्य अर्जुन तिवारी" का मानना है कि यदि किसी ने ऐसा किया भी है तो इसमें आश्चर्य जैसी कोई बात नहीं होनी चाहिए क्योंकि यही ऐसे लोगों का मूल स्वभाव होता है जिसे परिवर्तित कर पाना कठिन ही नहीं बल्कि असम्भव भी है | जिस प्रकार किसी श्वान (कुत्ते) की टेंढ़ी पूंछ को सीधी करने के लिए लोहे की नली में डालकर धरती में इस प्रयोजन से गाड़ दो कि यह सीधी हो जायेगी , परंतु १०० साल के बाद भी यदि उस नली को जमीन से निकालकर पूंछ को निकाला जाय तो वह टेंढ़ी ही रहती है , उसी प्रकार ऐसे लोगों को भी एक लम्बे समय तक नित्य सदुपदेश देकर भी नहीं सुधारा जा सकता | ऐसा इसलिए होता है कि कुछ आदतें मनुष्य में वंशगत होती हैं जो कि कभी नहीं परिवर्तित हो पातीं | यदि ऐसा नहीं हो पाता है तो इसका मुख्य कारण यही माना जा सकता है कि मनुष्य किसी भी क्षेत्र में साधक नहीं बन पाया है | ऐसे लोग प्राय: अपने कर्मों के फलानुरूप रोते ही दिखाई पड़ते हैं |* *अपने स्वभाव को परिवर्तित न कर पाने के कारण मनुष्य जगह जगह अपमानित होना तो स्वीकार कर लेता है परंतु स्वभाव बदलने का प्रयास नहीं कर पाता |*

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