छल कपट एक दुर्गुण :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

23 अप्रैल 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (40 बार पढ़ा जा चुका है)

छल कपट एक दुर्गुण :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*आदिकाल से इस धरा धाम पर मनुष्य अपने कर्मों के माध्यम से सफलता एवं विफलता प्राप्त करता रहा है | किसी भी क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने के लिए सर्वप्रथम मनुष्य को छलहीन एवं निष्कपट होना परम आवश्यक है | मनुष्य कुछ देर के लिए सफल होकर अपनी सफलता पर प्रसन्न तो हो सकता है परंतु उसकी प्रसन्नता चिरस्थाई नहीं होती | हमारे पुराणों में अनेकों उदाहरण इस प्रकार के मिलते हैं जहां दैत्यों ने तपस्वी बनकरके तपस्या किया एवं वरदान भी प्राप्त कर लिया , परंतु उनके मन में पूर्व से स्थापित कपट नहीं जा पाया और अपने कपटभाव के कारण ही वे अपने जीवन में कुछ करने के पहले ही इस संसार से विदा हो गए | यदि भस्मासुर का उदाहरण दिया जाय तो अतिशयोक्ति नहीं होगी | जब तक उसे वरदान नहीं मिला था तब तक वह भगवान शिव को अपना आराध्य एवं पार्वती जी को सम्मान की दृष्टि से देख रहा था , और वरदान प्राप्त होते ही उसके मन में पार्वती मैया के प्रति कपट भाव का उदय हुआ और वह उन्हीं को प्राप्त करने के लिए उद्वेलित हो गया | जिसका परिणाम हुआ उसका विनाश | उसी प्रकार कपटी मनुष्य का कपट हृदय से कभी नहीं जा सकता है वह चाहे जितने ऊंचे सिंहासन पर बैठ जाय |* *आज के समाज में निष्कपट भाव मिलना लगभग असंभव सा दिख रहा है | आज की स्थिति यह है कि किसी के ऊपर दया करने के पहले हजारों बार सोचना पड़ता है | यदि किसी ने किसी की दीनता पर पिघल कर उसको आश्रय दे दिया तो वह एक निश्चित समय के बाद उसी के साथ कपट करता हुआ देखा जा रहा है | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" यह कह सकता हूं कि कपटी मनुष्य कभी भी सफल नहीं हो सकता , क्योंकि ऐसे लोगों का कार्य होता है जिसके साथ रह रहे हैं उसकी बुराई करके दूसरा समाज ग्रहण करना | कुछ दिन वहां रहने के बाद उनके हृदय में बैठा हुआ कपट उनको उद्वेलित कर देता है और अपने नए आश्रय दाता के साथ भी वह अपना कपट पूर्ण चरित्र दर्शा ही देते हैं | ऐसे व्यक्तियों से सदैव सावधान रहने की आवश्यकता है | शायद ऐसे ही लोगों को "आस्तीन का सांप" कहा गया है | ऐसे व्यक्ति नीलश्रृगाल की तरह होते हैं जो कुछ दिन तो सिंह बनकर भले जंगल में राज्य कर लें परंतु उनके अंदर जो अवगुण है वह बहुत दिन तक नहीं छुप सकता है | एक दिन समाज उनके वास्तविक चरित्र का दर्शन अवश्य करता है | तब ऐसे लोग अपनी गलती ना मान करके तरह-तरह के आरोप अपने आश्रयदाता के ऊपर लगाने लगते हैं , परंतु यह समाज यह जानता है कि कल को यही व्यक्ति अमुक के ऊपर दोषारोपण कर रहा था आज दूसरे के ऊपर दोषारोपण कर रहा है इसका अर्थ यही हुआ इस का आश्रयदाता गलत नहीं है बल्कि गलत यही व्यक्ति है | ऐसे व्यक्ति जब समाज में ऊँचे मंचों पर बैठकर समाज को सदुपदेश देते हैं तो बड़ा हास्यास्पद लगता है |* *व्यक्ति किसी के पास जब जाता है तो दीन हीन बनकर जाता है परंतु कुछ दिन बाद उसका असली चरित्र उजागर हो ही जाता है | अत: सावधान रहें |*

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सच कहा आपने अर्जुन जी .

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