जाकी रही भावना जैसी :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

23 अप्रैल 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (34 बार पढ़ा जा चुका है)

जाकी रही भावना जैसी :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*परमपिता परमात्मा ने सुंदर संसार की रचना की , और इस संसार को एक उपवन की तरह बनाया | इस संसार में आपको प्रत्येक वस्तु मिलेगी चाहे वह सकारात्मक हो चाहे नकारात्मक | गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपने मानस में लिखा है :-- "जड़ चेतन गुण दोषमय विश्व कीन्ह करतार" अर्थात यहां गुण भी हैं और दोष भी | यह आपकी दृष्टि के ऊपर निर्भर करता है कि आप क्या ग्रहण करना चाहते हैं | मिथिला नगरी में महाराज जनक की स्वयंवर सभा में जब गुरु विश्वामित्र के साथ मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने प्रवेश किया तो राम तो एक ही थे परंतु राम को देखने वालों की दृष्टि एवं दृष्टिकोण भिन्न-भिन्न था | राजाओं ने उन्हें महाराजा माना , दुष्टों ने अपना काल , माताओं ने पुत्रवत् दृष्टि डाली एवं महारानी सीता ने अपना जीवन आधार मानकर उनका दर्शन किया | कहने का तात्पर्य यह है कि ईश्वर की बनाई सृष्टि में आपका दृष्टिकोण महत्वपूर्ण है | जिसका जैसा स्वभाव होता है वह वैसा ही संगी साथी ढूंढ लेता है , जिसकी जैसी भावना होती है यह संसार उसको उसी प्रकार दिखाई पड़ता है | एक जुआरी को सारा संसार जुआरी ही दिखाई पड़ता है , एक सज्जन पुरुष को सारा संसार ही सज्जन दिखाई पड़ता है | परिवार में एक पुरुष अपनी माता के लिए पुत्र होता है , पत्नी के लिए प्राण आधार होता है , संतान के लिए वात्सल्य में पिता होता है | जिस दृष्टि से जिसको देखा जाए वह उसी रूप में दिखाई पड़ता है | मनुष्य को सदैव दोषदर्शन का त्याग करके प्रियदर्शन करना चाहिए | जब आप किसी में अच्छाइयां ढूंढेंगे तो आपको उसकी अनेक अच्छाइयां दिखाई पड़ेगी परंतु जब हम उसकी बुराइयां ढूँढ़ने निकलते हैं तो उससे बुरा संसार में कोई दूसरा दिखाई नहीं पड़ता है | एक ही व्यक्ति में यह अंतर यदि दिखाई पड़ रहा है तो यह दोष व्यक्ति का नहीं बल्कि हमारे दृष्टिकोण का है | इसीलिए कहा गया है की सदैव गुणों की खोज की जाय | किसी के दोष का निरन्तर दर्शन करने पर वह दोष अपने में भी आ जाता है |* *आज ईश्वर की बनाई हुई सृष्टि वही है , वही लोग हैं , परंतु यदि कुछ परिवर्तित हुआ है तो वह मनुष्य का दृष्टिकोण है | आज मनुष्य जहां भी जाता है वह गुणों का दर्शन तो बाद में करता है दोष उसे पहले दिखाई पड़ जाते हैं | किसी की बनाई हुई कलाकृति कितनी भी सुंदर हो परंतु उसे देखने के बाद मनुष्य सबसे पहले उसमें हो गई कमी को देखता है और वक्तव्य भी दे देता है कि यदि यहां यह बना दिया होता तो और अच्छा लगता | उसी प्रकार मनुष्य किसी भी व्यक्ति के गुणों का अवलोकन बाद में करता है परंतु दोष पहले दिखाई पड़ जाते हैं | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" आज देख रहा हूं कि लोग देवी देवताओं में भी कमियां निकाल रही हैं | उनके गुणों को तो हम आत्मसात नहीं कर पा रहे हैं परंतु उनकी कमियों की व्याख्या विधिवत करते रहते हैं | आज के समाज में मनुष्य की दृष्टि इतनी दूषित हो गई है कि उसे अच्छाई दिखाई ही नहीं पड़ती है उसका कारण यही है कि हम आज किसी की गुणों का अवलोकन करना ही नहीं चाहते हैं , क्योंकि हमारे अंदर स्वयं इतना दोष भर गया है कि वह दोष किसी की अच्छाई को देखने ही नहीं देता है | आज चाहे रामचरितमानस हो या किसी के लेख | पूरे लेख में हम सिर्फ कमी ढूंढ करके टिप्पणी कर देते हैं उस लेख में जो सकारात्मकता है उसको ग्रहण करने का प्रयास कर आप नहीं कर पाते हैं | यही दृष्टिदोष कहा गया है जिससे हमें बचने की आवश्यकता है |* *इस संसार में सब कुछ है | यह हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम क्या प्राप्त करना चाहते हैं | हमारा जैसा दृष्टिकोण होगा वैसा ही संसार हमारे सामने उपस्थित होगा |*

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