आप-मैं और दो शब्द

24 अप्रैल 2019   |  हरीश भट्ट   (26 बार पढ़ा जा चुका है)

दो शब्द लिखने के चक्कर में क्या-क्या लिखा जाता है खुद को भी समझ में नहीं आता. जब तक लिखने का फ्लो बनता है. तब तक सोच गायब हो जाती है और जब सोच होती है तब शब्द नहीं मिलते. और जब लिखने की पिनक में शब्दों की खुराक मिलती है तब लिखा जाता है उसके बारे में तो पाठक ही जाने लेकिन खुद को जो संतुष्टि मिलती है, वह अनमोल होती है. मेरे घमंड की इंतिहा देखिए लिखने वालों की लाइन में सबसे पीछे खड़ा हूं कि काश कभी  लाइन का रुख पलटने में कामयाब हो गया तो सबसे आगे मैं ही रहूंगा. बस इसी धुन में लिखता चला जा रहा हूं कि कभी तो वह सुबह आएगी जब मेरे नाम का सिक्का चमकेगा. मेरे नाम का सिक्का खोटा होगा या सुनहरा यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा लेकिन फिलहाल मैं अपने रास्ते से नहीं भटकने वाला. जानता हूं कि शुरुआती दौर में कभी किसी को कोई भाव नहीं मिलता है तब मुझे कौन पूछने वाला है. थे सूरज को सलाम करने वाली दुनिया की क्या बात करूं. यह दुनिया वाले ही है जो ना जीने देती है ना मरने देते हैं. लेकिन यही वह दुनिया है जो सफलता मिलते ही आपके कदमों में अपनी जान न्योछावर करती है. बस आप में कुछ कर गुजरने की ख्वाहिश पर लगाम नहीं लगनी चाहिए. यूं भी दुनिया के पास करने के लिए आपके सिवाय और भी बहुत कुछ है. 2 शब्दों के फेर में इतनी बात कह गया. 2 शब्दों के साथ अपनी बात खत्म करता हूं. हार्दिक धन्यवाद.

अगला लेख: टीआरपी के लिए खुद सुधर जायेगे चैनल्स



शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
सम्बंधित
लोकप्रिय
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x