भारतीय संस्कृति :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

30 अप्रैल 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (5 बार पढ़ा जा चुका है)

भारतीय संस्कृति :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*आदिकाल से हमारा देश भारत संपूर्ण विश्व में यदि विश्व गुरु कहा जाता था तो इसका कारण था भारत देश की संस्कृति एवं संस्कार | कहने को तो विश्व में अनेकों सभ्यतायें हैं परंतु यदि संस्कृति की बात की जाय तो संपूर्ण विश्व में एक ही संस्कृति देखने को मिलती है जिसे भारतीय संस्कृति कहा जाता है | हमारी भारतीय संस्कृति संपूर्ण विश्व में एकमात्र ऐसी संस्कृति जो मनुष्य को सच्चे अर्थ मनुष्य बनाने की क्षमता एवं भावना से ओतप्रोत है | भारतीय संस्कृति के मूल में ऐसी भावनाएं कूट कूट कर भर दी गई है जिनको अपनाकर व्यक्ति आत्मसंतोष एवं आत्मोल्लास से परिपूर्ण जीवन व्यतीत कर सकता है | आत्मीयता , सदाशयता , दया करुणा , त्याग , बलिदान , सेवा , स्नेह यह कुछ ऐसे गुण हैं जो समाज में सहिष्णुता एवं सहकारिता से भरा पूरा वातावरण निर्मित करते हैं | यह गुण ही भारतीय संस्कृत के आधारभूत तत्व या भारतीय चिंतन की मूलभूत धारा कहे जा सकते हैं | इन दोनों को आत्मसात करने वाले व्यक्तित्व ही भारतीय संस्कृति के अग्रदूत कहे गए | यह भारतीय संस्कृति देन है कि यहां से "वसुधैव कुटुंबकम" या "स्वर्गादपि गरीयसी" की उद्घोषणा संपूर्ण विश्व में प्रसारित हुई | यह सौभाग्य भारत भूमि को यदि प्राप्त हुआ तो उसके मूल में भारतीय संस्कृति दिखाई पड़ती है | हमारे महापुरुषों ने भारतीय संस्कृति को आत्मसात करके समस्त विश्व को प्रेम , भाईचारे एवं सद्भावना का ऐसा संदेश दिया कि यहां की संस्कृति विश्व संस्कृति बन गई , और भारत को विश्व गुरु कहां जाने लगा |* *आज युग बदल गया , अनेंको देश बदल गए , अनेंको देशों की सभ्यता एवं संस्कृति मिट गयी , परंतु हमारे देश भारत की सभ्यता एवं संस्कृति में कोई परिवर्तन नहीं देखने को मिला | आज भी संपूर्ण विश्व भारत की ओर यदि आशाभरी दृष्टि से देखता है तो उसके पीछे मूल कारण है कि भारत ने ना केवल अपने देश को समुन्नत बनाया बल्कि समस्त विश्व को ही शान्ति एवं प्रगति के लिए मार्गदर्शन प्रदान किया | आज यदि विश्व में भारत का नाम लिया जाता है तो उसका कारण भारतीय संस्कृति की दिव्यता ही है | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" यह कह सकता हूं कि जहां विश्व के अन्य देशों में जिन्हें संस्कृति कहा जाता है वह मात्र सांप्रदायिक मान्यताओं से अधिक कुछ नहीं है , इसके विपरीत भारतीय संस्कृति संपूर्ण विश्व में मानवता के लिए है | भारतीय संस्कृति की आधारशिला मानव मात्र के कल्याण के लिए रखी गई है , क्योंकि भारतीय चिंतकों का मानना था कि मानवमात्र एक समान है | यहां भेदभाव नहीं किया गया कोई भी अपने कर्मों के माध्यम से उच्च और निम्न कोटि में जीवन यापन कर सकता है | यह भारतीय संस्कृति महानता है कि यहाँ कभी अपने कल्याण की कामना न करके "विश्व का कल्याण हो" का उद्घोष होता रहा है | आज हमें अपनी संस्कृति पर गर्व होना चाहिए कि हम एक ऐसे देश के वासी हैं जहाँ पर महान दिव्यात्माओं ने अवतार ग्रहण करके मानवमात्र को सभ्यता एवं संस्कृति का पाठ पढ़ाया |* *हमें आवश्यकता है अपनी दिव्य संस्कृति एवं अलौकिक संस्कारों को जान करके उनका अनुसरण करने की |*

भारतीय संस्कृति :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

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