आनन्द :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

30 अप्रैल 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (8 बार पढ़ा जा चुका है)

आनन्द :-- आचार्य अर्जुन तिवारी  - शब्द (shabd.in)

*जब से इस धराधाम पर मनुष्य का जन्म हुआ तब से मनुष्य प्रतिपल आनंद की खोज में ही रहा , क्योंकि मनुष्य आनन्दप्रिय प्राणी कहा गया है | आनंद की खोज में पूरा जीवन व्यतीत कर देने वाला मनुष्य कभी-कभी यह भी नहीं जान पाता है जो वास्तविक आनंद है क्या ?? हमारे धर्मग्रंथों में परमात्मा को ही आनन्द कहा गया है | सत + चित + आनंद अर्थात सच्चिदानंद परमात्मा को मानते हुए हमारे महापुरुषों ने परमात्मप्राप्ति को ही आनंद प्राप्ति बताया है | पुराणों का अवलोकन किया जाय तो यही तथ्य निकल कर सामने आता है | जब अयोध्या में भगवान श्रीराम का जन्म हुआ तो यह नहीं कहा गया कि "अवध में राम भयो" बल्कि वहां यही उद्घोषणा की गई कि "अवध में आनंद भयो" ! ठीक इसी प्रकार नंद जी के यहां कन्हैया का जन्मोत्सव मनाया गया तो भी यही गाया गया कि "नंद घर आनंद भयो" इससे यहि भासित होता है कि परमात्मा के अतिरिक्त आनन्द ना तो और कहीं और ना ही प्राप्त हो सकता है | मनुष्य अपने आनन्द के लिए तरह-तरह के साधन साधता है और उसे कुछ क्षण के लिए या कुछ दिन के लिए आनंद की अनुभूति भी होती है , परंतु कुछ दिन के बाद मनुष्य पुनः सांसारिकता में लिप्त हो करके आनन्द से हीन हो जाता है | और पुनः एक नए आनंद की खोज में निकल पड़ता है | संसार में रहकर के सांसारिकता से कोई बच नहीं सकता है परंतु प्रयास अवश्य करना चाहिए | आनंद स्वरूप परमात्मा है उसे एक बार प्राप्त कर लेने के बाद अन्य किसी आनन्द की आवश्यकता नहीं होती , अतः परमात्मा रूपी आनन्द को प्राप्त करने के लिए प्रत्येक मनुष्य को बहुत नहीं तो थोड़ा प्रयास अवश्य करना चाहिए | चिरस्थाई आनन्द यदि कोई है तो परमात्मा है इसके अतिरिक्त इस सकल सृष्टि में मनुष्य को कहीं कभी स्थाई आनंद नहीं प्राप्त हो सकता |* *आज युग परिवर्तन हुआ है | अध्यात्मवाद को पीछे छोड़कर के भौतिकता हावी हुई है | इस भौतिक युग में मनुष्य आज भी आनंद की प्राप्ति के लिए अनेक उपाय कर रहा है , परंतु मनुष्य की वैचारिक क्षमता परिवर्तित हो गई है | आज मनुष्य आत्मिक एवं आध्यात्मिक आनन्द की अपेक्षा शारीरिक एवं पारिवारिक आनन्द के लिए उद्योग कर रहा है | आज का मनुष्य इंद्रियों की तृप्ति को ही आनन्द मान रहा है , जबकि इंद्रिय सुख क्षणिक होता है | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" आज देख रहा हूं कि आनन्द की परिभाषा भी बदल गई है | आज क्षणिक सुख को ही आनन्द कहा जाने लगा है | मनुष्य को जब इच्छानुसार भोजन मिल जाता है तो बोलता है कि आनंद आ गया | कहने का तात्पर्य है कि आज आनन्द इंद्रिय सुख तक ही सीमित होकर रह गया है जबकि यह आनन्द नहीं कहा जा सकता | आनंद तो सिर्फ परमात्मा को ही कहा जा सकता है | उनकी शरण में जाने से , उनकी कृपा दृष्टि प्राप्त करके उन का कृपा पात्र बनने पर ही आनंद की अनुभूति हो सकती है , परंतु आज यदि किसी से यह बात कह दो तो या तो हंसने लगेगा या फिर वहां से उठकर चला जाएगा | इसीलिए आज का मनुष्य भटक रहा है |* *सुख एवं आनन्द प्रत्येक मनुष्य चाहता है और सबको आनन्द मिलना भी चाहिए , परंतु मनुष्य को क्षणिक आनन्द की अपेक्षा स्थाई आनंद की खोज भी अवश्य करना चाहिए |*

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