बूँद-बूँद करके सागर भरता है

10 मई 2019   |  श्रीमती अर्चना श्रीवास्तव   (46 बार पढ़ा जा चुका है)

बूँद-बूँद करके सागर भरता है

एक सज्जन है किराये के मकान में रहते है, छोला भठूरे का ठेला लगते हैं, उसकी कमाई से गुजरा होता है, मकान का किराया 1500 रूपए है, वो बिना नागा किये हर महीने किराया भर देते हैं, ऐसा करने का गुप्त रहस्य ये है की वे रोज 50 रूपये निश्चित तारीख को एक डिब्बे में डालते जाते हैं, जो माह पूरा होते होते है 1500 रुपये हो जाते हैं, और किराया समय पर दे पाते हैं, उनको कोई कष्ट नहीं होता, उनका कहना है की वे इकट्ठे 1500 रुपये कहाँ से लायेंगे, सही भी है बून्द बून्द करके घड़ा भरता है,


आप खुद सोचिये हममें से ऐसे कितने लोग है जो इस नियम का पालन करते हैं, बात बून्द बराबर है पर है कितने महत्वपूर्ण, इस संसार में कोई चीज़ छोटी या तुच्छ नहीं होती है, प्रत्येक का अपना महत्त्व होता है. किसी भी वास्तु को छोटा न समझे, समय पाय कूड़ा करकट भी काम आ सकता है.


हम छोटी वस्तु या छोटे छोटे आदमियों को महत्व नहीं देते, उनकी अवहलेना करते है, पर समय पर यही सब बड़े काम के होते हैं, किसी भी मनुष्य को छोटा मत समझिये, उनका अपना महत्व होता है. उसी तरह बूँद बूँद करके सागर भरता है, इस बात को हमेशा ध्यान रखे.

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मनुष्यता के नज़रिये से भी सभी बराबर होने चाहिए

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