बातूनी

19 मई 2019   |  मंजू गीत   (41 बार पढ़ा जा चुका है)

बातों का खजाना  औरतों की अभिव्यक्ति को बातूनी कहकर दरकिनार कर दिया जाता है। औरत स्वयं में चलती फिरती कहानी है, वह अपनी वास्तविक जिंदगी के बहुत से क़िरदारों को जीती हैं। पिता का साया सिर पर नहीं हो तो पिता बन जाती है। घर की बड़ी स्वयं हों तो बेटा बन जाती है। औरत जिम्मेदारी की पहली जुबान है। जिसे हर कोई उम्मीद भरी नजरों से देखता है। घर हो या समाज हों उसकी रीढ़ औरत ही है।औरत के स्वरूप के बिना कहानी हों या जहां की रवानगी हों, उसकी तस्वीर अधूरी नजर आतीं हैं। रंगों का बिखराव, बातों का बहाव, शब्दों की मिठास, जीवन का बयान औरत में ही झलकता है। वह काम की दुनिया की बादशाह है। वह हर जगह को मुस्कुराहट के साथ जीती हैं। बच्चों की दुनिया में वह कहानियों वाली जिगती जागती किताब हैं। जो कभी (खुद के संघर्ष) आपबीती सुनाती है तो कभी जगबीती(पुरानी कहानियां) सुनाती है। वह कितनी भी व्यस्त क्यों न हो पर हर किसी के लिए वक्त निकाल लेती है? इसी वजह से वह हर किसी के लिए खास है। 

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