मनुष्य का चरित्र :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

19 मई 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (8 बार पढ़ा जा चुका है)

मनुष्य का चरित्र :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*परमपिता परमात्मा की सृष्टि जितनी अनुपम एवं अनूठी है उतनी ही विचित्र भी है | इन्हीं विचित्रताओं में सबसे विचित्र है मनुष्य का जीवन | यद्यपि समस्त मानव जाति की रचना परमात्मा ने एक समान की है परंतु सबका अपना सौंदर्य है , अपना वजूद है , अपनी रंगत है , अपना स्वरूप है , अपनी विशेषता है व अपनी उपयोगिता है , और साथ ही प्रत्येक मनुष्य की भिन्न-भिन्न सीमाएं भी हैं | परमात्मा की सृष्टि में एक दूसरे से तुलना करना तो स्वाभाविक है परंतु यदि व्यक्तिगत जीवन में किसी से तुलना या कटाक्ष किया जाता है तो मनुष्य इसी कुचक्र में उलझ करके अपने सुख और सफलता के मार्ग को अवरुद्ध कर लेता है , क्योंकि किसी से भी तुलना करने या किसी पर कटाक्ष करने के चलते मनुष्य ईर्ष्या द्वेष में फंस जाता है और अनावश्यक तनाव और मानसिक संताप को निमंत्रण दे देता है , जो कि मनुष्य के लिए अवसाद का कारण भी बन सकता है | मनुष्य को इन प्रपंचों से बचते हुए अपने जीवन के मूल उद्देश्य पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए | प्रत्येक मनुष्य को ईश्वर ने एक विशिष्ट उद्देश्य क् लिए इस धरती पर भेजा है | वह उद्देश्य मनुष्य अध्यात्मपथ का पथिक बनने के बाद ही प्राप्त कर सकता है | अध्यात्म के मार्ग की पहली सीढ़ी सतसंग को ही बताया गया है | किसी भी सभा या समूह में सतसंग करने के लिए विभिन्न विचारों एवं विभिन्न ज्ञानस्रोतों से परिपूर्ण विद्वान समागम करते हैं | यह आवश्यक नहीं है कि सबका ज्ञान एवं विचार एक जैसा ही हो | ऐसे में मनुष्य को किसी भी विवाद से बचते हुए अपने मूल उद्देश्य पर ध्यान केन्द्रित रखना चाहिए | परंतु मनुष्य में विद्वता आने के बाद स्वत: प्रतट अहंकार मनुष्य को ऐसा करने नहीं देता है और मनुष्य एक दूसरे को नीचा दिखाने में व्यस्त होकर अपने मूल उद्देश्य से भटक जाता है |* *आज के युग में मनुष्य उस मृग की तरह हो गया है जो स्वयं के भीतर से निकल रही सुगंध को सारे जंगल में ढूंढ़ा करता है | आज मनुष्य अपने जीवन के मूल उद्देश्य से भटकता प्रतीत हो रहा है | कहने को तो लोग बड़ी - बड़ी उपाधियाँ धारण किये रहते हैं परंतु उनके वक्तव्य अहंकार से परिपूर्ण एवं एक अनपढ़ - गंवार से भी निम्नस्तर के होते हैं | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" आज विभिन्न सतसंग सभाओं का सहभागी बनकर देखता हूँ कि इन सतसंग सभाओं एक नवीन विधा जन्म ले रही है वह है किसी की भी तनिक गल्ती पर कटाक्ष करना या व्यंग कसना | ऐसा जब भी किया जाता है तो आपसी द्वेष एवं ईर्ष्या का भाव तो बढ़ता ही साथ ही एक मनुष्य की मूर्खता के कारण सतसंग सभा के सभी सदस्य तनाव में आ जाते हैं तथा सतसंग का विषय परिवर्तित हो जाता है | इन विद्वानों को विचार करना चाहिए कि किसी की किसी से तुलना कदापि नहीं की जा सकती | ईर्ष्या , द्वेष , तनाव से स्वयं को बचाते हुए अपने जीवन के मूल उद्देश्य का स्मरण करना चाहिए जिससे कि सतसंग के माध्यम से आध्यात्म का मार्ग प्रशस्त हो सके |* *प्रत्येक मनुष्य को स्वयं का अवलोकन करते रहना चाहिए एवं अहंकार नामक विष से स्वयं को बचाते हुए ईश्वर प्राप्ति का साधन साधना चाहिए |*

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तनिक गल्ती पर कटाक्ष करना या व्यंग कसना - ये बड़ी बात लिखी आपने ... प्रेरणात्मक

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