कर्म की उत्पत्ति और उसका स्वरूप-

02 जून 2019   |  Yadav Yogesh kumar -Rohi-   (10 बार पढ़ा जा चुका है)

एक सतसंग में निरंकारी मिशन के महापुरुष
-जब मंच पर खुल कर विचार करने की हम्हें अनुमति देते हैं ।
और प्रश्न करते हैं कि कर्म-- क्या है ?
और यह किस प्रकार उत्पन्न होता है ?

कई विद्वानों से यह प्रश्न किया जाता है ।
मुझे भी अनुमति मिलती है ।
हमने किसी शास्त्र को पढ़ा नहीं
परन्तु हमने विचार करना प्रारम्भ किया ।
और मुझे भी तब आश्चर्य होता है !
कि जिस प्रश्न को हम पर कोई उत्तर नहीं है ।
फिर अचानक ही कुछ शब्दों का प्रवाह मुखार-बिन्दु से नि:सृत हो रहा है ।
जिसे 'मैं बोल तो रहा हूँ परन्तु विना सोचे समझे ।
यद्यपि मैं सुन भी रहा हूँ ।
हमने करते जारहे हैं
कि अहं कर्म रूपी वृक्ष का आधार स्थल है ।
क्यों कि अहंकार में संकल्प का बीज उत्पन्न होता है ।
-जब प्राणी को अपनी सत्ता का बोध होता है ।और इच्छाओं के रूप में इसका अंकुरण होता है अर्थात्‌
और इसी संकल्प का प्रवाह रूप इच्छा में रूपान्तरित हो जाती है ।
और यह इच्छा ही प्रेरक शक्ति है कर्म की
कर्म इस जीवन और संसार का सृष्टा है।

महापुरुषों ने फिर पूछा और बोले कि ये इच्छा क्यों उत्पन्न होती है ?
जब हमने थोड़ा से मनन किया तो हम्हें लगा कि इच्छा

संसार का सार है संसार में मुझे द्वन्द्व ( दो परस्पर विपरीत किन्तु समान अनुपाती स्थितियाँ अनुभव हुईं
--जो सृष्टि की प्रत्येक सत्ता में विद्यमान हैं

मुझे लगा कि "समासिकस्य द्वन्द्व च" श्रीमद्भगवत् गीता का श्लोकाँश
इस रूप में सार्थक है ।
और मैंने अपने मत के समर्थन मे यह श्लोकाँश प्रस्तुत कर दिया
मैंने कह दिया कि जैसे- नीला और पीला रंग मिलकर हरा रंग बनता है ।
उसी प्रकार ऋणात्मक और धनात्मक आवेश
ऊर्जा उत्पन्न करते हैं ।
और ऊर्जा से ही कार्य या कर्म करने की प्राणी में उत्पन्न होती है ।
मुझे लगा कि अब हम सत्य के समीप आ चुके हैं
मैने फिर कह दिया की काम कामना का ही रूपान्तरण है

पुरुष को स्त्रीयों की कोमलता में सौन्दर्य अनुभूति होती तो उनके हृदय में काम जाग्रत होता है ।
और स्त्रीयों को पुरुषों की कठोरता में सौन्दर्य अनुभूति होती है।
क्यों कि कोमलता का अभाव पुरुष में होने से 'वह कोमलता को सुन्दर मानते हैं ।
और स्त्रीयों में कठोरता का अभाव होने से ही वे मजबूत व कठोर लोगो को सुन्दर मानते हैं ।
और केवल जिस वस्तु की हम्हें जितनी जरूरत होती है ;
वही वस्तु हमारे लिए उतनी ही ख़ूबसूरत है।

वस्तुत : यहाँं भी द्वन्द्व से काम या कामना का जन्म हुआ है । और कामनाओं से प्रेरित होकर मनुष्य कर्म करता है ।

फिर तो मन रूपी समुद्र में विचारों की लहरें उठने लगीं
हम समय पर विचार करने लगे ।
संसार की सबसे शूक्ष्म व गतिशील वस्तु है समय !
वायु , प्रकाश और मन भी इस समय से गतिशील नहीं

भारतीय दर्शन मन और समय को तात्विक रूप में सिद्ध करते हैं ।
मन की काल से सहधर्मिता प्रकट की जा सकती!

मित्रों संसार रूपी पुष्प की गन्ध है ।
परिवर्तन को पराग समझिए ।
मकरन्द ही कर्म है ।

भक्तो कैसा लगा सतसंग प्रतिक्रिया अवश्य दें ।

आपका सबका शिष्य - यादव योगेश कुमार "रोहि"

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