समूह या संगठन का महत्त्व :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

09 जून 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (45 बार पढ़ा जा चुका है)

समूह या संगठन का महत्त्व :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*जबसे इस धराधाम पर मानव की सृष्टि हुई तबसे ही मनुष्य ने समूह एवं संगठन को महत्त्व दिया है | या यूँ भी कहा जा सकता है कि मनुष्य के विकास में समूह व संगठन का विशेष योगदान रहा है | आदिकाल में जब न तो घर थे और न ही जीवन को सरल बनाने के इतने साधन तब मनुष्य समूह बनाकर रहते हुए एक - दूसरे के सुख - दु:ख में सम्मिलित होता रहा है | पारिवारिक समूह ऐसा होता था कि पूरा का पूरा गाँव एक ही परिवार के बस जाया करते थे | परिवार के लोग जब समूह में बैठकर आपस में चर्चा - परिचर्चा करते थे तो आने वाली किसी भी विषम परिस्थितियों से लड़ने एवं उनसे बाहर निकलने का आत्मिक बल प्राप्त होता था | ऋषियों ने भी इस बात का महत्त्व संसार को समझाने के लिए आश्रमों में समूह के रूप में रहा करते थे एवं नित्य नई चर्चा करके संसार को नवीन ज्ञान प्रदान करते रहते थे | आज हमारे सनातन धर्म में अठारह पुराणों की गणना की जाती है , इन पुराणों में उद्धृत कथाओं का स्रोत भी अट्ठासी हजार ऋषियों का सतसंग ही रहा है | कहने का तात्पर्य यह है कि संगठित परिवार , समाजदेश कोई भी निर्णय लेकर किसी भी विषम परिस्थिति से बाहर निकलने में सक्षम होता रहा है | मानव जीवन में समूह एवं संगठन के महत्त्व को देखते हुए ही हमारे पूर्वजों ने परिवार एवं समाज को संगठित रखने का प्रयास किया है | इतिहास गवाह है कि संगठित परिवार ने जितना विकास किया है उतना असंगठित व एकल परिवार कभी भी नहीं कर पाये हैं | पूर्व में समूहों की सफलता का मुख्य कारण यह था कि लोग एक दूसरे का सम्मान करते हुए दूसरों की कही बात को सुनकर उसका पालन करने का प्रयास करते थे तथा आपसी मनमुटाव को महत्त्व नहीं देते थे |* *आज समूह एवं संगठन की आधार कही जाने वाली प्रथम ईकाई परिवार ही असंगठित होता दिख रहा है | आज परिवारों में ही आपसी सामंजस्य नहीं रह गया है | अधिकतर परिवार ऐसे देखे जा सकते हैं जहाँ छोटी सी छोटी बात पर बिखराव हो रहा है | परिवार टूटते जा रहे हैं इसका पिरमुख कारण है अति महत्त्वाकांक्षा एवं एक दूसरे की उचित / अनुचित बात को सहन करने की क्षमता का अभाव | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" आज सोशल मीडिया पर अनेकों समूह देख रहा हूँ जहाँ लोग प्रवेश तो बड़े प्रेम से लेते हैं परन्तु जैसे जैसे दिन बीतते जाते हैं कुछ सदस्यों में उदासीनता तो कुछ अहं के टकराव में आकर समूह का त्याग कर देते हैं | समाज असंगठित होते जा रहे हैं , मनुष्य की सामूहिक एवं सामाजिक संवेदना मृतप्राय होती जा रही है | जहाँ प्राचीनकाल में सायंकालीन बेला में परिवार के लोग एक साथ बैठकर चर्चा करते थे जिससे एक दूसरे को समझने का अवसर मिलता था वहीं आज परिवार के सभी सदस्य अपनी - अपनी व्यस्तता में ही व्यस्त दिखाई पड़ते हैं | ये सभी सदस्य कभी एक साथ बैठने का समय ही नहीं निकाल पा रहे हैं जिसका परिणाम आपसी समझ में तालमेल न होना एवं बिखराव के रूप में देखने को मिल रहा है | विकास का प्रथम सोपान समूह ही है चाहे वह पारिवारिक समूह या फिर सामाजिक समूह | समूह के महत्त्व को समझना बहुत ही आवश्यक है |* *कोई भी मनुष्य बिना समूह के आगे नहीं बढ़ सकता | समूह की भावना एवं महत्त्व को बनाये रखते हुए ही मनुष्य प्रगतिशील होता रहा है और जो इसको नहीं मानते वे अलग थलग पड़ जाते हैं |*

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anubhav
10 जून 2019

bilul sahi likha hai aapne

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11 जून 2019
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