गंगा का महत्त्व :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

12 जून 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (88 बार पढ़ा जा चुका है)

गंगा का महत्त्व :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस धराधाम पर मनुष्य को जीवन जीने के लिए वैसे तो अनेक आवश्यक आवश्यकतायें होती हैं परंतु इन सभी आवश्यकताओं में सर्वोपरि है अन्न एवं जल | बिना अन्न के मनुष्य के जीवन की कल्पना करना व्यर्थ है और अन्न का स्रोत है जल | बिना जल के अन्न के उत्पादन के विषय में कल्पना करना वैसा ही है जैसे अर्द्धरात्रि में सूर्य देखना | जहाँ जल की बात आती है वहाँ परमपावनी , जीवनदायिनी माँ गंगा की चर्चा करना अनिवार्य हो जाता है | गंगा नदी अपने विशेष जल और इसके विशेष गुण के कारण मूल्यवान मानी जाती है | इसका जल अपनी शुद्धता और पवित्रता को लम्बे समय तक बनाये रखता है | माना जाता है कि गंगा का प्रादुर्भाव भगवान् विष्णु के पैरों से हुआ था | भगवान विष्णु के पैरों से निकलकर सीधे ब्रह्मा जी के कमण्डल में गयीं और उनके कमण्डल से सीधे भगवान शिव की जटाओं में | शिव जी की जटाओं से निकलने के बाद गंगा जी पृथ्वीलोक पर आती हैं | सनातन धर्म में विशेष त्रिदेवों (ब्रह्मा , विष्णु , महेश) के संसर्ग में आने के कारण ही इनका महत्व बढ़ जाता है | गंगा स्नान , पूजन और दर्शन करने से पापों का नाश होता है, व्याधियों से मुक्ति होती है | जो तीर्थ गंगा किनारे बसे हुए हैं, वे अन्य की तुलना में ज्यादा पवित्र माने जाते हैं |* *आज गंगावतरण दिवस "गंगा दशहरा" के दिन मैया गंगा की महिमा सबको ही जानना चाहिए |मानवमात्र की जीवन रेखा कही जाने वाली मैया गंगा की महिमा इतनी ज्यादा है कि इसका वर्णन कर पाना शायद मेरी लेखनी में नहीं है | आज की भौतिकता में जहाँ हम अपने जीवन के मूल आधारों को भूलते जा रहे हैं वहीं पर मैया गंगा की प्रासंगिकता आज भी विद्यमान है | गंगा जी का पौराणिक / धार्मिक के अतिरिक्त वैज्ञानिक महत्त्व भी है | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" विचार करता हूँ कि जहाँ संसार के सभी प्रकार के जलों में एक अवधि के बाद गंदगी एवं कीड़े उत्पन्न हो जाते हैं वहीं गंगा जी का जल न तो कभी गंदा होता है और न ही उसमें कीड़े पड़ते हैं | गंगा नदी का इतना महत्त्व है कि इसका जल वर्षों प्रयोग करने पर और रखने पर भी ख़राब नहीं होता है | इसके जल के नियमित प्रयोग से असाध्य से असाध्य रोग दूर होते हैं | हालांकि गंगाजल के इन दैवीय गुणों को कुछ लोग इसे चमत्कार कहते हैं और कुछ लोग इसे जड़ी-बूटियों और आयुर्वेद से जोड़ते हैं | हिमालय के उच्चशिखर से चलकर स्वयं में अनेक जड़ी - बूटियों को समाहित करती हुई ये भारत के मैदानी क्षेत्रों में पहुँचती हैं | पुराण ही नहीं वरन् विज्ञान भी इसके दैवीय गुणों को स्वीकार करता है | ऐसी दिव्य एवं प्राणदायिनी गंगा मैया भी आज हमारे द्वारा उपेक्षित हो रही हैं तो यह जीवमात्र के लिए भविष्य में घातक हो सकता है | अत: इनकी पवित्रता बनाये रखने के लिए हम सभी को बराबर प्रयास करते रहना चाहिए |* *गंगा जी की पवित्रता एवं दिव्यता के वर्णन में पुराणों के पन्ने भरे हुए हैं परंतु हम आज पुराणों को खोलना ही नहीं चाहते शायद इसीलिए आज की युवापीढ़ी इससे अनभिज्ञ होती जा रही है | हमें अपने धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन करते रहना चाहिए |*

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